ममता के श्रीमुख से नैतिकता का जिक्र



ममता बनर्जी द्वारा ‘विश्व के सर्वश्रेष्ठ पुलिस कमिश्नर’ बताए गए राजीव कुमार आज काफी बेचैन हो गए होंगे। क्योंकि दीदी की तमाम कोशिशें बेकार गयीं। अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें अदालत में काम नहीं आयीं। कुमार को केवल यह राहत मिली कि फिलहाल उनकी गिरफ्तारी नहीं होगी, लेकिन सीबीआई को बड़ी सफलता मिली, जब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि कमिश्नर को पूछताछ का सामना तो करना पड़ेगा। ममता बनर्जी ने इस व्यवस्था को अपनी नैतिक जीत बताया है। उनके इस कथन से एक बात का संतोष है। वह यह कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के शब्द कोष में नैतिकता नामक चिड़िया अब भी वास करती है। वरना तो उनके स्तर से तमाम वही आचरण सामने आते रहे हैं, जिनमें नैतिकता का पुट तलाशना चील के घोसले में मांस के टुकड़े को ढूंढने जैसी बेवकूफी का पर्याय ही कहा जा सकता है।  कोर्ट का यह सवाल दोहराने का मन करता है कि आखिर राजीव कुमार को पूछताछ में शामिल होने से कैसा गुरेज है? आप पाक-साफ हैं तो सीना तानकर सामने आइए। यह क्या बात हुई कि इधर सीबीआई की टीम आपके पास पहुंची और उधर आपने पुलिसिया तरीके से उसका प्रतिरोध शुरू करवा दिया।


सुप्रीम कोर्ट ने कल ही साफ कह दिया था कि यदि कुमार ने साक्ष्य नष्ट करने की कोशिश की तो इसका बुरा अंजाम होगा। यकीनन आज कोर्ट के सामने ऐसे सबूत पेश किए गए होंगे, जिससे वह इस बात के लिए सहमत हो गयी कि कुमार से पूछताछ की जाना चाहिए। यह व्यवस्था बहुत अहम है कि कुमार को पश्चिम बंगाल की बजाय पड़ोसी राज्य के शिलांग में  पूछताछ  के लिए पेश होने को कहा गया है। सीधी सी बात है कि कोर्ट भी पश्चिम बंगाल में ही पूछताछ होने की स्थिति में बीते रविवार जैसे घटनाक्रमों की आशंका से इनकार नहीं कर रहा है। केंद्र और हमलावर हो गया है। उसने ममता से साफ कहा है कि अनुशासनहीनता के लिए कुमार के खिलाफ कार्रवाई की जाए। इस आदेश पर सही मायनों में दशमलव एक प्रतिशत अमल भी नहीं होना है। हां, खानापूर्ति की जा सकती है। ठीक वैसे, जैसे किसी समय चुनाव आयोग के आदेश पर सीहोर के कलेक्टर पद से हटाए गए एसके मिश्रा अंतत: मध्यप्रदेश के शैडो चीफ मिनिस्टर के रूप में और ताकतवर बना दिये गये थे। तय मानकर चलिए कि ममता का राज कायम रहने तक कुमार के साथ भी ऐसा ही होना है।


भाजपा के इस सवाल में दम दिखता है कि आखिर कुमार के लिए ममता की इस बेचैनी का राज क्या है? क्या कोलकाता का पुलिस कमिश्नर कुछ ऐसे रहस्य जानता है, जो अंतत: बनर्जी की सेहत के लिए घातक साबित हो सकते हैं? पुरानी कहानियों में अक्सर किसी पात्र की जान तोते में रहने का जिक्र आता था। इधर तोते की गर्दन मरोड़ी जाती और उधर उस  पात्र का अस्तित्व खत्म हो जाता था। सीबीआई को केंद्र का तोता कहने वाली ममता से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि कहीं कुमार भी पुरानी कहानियों वाले तोते की श्रेणी के तो नहीं हैं।   ममता बनर्जी की इस बात के लिए तारीफ की जाएगी कि वह सत्ता में हों या विपक्ष में, अपनी मर्जी के खिलाफ किसी भी  आचरण पर उनका विरोध समान रूप से उग्र रहता है। जिस ताकत से उन्होंने प्रतिपक्ष में  रहते हुए सिंगूर कारखाने का विरोध किया, जिस दम से उन्होंने राज्य की वामपंथी सरकारों के खिलाफ आवाज उठायी थी, उसी ताकत से वह सरकार में रहते हुए अपने विरुद्ध आवाज उठाने वालों का प्रतिकार भी कर रही हैं। पता नहीं ममता को अरविंद केजरीवाल का स्त्री स्वरूप कहें या केजरीवाल को बनर्जी का पुरुष स्वरूप, लेकिन दोनो के बीच साम्य गजब का है। तिल का ताड़ बनाने की कला उन्हें शायद विरासत में मिली है। यह भारतीय राजनीति की विडंबना है। कुमार जैसों का सौभाग्य है और हमारा भाग्य इस लिहाज से है कि ऐसे चरित्र नहीं होंगे तो फिर केवल शाकाहारी किस्म के  प्रसंगों पर अपनी कलम चलाना हमारी मजबूरी बन जाएगी। 

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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