करिश्मा नहीं, करामात वाली है यह सूची



  'बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जो चीरा तो इक कतरा-ऐ-खूं न निकला।' मिर्जा गालिब अपने दौर में यह पंक्ति चाहे जिस संदर्भ में लिख गए हों, लेकिन इसे आज भाजपा की मध्यप्रदेश इकाई के लिए बेहिचक लागू किया जा सकता है। भाजपा की मध्यप्रदेश इकाई के लिए शुक्रवार को उसके उम्मीदवारों की पहली सूची जारी हो गई। जब 'अबकि बार दो सौ पार' का नारा गढ़ा गया होगा तब भाजपा नेतृत्व के दिमाग में रहा होगा कि शिवराज सरकार बहुत लोकप्रिय है। एंटी इनकंबेंसी बेकार की बात है। पहली सूची को देख कर जाहिर हो गया कि जिन्हें 'एंटी इनकंबेंसी' की बात करना हो वे करें, भाजपा नहीं मानती। माहौल उसके पक्ष में है लिहाजा, उसने अपने अधिकांश विधायकों को टिकट देकर साबित कर दिया कि 'समृद्ध मध्यप्रदेश' इन्हीं के बूते बनेगा। या फिर शिवराज पांच साल तक विधायकों को ऐसे ही चमकाते रहे। अब तक 37 कुल टिकट कटे हैं। यानि पन्द्रह फीसदी से ज्यादा नहीं।  इससे पहले तक खूब शोर था। पार्टी को 'दो सौ' से पार जाना है। इसके लिए मौजूदा में से करीब आधे विधायकों के टिकट काट दिए जाएंगे। परिवारवाद नहीं चलेगा


दागी या विवादित छवि वालों के चयन से परहेज बरता जाएगा। लेकिन पहली सूची तो कुछ और ही कह रही है। मामला उस तत्व की एक बूंद भी न दिख पाने का है, जिसे लेकर हो-हल्ला मचाया जा रहा था। सूची सबसे पहले यही बता रही है कि ऐसा ही हाल रहा तो दो सौ से ज्यादा सीट तो दूर, बहुमत के लाले भी पड़ सकते हैं। यह तो कांग्रेस को तश्तरी में रखकर सत्ता परोसने जैसा मामला दिखता है। यह लिस्ट करिश्माई नहीं, बल्कि खालिस करामाती है। उदाहरण के तौर पर हर्ष सिंह और गौरीशंकर शेजवार हटे तो उनके बेटों को टिकट मिल गया। यानी वंशवाद का दंश अब यह पार्टी भी झेल रही है, दिग्गज नेताओं की सहमति से। इससे साफ है कि सिंह और शेजवार सहित राज्य में दिग्गज भाजपाइयों ने अपने-अपने इलाके में घर से बाहर का कोई और नेतृत्व पनपने ही नहीं दिया। पन्ना बाई का टिकट काटा तो उनके पति पंचूलाल को टिकट दे दिया। पहले पंचू लाल का काटा था तो पत्नी को दे दिया। कार्यकर्ताओं को गढ़ने वाली पार्टी का यह हाल है। नए कार्यकर्ता ही तैयार नहीं हो पा रहे हैं।  एक उदाहरण सीतामऊ विधानसभा सीट का है। यहां से राधेश्याम पाटीदार को टिकट दिया गया है।


राधेश्याम पाटीदार 2008 में विधायक थे। 2013 में मोदी की लहर में उज्जैन संभाग में हारने वाला अकेले भाजपा उम्मीदवार। इस बार भी जीतने की कोई उम्मीद नहीं लेकिन भाजपा को कोई और पाटीदार ही नहीं मिला। यहां से प्रदेश महामंत्री बंशीलाल गुर्जर को भी टिकट दिया जा सकता था। बंशीलाल गुर्जर का नाम मनासा और मंदसौर के लिए भी था। कहीं से टिकट नहीं मिला। गुर्जर को एक अकेले मुरैना में रूस्तम सिंह के तौर पर टिकट दिया गया है। मनासा में जहां कैलाश चावला का टिकट काटा गया है, वहां का फैसला तो ऐसा है जैसे बस पार्टी सुंदरलाल पटवा के स्वर्ग सिधारने का ही इंतजार कर रही थी। किस्सा यह है कि पटवा जी ने 1984 में माधव मारू के पिता रामेश्वर मारू को मनासा से चुनाव लड़ने के लिए कहा था लेकिन रामेश्वर मारू ने मना कर दिया था। पटवा जी इस बात की गाठ बांधी और अपने जीते जी रामेश्वर मारू और उनके निधन के बाद माधव मारू को कभी टिकट नहीं लेने दिया। लिहाजा दो बार रामेश्वर मारू भाजपा से बगावत कर पार्टी की हार का कारण बने।  बाद में माधव मारू ने भी दो बार बगावत कर चुनाव लड़ा और हारे।


