न मुस्लिम कुछ भूलेंगे और न ही हिंदू



दिग्विजय सिंह का यह भगवा प्रेम एक खास किस्म के राजनीतिक प्रयोग की ओर संकेत करता है। यह कोशिश है हिंदू को हिंदू के खिलाफ खड़ा करने की। एक संघी हिन्दूत्व और एक गैर संघी हिन्दूत्व। ऐसे दो धु्रव, जिन पर एक ओर हिंदुत्व के भाव से ओतप्रोत लोग हैं और दूसरे पर दिग्विजय की शैली के वह हिंदू जो अपने इस समुदाय से होने की बात केवल तब कहते हैं, जब वह किसी लाभ का सबब हो। जैसा कि वर्तमान में खुद दिग्विजय सिंह या कांग्रेस कर रहे हैं। हालांकि इन दोनों के बीच के मतभेद कभी भी मुस्लिम धर्मावलंबियों के पंथ शिया-सुन्नी संघर्ष वाला स्वरूप नहीं ले पाते हैं। सहिष्णुता इसकी वजह है। किंतु इस सौम्य विभेद में यदि राजनीति का तड़का लगा दिया जाए तो मामला बिगड़ सकता है। हो सकता है कि दिग्विजय की मंशा ऐसे बिगाड़ वाली न हो, किंतु यह चुनाव जिस तरह की लगातार बढ़ती आपसी कटुता दिखा रहा है, उससे यह आशंका गलत नहीं लगती कि घटनाक्रम एक ही समुदाय के बीच मतभेद को मनभेद की स्थिति तक लाने वाला साबित हो सकता है


  यह साफ दिख रहा है कि दिग्विजय को अपनी कुछ महीने पुरानी वाली मुस्लिम परस्त छवि के चलते हार का डर सता रहा है। भगवा चोलाधारियों के बीच पुराने शहर में घूमने और विशुद्ध कर्मकांडी की तरह किसी अनुष्ठान में शामिल होने से स्पष्ट है कि कांग्रेस प्रत्याशी को याद आ गया है कि भोपाल में वोटों का धु्रवीकरण कांग्रेस के अच्छे से अच्छे प्रत्याशी को पराजित वाली श्रेणी में ला पटकता है। इसलिए दिग्विजय सिंह की चुनावी रणनीति तो सही है कि हिन्दूओं का ही आपस में बटवारा कर दों। मुस्लिम को भी पता है और दिग्विजय सिंह को भी पता है कि ये वोट कांग्रेस से अलग कहीं नहीं जाना है। दिग्विजय सिंह की जीत से यह तबका निश्चित तौर पर खुश होगा लेकिन एक डर तो फिर भी कांग्रेस के इस रवैये से मुस्लिमों में निश्चित ही पनप रहा होगा। आज हिन्दूओं की ताकत के डर से कांग्रेस अगर इस कदर हिन्दू हुई जा रही है तो चुनाव जीतने के बाद भी क्या गारंटी है कि कांगे्रस के मन से हिन्दुओं का डर खत्म नहीं होगा।


कल को जब कोई हिन्दू मुस्लिम विवाद की स्थिति बनी तो फिर कांग्रेस का रवैया क्या होगा? क्या तब कांग्रेस अपने पहले जैसे रवैये पर लौट आएगी। 2014 की हार के बाद कांग्रेस इस नतीजे पर पहुंची थी कि उसकी प्रो मुस्लिम राजनीति के कारण उसकी बुरी तरह हार हुई है। तो क्या दिग्विजय सिंह या कांग्रेस की जीत की स्थिति में उसके भी प्रो हिन्दू होने का डर अल्पसंख्यकों के मन में नहीं होगा।  इस कॉलम में हमने पहले भी याद दिलाया है कि किस तरह मंसूर अली खां पटौदी और उनके तत्कालीन चुनाव प्रबंधक गुफराने-आजम की जुगलबंदी ने पटौदी को यहां बुरी तरह हार दिलवाई थी। धु्रवीकरण का सबसे तगड़ा उदाहरण तब भी देखने को मिला था, जब 1992 के दंगों के बाद हुए 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने भोपाल उत्तर सीट से बेहद ताकतवर जनता दल उम्मीदवार आरिफ अकील को नौ हजार से अधिक मतों से शिकस्त दे दी थी। कांग्रेस की तो भोपाल उत्तर के मतदाताओं ने लगातार दो चुनावों में जमानत जब्त करा दी थी।


यह वो दौर था जब न कांग्रेस पर हिन्दू भरोसा कर रहे थे और ना ही मुस्लिम। याद दिला दें कि यह वह समय था, जब संघ सहित तमाम हिंदूवादी संगठनों ने इस बात के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था कि हिंदू मत विभाजित न होने पाये। इसके लिए राजनीतिक स्तर सहित सामाजिक समरसता के भी अनेक वह प्रयत्न किये गये, जिनसे अंतत: शर्मा को जीत हासिल हुई। इस चुनाव में दिग्विजय सिंह ने जिस तरह के हिंदुत्व की आजमायश की है, उससे यह संभावना खारिज नहीं की जा सकती कि इसकी सर्वथा विपरीत और तीखी प्रतिक्रिया सामने आ सकती है।  कुछ मिलता-जुलता विषयांतर करें। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख नरसंहार पर सैम पित्रोदा फरमा रहे हैं कि जो हो गया, सो हो गया। वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी ने भोपाल गैस त्रासदी पर एक किताब लिखी है। इसमें उन्होंने तत्कालीन कलेक्टर मोती सिंह से बातचीत की।


तिवारी एक जगह हैरत के साथ लिखते हैं कि हजारों लोगों की मौत के आरोपी को भोपाल से निकालने में मदद करने वाला शख्स पूरे सुकून से तरबूज खाते हुए इसे सामान्य प्रक्रिया बता रहा है। भोपाल गैस त्रासदी भी नरसंहार थी, जिसे सिंह ने पित्रोदा की तरह ही जो हो गया, सो हो गया वाली श्रेणी में ला दिया। किंतु क्या वाकई ऐसा हो सकता है। क्या हिंदुओं को आतंकवादी बताने की साजिश के दिग्विजय पर लगे आरोपों के लिए ऐसा कहा जा सकता है?  क्या सात दिसंबर, 1993 से आठ दिसंबर, 2003 के बीच  वाले मध्यप्रदेश को अंधेरे और गड्ढेदार सड़कों में तब्दील करने की गलती को सैम पित्रोदा के दार्शनिक अंदाज से बिसराया जा सकता है? क्या खुद राजगढ़ की जनता छुआड़लिया कांड की भयावह यादों को इसी तरह भुला सकती है? सुरेश पचौरी की अगुआई में भोपाल में हुए पार्षद पिटाई कांड की दु:खद स्मृति भी क्या किसी पित्रोदा की सलाह पर चलकर विस्मृत की जा सकती है? कोई कुछ नहीं भूलता है। न मुस्लिम यह भूलेंगे कि अंतत: दिग्विजय भी उन्हें बंधुआ मजदूर मानकर खांटी हिंदू जैसा आचरण कर रहे हैं और न ही हिंदू समाज यह भुला सकेगा कि उसके माथे से तिलक हटाकर वहां मैं आतंकवादी हूं लिखने के समान काम को कांग्रेस की जिस टोली ने अंजाम दिया, उसमें दिग्विजय का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।  (अंतिम) 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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