एक पाती कमल हासन के नाम



‘आप अच्छे अभिनेता हैं। कम से कम पत्नी सारिका और बेटियों सहित आपके परिवार के कुछ सदस्य आपको अच्छा इंसान भी मानते ही होंगे। तमिलनाडु के अरवाकुरिचि में मुस्लिमों की भारी संख्या है। वही अरवाकुरिचि, जहां आपने कहा कि देश का पहला आतंकवादी हिंदू था। जहां आप  जैसा सेक्यूलर, चुनाव जैसा माहौल और सुनने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हों, वहां  आपके इस शोध को सराहना तो मिली ही होगी। सो वहां लगे हाथ आपको बेहद संस्कारी परिवार का भी मान लिया गया होगा। तो हमारे स्तर से आप अच्छे अभिनेता, परिवार के लिहाज से बढ़िया  इंसान और अरवाकुरिचि में बह रही सियासी हवा के अनुसार संस्कारी परिवार के सदस्य हैं। इन उपलब्धियों के लिये कृपया हमारी शुभकामनाएं स्वीकार करें। गुस्ताखी माफ, लेकिन एक बात कहेंगे। आप का इतिहास का ज्ञान बहुत कमजोर है। वरना नाथुराम गोड़से से पहले आपको सुहरावरदी  का पुण्य स्मरण हो गया होता। यह वही महापुरुष हैं, जिन्होंने आजादी के बाद कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुए हिंदू-विरोधी दंगों में मुस्लिमों का नेतृत्व किया था। इन गणमान्य नागरिक की बदौलत वहां सैंकड़ों हिंदुओं को कत्ल कर दिया गया। स्वयं पंडित (आपको संबोधित पत्र में ‘पंडित’  शब्द बुरा लगे तो कृपया क्षमा कीजिएगा) जवाहरलाल नेहरू श्री सुहरावरदीजी को लेकर मोहन दास करमचंद गांधी के  पास आये थे


तो हासन जी, बताइए जरा, आजाद भारत में गोडसे द्वारा की गयी एक हत्या से पहले की अनेक हत्याओं का दोषी तो सुहरावरदी था। फिर भला वह पहला आ तंकवादी क्यों नहीं हुआ? क्यों नहीं आपने कहा कि देश का पहला आतंकवादी मुसलमान था? मैं जानता हूं कि आपने ऐसा क्यों नहीं कहा। आप उस प्रजाति के हैं, जो विचित्र किस्म का लंगोट पहनती है। किसी हिंदू के सामने पड़ने पर आप लंगोट कुश्ती की मुद्रा में कस लेते हैं। लेकिन मुस्लिम  पक्ष से कोई विरोधी आंखें तरेरे तो आपका लंगोट गीला और पीला, दोनो हो जाता है। क्या मेरी यह व्याख्या गलत है? विश्वरूपम आपकी ही फिल्म थी ना। मुस्लिमों ने इसके कुछ दृश्यों का विरोध किया तो आप ढीले पड़ गये थे। सात-सात दृश्य कटवा दिए आपने फिल्म के। लेकिन हिंदुओं की  महाभारत को ‘औरत को दांव पर लगाने वाली किताब’ कहने वाले अपने बयान से तो आप नहीं पलटे। क्योंकि आप जानते थे कि आपका सामना उस वर्ग से हो रहा है, जो शिक्षाजनित संस्कारों के चलते सहिष्णु है। वरना, सन 2017 में जिस तरह एक तमिल पत्रिका में आपने दक्षिणपंथियों को  उग्रवादी कहा था, वही तेवर किसी वक्त मुसलमानों के लिए दिखा दिये होते तो आपका क्या हश्र होता, यह आप बेहतर जानते हैं।


इतना बेहतर कि आप और आप जैसे लोग बेहद कैल्क्यूलेटिव होकर उसकी निंदा करते हैं, जो चुपचाप इसे सुन ले और उसकी हर बुराई से आंख मूंद लेते हैं, जो त थ्यात्मक निंदा का जवाब भी सामने वाले की जुबान खींचकर देने की फितरत रखता है।  आपकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं हैं। समस्या यह कि इस किस्म की आपकी तबीयत उस समय हरी होना शुरू हुई, जब रजनीकांत ने राजनीतिक रुचि का प्रदर्शन आरम्भ किया। यहीं मामला आपके लिए बिगड़ने लगा। क्योंकि आपको एक अभिनेता के तौर पर गढ़ी गयी छवि के  जरिये जनता का समर्थन मिलने की उम्मीद थी। किंतु इस समर्थन के लिहाज से रजनीकांत आपसे कई गुना आगे हैं। तमिलनाडु में वह भगवान की तरह पूजे जाते हैं। आपको अपनी फिल्में हिट कराने के लिए उनमें स्पेशल इफेक्ट डालने होते हैं। इससे भी काम न चले तो फिल्म को लेकर विवाद  खड़े करने होते हैं। इधर, रजनीकांत को किसी फिल्म को सुपर हिट करने के लिए उसमें केवल अपना नाम देना होता है। फिर रजनीकांत का रुख भाजपा के प्रति अच्छा है। इसलिए आपको अपनी दाल गलाने के लिए हिंदू-विरोधी राजनीति से ही शुरूआत करना पड़ी है। ममता बनर्जी के साथ  आपकी एक तस्वीर देखी है। उसमें आप एक थैला लेकर कैमरे के सामने खींसें निपोर रहे हैं।


