मध्यप्रदेश का 'बेचारा घोटाला'



यकीनन यह घोटाला एक हजार करोड़ के आसपास का हो सकता है।और यह अकेले मध्यप्रदेश की कहानी नहीं है। ऐसी घटनाएं हर उस प्रदेश में सामने आ रही हैं, जहां किसानों के कर्जमाफी की घोषणा की गई है। चाहे वो फिर पंजाब हो, महाराष्ट, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक या फिर मध्यप्रदेश। हर जगह ऐसे किस्से कहानी सामने आ रहे हैं, जहां या तो किसान का नाम मात्र का कर्ज माफ हो रहा है या फिर किसान ने कर्ज लिया ही नहीं है, लेकिन उसके नाम पर चढ़ा कर्ज माफ किया जा रहा है। जाहिर है, पूरे देश के सहकारिता सिस्टम का यह एक बड़ा झोल सामने आ रहा है। मध्यप्रदेश में बीते पंद्रह साल के दौरान भाजपा की सरकार थी, जिसने हर बार खेती को लाभ का धंधा बनाने का जोरशोर से एलान किया, 'ब्याज जीरो, शिवराज हीरो' के नारे लगाए लेकिन अब जब कमलनाथ सरकार किसानों के कर्ज माफ कर रही है तो बैंकों के कर्ज की ही नई कहानियां सामने आ रही है। ये किस्से कहानियां जाहिर करते हैं कि  किसानों को कर्ज देने के नाम पर अराजकता का नंगा नाच हुआ। जिन्होंने कभी सहकारी समिति या बैंक की चौखट तक पार  नहीं की, ऐसे किसानों के नाम पर भी भारी-भरकम कर्ज देना बता दिया गया। या फिर बड़ी संख्या में कर्जमाफी की श्रेणी में ऐसे किसान शामिल किए जा रहे हैं जिन पर नाम मात्र का कर्जा दर्शाया जा रहा है।  सहकारिता मंत्री डॉ. गोविंद सिंह अनुमान लगा रहे हैं कि किसानों को कर्ज देने के नाम पर सहकारिता विभाग में मामला एक हजार करोड़ रुपए के घोटाले का है।


मुख्यमंत्री कमलनाथ इसकी जांच की बात कह चुके हैं। लेकिन क्या यह उचित होगा कि सारा सच सामने आने के पहले ही कमलनाथ सरकार दनादन किसानों का कर्ज माफ करने में जुटी रहे? यह तो वैसा ही होगा, जैसे किसी बीमारी का टीकाकरण करने का लक्ष्य पूरा करने के लिए टीके उन्हें भी लगा दिए जाएं, जिन्हें वह रोग हो ही नहीं। ऐसी प्रक्रिया तो किसानों के भीतर कांग्रेस के लिए भी नाराजगी का संचार ही करेगी। इससे होगा यह कि कर्ज का मर्ज उलटे राज्य सरकार के ही गले पड़ सकता है। कहना गलत नहीं होगा कि बीते दशकों में प्रदेश में सहकारी आंदोलन की कब्र खोदी गयी। अब कब्र के डरा देने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। वहां कांग्रेस या भाजपा सरकारों की करतूतों की सड़ी-गली लाशें दिखती हैं। इन लाशों को ठिकाने लगाये बगैर नाथ सरकार को ऋण माफी की दिशा में अब और कोई  कदम नहीं बढ़ाना चाहिए। सबसे पहले तो साफ-साफ तय करना होगा कि वास्तविक कर्जदार कौन है। फिर कानून के हाथ उन गिरेहबानों तक पहुंचाने चाहिएं, जिनके हाथ किसानों की दुर्दशा हुई है। इसके बाद कर्ज माफी की बात होना चाहिए।  यह पूरी तरह सच है कि शिवराज सरकार की रुखसती में किसानों से कांग्रेस के किए कर्ज माफी के वादे ने अहम भूमिका निभाई। इसलिए नये मुख्यमंत्री नाथ को चाहिए कि इसी तबके की नाराजगी के शमन का सबसे पहले इंतजाम करें। वरना गलत से आंख मूंदने की बदनामी के छींटे उनकी सरकार पर आना पूरी तरह तय है।


सरकार किसान के सामने यह स्पष्ट करें कि जो गलत हुआ, वह पहले उसे ठीक करेगी और जिसने गलत किया, उस पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। तब कहीं जाकर यह  संदेश मिलेगा कि सरकार राहुल गांधी की चुनावी घोषणा का ईमानदारी से पालन करने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रही है। दस दिन में कर्ज माफी को भी जुमला मान लेने में बुराई नहीं है। फिर यह जांच तो सबसे ज्यादा जरूरी है कि जब किसानों ने कर्ज लिया ही नहीं, तो उनके नाम से आवंटित की गयी भारी-भरकम रकम आखिर किसकी जेब में गयी? अनुमान है कि यदि इस दिशा में जांच आगे बढ़ायी गयी तो एक बड़े सहकारिता घोटाले को उजागर करने का जतन साबित हो सकता है।  बिहार का चारा घोटाला तो सभी को याद होगा। मध्यप्रदेश में किसानों की जो हालत दिख रही है, उसके आलोक में यहां अरबों रुपए का 'बेचारा घोटाला' होने की बात कही जा सकती है। बेचारा वह किसान है, जो दशकों तक हुक्मरानों को अपना  सच्चा खैरख्वाह मानकर लगातार उनके पक्ष में मतदान करता रहा। बेचारा हर वह परिवार भी है, जिस पर कर्ज लिए बगैर लाखों रुपए की रकम चढ़ा दी गयी। बेचारा वह सहकारिता आंदोलन भी है, जिसे भ्रष्टाचार की दीमक ने भीतर से पूरी तरह खोखला कर दिया। लेकिन कमलनाथ बेचारे नहीं हैं। उनके पास सरकार है। वे न तो सहकारिता के नेता हैं और न उनकी पहचान किसी किसान नेता सी बनी है। ताकत और अधिकार का इस्तेमाल करना वे बेहतर जानते हैं। सवाल सिर्फ तंत्र पर सवारी का है। अगर उन्होंने तंत्र की लगाम सही तरीके से कस दी तो इन सबका इस्तेमाल कर वे 'बेचारा घोटाले' की पूरी निष्पक्षता से जांच करवा सकते हैं, ताकि सहकारिता के अभ्यारण्य में घुसपैठ कर चुके आदमखोरों को जल्द से जल्द ठिकाने लगाया जा सके। 

loading...

प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति