हमारी याददाश्त है इसकी दोषी...



यह चुनावी साल का चुनावी बजट है, इसलिए तत्काल किसी नतीजे पर पहुंचने की जल्दबाजी न करें। इस बेहद लुभाने वाले बजट का श्रेय किसी चेहरे या दल को न दें। नरेंद्र मोदी की जगह और कोई प्रधानमंत्री होता, पियूष गोयल के स्थान पर साक्षात अरुण जेटली रहते, केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की जगह किसी भी गठबंधन या पार्टी की सरकार होती, बजट ऐसा ही आना था, जैसा आज पेश किया गया। आखिर मामला चुनावी साल का जो ठहरा। इस बहाने ही सही आयकर में छूट की सीमा सीधे ढाई लाख से बढ़कर दुगनी पांच लाख रूपए हो गई। यह मांग देश में लंबे समय से हो रही थी। मोदी सरकार ने 'मरता क्या न करता' की तर्ज पर ही सही इस कदम को उठा ही लिया। आखिर चुनावी साल बीते चार साल की गलतियां सुधारने का समय जो होता है। पहले गरीब अगड़ों को दस फीसदी आरक्षण और अब मध्यम वर्ग के लिए आयकर छूट की सीमा बढ़ाने का मतलब हुआ भाजपा और मोदी सरकार को आखिरकार अपने कोर वोटर की चिंता तो हुई। भाजपा में हैसियत के लिहाज से चुके हुए यशवंत सिन्हा को आज फिर बरसने का मौका मिल गया। उन्होंने फरमाया कि 'कैश फॉर वोट' इस बजट का मूल मंत्र है। उनकी इस बात से शत-प्रतिशत सहमति है। लेकिन हुआ तो वही है, जो इस देश का चलन बन चुका है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के बजट आने दीजिए। आप पाएंगे कि उनकी घोषणाएं भी लोकसभा चुनाव के लिए वोट हथियाने की साजिश जैसी ही हैं।


एक बार आम चुनाव हो जाए, फिर केन्द्र का और खासतौर पर इन तीन राज्यों का आगामी बजट देख लीजिएगा। सारे भ्रम दूर हो जाएंगे।  किंतु इस चलन के लिए क्या केवल सियासी दल दोषी हैं? दोषी हमारी याददाश्त है। हम तात्कालिक तौर पर दिखाई गई किसी तस्वीर पर लट्टू हो जाते हैं। यह याद ही नहीं रखते कि इस तस्वीर से पहले तक हम राजनीति के कैनवास पर कितनी बदसूरत और भयावह चित्रकारी देखते आ रहे थे। नेता इस बात को जानते हैं। वे आम मतदाता द्वारा स्वयं अपनायी गयी स्मृति विश्राम की इस फितरत का पूरा लाभ उठाते हैं। उन्हें पता है कि सरकार बनने पर चार साल तक अनाचार की हद तक आचरण किया जा सकता है। पांचवां साल आरंभ होते ही सदाचार का पाठ पढ़ो और मतदाता सारे अनाचार भूलकर उन्हें माफ कर देगा। बात कुछ तीखी लग रही हो तो याद कीजिए अरुण जेटली को। राजग के बीते बजट तक यह चतुरसुजान वकील कहते आ रहे थे कि देश का मध्यम वर्ग खुद अपना ध्यान रखने में सक्षम है। निर्लज्जता में लिपटी यह दलील ठीक वैसी है, जैसे किसी आदमी को डूबने से यह कहकर न बचाया जाए कि शायद वह नहा रहा था। लेकिन चुनावी  साल आते ही नरेंद्र मोदी को याद आ गया कि इसी मध्यम वर्ग के वोट ने उनकी सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। इसलिए उनकी सरकार इस वर्ग के सामने राहत का पिटारा लेकर एअर इंडिया के पुराने महाराजा की तरह झुककर खड़ी हो गयी है।&


  यह तो मतदाता को ही तय करना होगा कि वह किसी सरकार के  पांच साल के कार्यकाल का मूल्यांकन करेगा या फिर महज आखिरी वर्ष में किए गए वास्तविक जन हितैषी कामों की सच्चाई को परखेगा। हर सरकार अपने पूरे कार्यकाल में अच्छा भी करती है और बुरा भी करती है। ऐसा मोदी की सरकार ने भी किया ही है। इस बजट में मोदी जो राहतें लेकर आए, उनमें से अधिकांश वही हैं, जिनका वादा कर वह 2014 में इस देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंच गये थे। विडंबना देखिए, घोषणाओं की पूर्ति के लिए देश को चुनाव की दहलीज तक आने का इंतजार करना पड़ गया। फिर घोषणाओं का छिद्रान्वेषण करें तो साफ दिखता है कि इनका देश-हित से कोई सारोकार नहीं है। किसान और मजदूर सहित आम जनता को जो लॉलीपॉप थमायी गयी है, उसमें शकर की बजाय सेक्रीन जैसा घातक तत्व छिपा हुआ है, जो अंतत: इसका सेवन करने वाले की सेहत खराब कर देता है। बीमारी का इलाज करने की बजाय फिर बस बीमार को ही ठीक करने की कोशिश की गई है। मोदी ने नोटबंदी और जीएसटी के अलावा पांच साल तक कोई ऐसा सतत कार्यक्रम नहीं चलाया, जो अंतत: देश की दशा और दिशा सुधारने का जतन कहा जा सके। यदि ऐसा होता तो कतई मुमकिन नहीं था कि देश के किसान का जगह-जगह आक्रोश फूटता। संभव ही नहीं था कि मतदाता तीन राज्यों में भाजपा की सरकारों को ठिकाने लगा देता। इस बात की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती कि राजग को सत्ता में बने रहने के लिए 'कैश फॉर वोट'जैसे प्रपंचों का सहारा लेना पड़ जाता। इस बजट से मोदी सरकार को लाभ हो या न हो, किंतु यह तय है कि इस कुप्रथा से देश के हित आज तक घाटे में रहे हैं और आने वाले समय में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिलना तय है। सरकार चाहे जिसकी बने।

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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