मुझे पूरा विश्वास है कि इस थैले में बनर्जी का वह तमाम साहित्य भरा होगा, जो आपको यह शिक्षा दे सके कि किस तरह सेक्यूलर होने के नाम पर घोर हिंदू-विरोधी राजनीतिक करके किसी राज्य का  मुख्यमंत्री बना जा सकता है।  गोडसे ने गांधी की जान क्यों ली, इसे लेकर अपने-अपने मत और मतांतर हैं। हम आपसे यह नहीं कहते कि आप ‘मी नाथूराम गोडसे बोल्तोय’ पढ़ें, किंतु यह आग्रह तो आपसे किया ही जा सकता है कि आप देश का इतिहास वामपंथी या कांग्रेसी चश्मा लगाये बगैर भी पढ़ने की जहमत उठा  लीजिए। आपने रविवार को फरमाया कि आप गांधी की हत्या का जवाब खोजने आये हैं। अच्छा काम है। हमारे लायक कुछ हो तो बताइएगा। भले ही अपना नहीं, पराया समझकर। लेकिन जवाब तो और भी कई खोजे जाने हैं। मसलन, वह कौन था जिसने सन 1947 के कबायली हमले में देश  की सेना को आगे बढ़ने से रोका? क्या वजह रही कि तिब्बत चीन को दे दिया गया। इस बेहोशी का कारण क्या था कि चीन अरुणाचल प्रदेश की भारी-भरकम जमीन हमसे छीन ले गया और हम कुछ न कर सके। यह सच भी तो पता लगाइए कि रुस्तम सोहराब नागरवाला की मौत कैसे हुई?  अरे! आपका ऐतिहासिक ज्ञान तो एकांगी है। इसलिए हम ही बता दें कि नागरवाला सन 1971 में स्टेट बैंक आफ इंडिया गया। दावा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसे बैंक से साठ लाख रुपए लेने भेजा था।


खुद इंदिराजी ने फोन करके बैंक के प्रमुख को बिना किसी चैक यह रकम  नागरवाला के हवाले करने को कहा था। मामला खुला तो जांच बिठा दी गयी। विकीपीडिया पढ़ लीजिए। उसमें लिखा है, ‘नागरवाला नामक जिस व्यक्ति ने वह बड़ी रकम निकाली, उसको लेकर आज तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। शुरू में उसे एक शातिर अपराधी माना गया, परन्तु धीरे-धीरे  संदेह की सुई श्रीमती गांधी और उनसे जुड़े कुछ निकटस्थों की तरफ भी घूमने लगी। जांच शुरू हुई और लंबी खिंची। उस दौरान नागरवाला, बैंक प्रबंधक तथा कुछ अन्य गवाहों की मौत एक के बाद एक होती गई। कोई ट्रक से कुचल गया तो कोई घर में संदिग्ध हालत में मृत पाया गया। उस कांड  को पांच दशक हो गये परन्तु आज तक कोई नहीं जान सका कि वास्तविकता थी क्या?’ तो हासन साहब, इस बारे में भी जरा पड़ताल कर लीजिए। शायद आपकी कोशिशों से यह जवाब भी मिल जाए कि चुनाव में धांधली की कोर्ट द्वारा घोषित इंदिरा गांधी के छह साल तक चुनाव लड़ने पर लगी  रोक का देश में आपातकाल लागू करने से क्या लेना-देना था? पहला और आखिरी आतंकी छोड़िए जनाब, यही बता दीजिए कि क्या आपातकाल के नाम पर हजारों लोगों की जबरिया  नसबंदी कर देने को आतंकवाद से कम श्रेणी में रखा जा सकता है?  कमल भाई, जवाब तो कई चीजों के तलाशे जाने हैं। आप को हमारी बताई बातों की पड़ताल नहीं करना, तो मत कीजिए। खोजिये केवल मोहन दास करमचंद गांधी की हत्या का जवाब। लेकिन हम भी कुछ तलाशने को स्वतंत्र हैं। यह खोज किसी की पैदाइश में खोट के स्रोत की भी हो सकती है।  क्योंकि बिना किसी तथ्य के अपनी ही कौम को आतंकवादी कह देने वाला कोई शख्स सामान्य पैदाइश वाला तो नहीं ही माना जा सकता है।’  

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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