नाथ की पिक्चर अभी बाकी है दोस्त



इस कयास में खास दम नहीं दिखता कि मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए सात जनवरी से शुरू हो रहा राज्य विधानसभा का सत्र आशंका या तनाव का सबब बनेगा। यह आश्चर्य का सबब हो सकता है, लेकिन तथ्य यही है। वह भी तब, जबकि सरकार बहुमत के नाम पर तलवार की धार पर चल रही है। चार में से केवल एक निर्दलीय विधायक को मंत्री बनाया गया है। दो एवं एक विधायकों वाली क्रमश: बसपा एवं सपा को मंत्रिमंडल के गठन में कोई तवज्जो नहीं दी गयी है। दिग्विजय सिंह आशंका जता रहे हैं कि कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की कोशिश हो रही है। तय मानिए कि इन तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद सात जनवरी को नाथ प्रसन्नचित्त ही दिखेंगे। अंजाम चाहे जो हो।  नाथ की मुख्यमंत्री के बतौर पारी ‘कमिटमेंट मुख्यमंत्री’ के तौर पर शुरू हुई है। कर्ज माफी तो खैर, राहुल गांधी का एजेंडा है, लेकिन पुलिसकर्मियों के साप्ताहिक अवकाश की व्यवस्था, खर्चों पर सख्ती से कटौती और मंत्रिमंडल में युवा खून को तवज्जो देना जताता है कि वह एक स्पष्ट विजन लेकर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने मंत्रियों के चयन में दिग्विजय और ज्योतिरादित्य के खेमों को महत्व दिया, लेकिन इसे इन नेताओं की इच्छा को महत्व देना नहीं कहा जा सकता।


क्योंकि सिंह तथा सिंधिया भी अपने-अपने उम्रदराज हो चुके समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह  नहीं दिलवा सके हैं।  फिलवक्त नाथ के लिए पार्टी के भीतर ही बड़ी चुनौतियां हैं। राज्य मंत्रिमंडल की अनौपचारिक बैठक में दिग्विजय सिंह जिस तरह हावी होते दिखे, वह मुख्यमंत्री के लिए भविष्य की चेतावनी कहा जा सकता है। तिस पर सिंधिया खेमा पहले ही उनके खिलाफ मोर्चा खोले बैठा है। मांग है कि ज्योतिरादित्य को  प्रदेश अध्यक्ष का पद दिया जाए। यह तय है कि इस पद पर सिंधिया या उनके किसी खास की ही ताजपोशी होगी। ऐसे में मुख्यमंत्री को संगठन की ओर से ‘सौतिया डाह’ वाला आचरण सहने के लिए भी तैयार रहना ही होगा। फिर, कांपते हुए बहुमत की तलवार तो उनके सिर पर लटक ही रही है। सवाल यह कि ऐसे हालात से निपटने के लिए नाथ का कौन सा नया रूप सामने आएगा? उनमें अपने राजनीतिक भाई दिग्विजय जैसी ‘किलिंग इंस्टिंक्ट’ नहीं है। अपने पूर्ववर्ती पार्टीजन अजीत जोगी के सदृश ‘सरकार बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने’ की कुटिलता उनके व्यक्तित्व में नहीं दिखती है। लेकिन सरकार बनाए रखनी है और वह भी खुद के पूरे वजूद के साथ तो नाथ को करना तो ऐसा ही कुछ होगा।


इसीलिए सवाल में नाथ के ‘नए रूप’ की तलाश की जा रही है। बहुत संभव है कि इस बदलाव के बैक्टीरिया कुर्सी के जरिए संचारित होकर नाथ के भीतर समा जाएं। ऐसा पहले हो चुका है। दिग्विजय और जोगी इसके काफी समकालीन उदाहरण हैं। किसी मुख्यमंत्री के लिए कतई मुश्किल नहीं है कि बसपा तथा सपा के विधायकों से ‘डायरेक्ट डीलिंग’ कर ली जाए। यानी मंत्री पद के बदले उन्हें कांग्रेस में शामिल करा लिया जाए। आसानी तो इस काम में भी है कि दिग्विजय या सिंधिया खेमे के विधायकों को मंत्रिमंडल में स्थान देकर उनके पुख्ता हृदय परिवर्तन का इंतजाम कर दिया जाए। कमलनाथ यदि लम्बी रेस का घोड़ा साबित हुए तो मध्यप्रदेश की राजनीति में ऐसे घटनाक्रम दिखना तय है। हां, यह हो सकता है कि ऐसे प्रसंग लोकसभा चुनाव के बाद दिखें। क्योंकि कांग्रेस को अभी केंद्रीय स्तर पर बसपा और सपा की जरूरत है। नाथ का संकट यह भी है कि दिग्विजय या सिंधिया को तत्काल ठिकाने लगाने की उनकी कोशिश बहुमत की चाशनी में पूरी तरह न  डूब पाने वाली उनकी सरकार के लिए विद्रोह के हालात पैदा कर सकती है। लिहाजा, थोड़ा इंतजार करें, बहुत मुमकिन है कि नाथ का परिवर्तित स्वरूप सामने आए। आसान और चलताऊ अंदाज में बेझिझक कह सकते हैं कि ‘नाथ की पिक्चर अभी बाकी है दोस्त।’

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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