2008 में कैलाश चावला की हार का कारण माधव मारू की बगावत ही थी। 2013 में भी मारू ने चुनाव लड़ा था लेकिन तब कैलाश चावला ने 14 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी। मजे की बात यह कि कैलाश चावला जैसे दिग्गज को टिकट से परे रखकर वहां से उन माधव मारू को प्रत्याशी बनाया गया है, जो कल तक तो भाजपा का विधिवत सदस्य तक नहीं था। विरोध में मारू से लड़ते रहे मनासा के कार्यकर्ताओं ने भाजपा कार्यालय पर ताला जड़ दिया। यह सूची 'समरथ को नहीं दोष गुसार्इं' की पर्यायवाची कही जा सकती है। जो 37 विधायक आज खेत रहे, उनमें से अधिकांश फितरत से शांत या कमजोर थे। लेकिन बागी तेवर दिखाने वाले विधायकों की सीट पर या तो फैसला सुरक्षित रख लिया गया, या फिर  उनकी मर्जी से टिकट बांटे गए हैं। गोविंदपुरा तथा सिवनी-मालवा ऐसी ही सीट हैं, जहां बाबूलाल गौर और सरताज सिंह जैसे धाकड़ों के कारण फिलहाल पत्ते नहीं खोले गए हैं। जबकि यह वह दो शख्स हैं, जो चुनाव हारना जानते ही नहीं हैं। आज के घटनाक्रम के बाद एक बात साफ है। यदि कांग्रेस ने प्रत्याशी चयन में जरा भी सजगता बरती तो उसके लिए आसार उम्मीद से अधिक अच्छे बनना तय है।


हां, यह देखने वाली बात होगी कि राजा-महाराजा के बीच संघर्ष जैसे घटनाक्रमों के बीच इस सजगता का स्तर कितना रह पाता है।  मनोहर श्याम जोशी ने एक व्यंग्य खलनायक के पीछे क्या है? लिखा था। इसमें विवादित होकर चर्चित बने एक गीत 'चोली के पीछे क्या है?' के निर्माण की परिकल्पना की गई थी। तमाम मूर्खतापूर्ण प्रहसनों के बीच गीत बनता है। सुपर हिट होता है। तब गीतकार का चम्मच उससे पूछता है कि वह अगला गीत क्या लिखेगा? जवाब आता है, उसका मुखड़ा है, 'लंगोट के पीछे क्या है?' वह इसकी विषय वस्तु भ्रष्टाचार को बताता है। खलनायकत्व से भाजपा भी अछूती नहीं रही है। पहली सूची की चयन प्रक्रिया किसी चवन्नी छाप गीत की रचना जैसे माहौल एवं दिमाग की मौजूदगी की चुगली कर रही है। यह भ्रष्टाचार दिमागी हो सकता है और पक्षपात, मनमानी, नादानी, अहंकार या विनाशकाले विपरीत बुद्धि वाला भी। इस भ्रष्टाचार के आगे किसी लंगोट को पर्दा बनाकर टांग दिया गया लगता है। सब जानते हैं कि इस लंगोट के पीछे क्या है। बाकी यह तो भगवान ही जाने कि पार्टी विद डिफरेंस का रट्टा मारने वालों की नजर उस परदे के पीछे तक पहुंच पा रही है या नहीं। बाकी रही बात सरकार की तो भाजपा को चौथी बार लाने का काम कांग्रेस भी करती नजर आ रही है। 

loading...

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति