प्रदेशभक्ति को पैदा कर देते शिवराज



बधाई, उनको जिनके हृदय में वंदेमातरम आज भी देश प्रेम का संचार कर देता है और उनको भी, जिनके लिए इसे गाना या न गाया जाना, दोनो ही सूरत में राजनीतिक लाभ का कारण बनता है। तो खबर यह कि मध्यप्रदेश में वंदेमातरम ‘बच’ गया। अब उसे पुलिस बैंड की धुनों के बीच गाया जाएगा। यह तब्दीली किसलिए की गयी, यह तो मुख्यमंत्री कमलनाथ ही बता सकते हैं, लेकिन यह कोई नहीं बता सकता कि इस परिवर्तन का क्या असर होगा।  नाथ ने राष्ट्रगीत को लेकर फिलहाल शिवराज सिंह चौहान के प्रयासों की हवा निकाल दी है। भाजपा के हाथ से एक ताजा-तरीन मुद्दा छीन लिया है। लिहाजा शिवराज सहित समूची भाजपा के लिए यह चिंतन का समय है। उन्हें सोचना होगा कि आखिर क्यों कर यह आयोजन महज खानापूर्ति बनकर रह गया था। पत्रकार मनोज जोशी फेसबुक पर मायनाखेज पोस्ट डाल चुके हैं। वह लिखते हैं, ‘लोग तो भूल ही गए थे। बंद करने पर याद आया #वंदेमातरम।’ यह पूरी तरह सच है। यदि भूलने वाली स्थिति नहीं होती तो क्या यह संभव था कि विगत वर्षों में इस आयोजन में शामिल होने वाले अफसर और कर्मचारियों की संख्या महज दस प्रतिशत या उससे भी कम रह गयी थी।


ऐसा किसलिए हुआ? शायद कारण यह रहा कि वंदेमातरम का गायन मात्र करने से देशभक्ति का जज्बा नहीं आ सकता। फिर पूर्ववर्ती सरकार ने तो प्रदेशभक्ति लायक माहौल भी नहीं छोड़ा था। माई का लाल ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक समरसता को तार-तार करने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी। उसी दौर में हत्या के मामले में नामजद आरोपी शान से मंत्री बना रहा। चुनाव आयोग से अनुचित आचरण के दोषी ठहराये गये शख्स को मंत्री बनाए रखने के लिए नैतिक मर्यादाओं का सरेआम चीरहरण किया गया। एक ब्याहता को खुदकुशी करना पड़ गयी और उसके आरोपों की सीधी जद में आए मंत्री का बाल भी बांका नहीं हुआ। उस दौर में मीडिया को अघोषित सेंसरशिप का ऐसा आदी बनाया गया कि वह इस गुलामी को ही अपनी आजादी का मूल समझकर इसमें मग्न हो गया।  भोपाल के पंचशील नगर का एक डग्गू रेलिंग-विहीन नाले की भेंट चढ़ गया और सरकार रेलिंग की बजाय इस बात के लिए धन जुटाती रही कि किसी तरह आदि शंकराचार्य की विशाल प्रतिमा स्थापित कर हिंदू मतदाताओं को खुश किया जा सके।


जनता टैक्स में कमी न किए जाने के चलते महंगाई से त्राहि-त्राहि करती रही, किंतु सरकार के कर्ताधर्ता कान में तेल डालकर बैठे रहे। मंदसौर में छह किसान पुलिस की गोलियों से भून दिए गए और सत्ता की फिक्र इस बात के लिए दिखी कि कहीं इन हालात का कांग्रेस राजनीतिक फायदा न उठा ले। ऐसे हालात जिस प्रदेश में हों, वहां प्रदेशभक्ति का तत्व संचारित करना क्या संभव है? तो फिर देशभक्ति तो बहुत दूर की बात हो जाती है। इसीलिए इन जज्बों को वंदेमातरम की नौटंकी के जरिए जिलाये रखने के स्वांग रचे गए। नतीजा यह हुआ कि वंदेमातरम में केवल तब कुछ भीड़ दिखी, जब खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री इसमें शामिल हुए।  वंदेमातरम के लिए हमारे हृदय में पूरा आदर भाव है। यकीनन उसकी ऐसी तौहीन दु:खी करती है, किंतु इससे भी ज्यादा यह तथ्य हृदयविदारक है कि यह महान गीत सियासी दांव-पेंच के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा है। कल हमने कांग्रेस के संदर्भ में राष्ट्रगीत के परिवर्तित स्वरूप के लिए ‘वनडे मात्र रोम’ की बात कही थी, आज इसे भाजपा के लिए ‘वनडे मात्र हम’ के तौर पर लिख रहे हैं। वह वनडे, जिसे भाजपा राज्य की सत्ता में अपनी वापसी का अवसर मानकर उसके इंतजार में डूबी हुई है। वंदेमातरम में पुलिस बैंड बजने का चाहे जो असर हो, लेकिन देशभक्ति के अहम जज्बे के राजनीतिकरण के चलते उसकी जो बैंड बजी है, वह शोचनीय है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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