कोई तो छाप दे कमलनाथ का ‘वैसा’ इंटरव्यू



स्थापित अखबारों द्वारा किसी मुख्यमंत्री के चम्चत्व की चाशनी में पगे इंटरव्यू की परम्परा अब परिष्कृत रूप ले चुकी है। चमचागिरी को कार्पोरेट का जामा पहना दिया गया है। वरना, वह समय भी था, जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने। तुरंत ही एक अखबार के दो रिपोर्टर-रूपी हरकारे राघौगढ़ किले की ओर दौड़ाये गये। जिन्होंने खबर प्रकाशित कर बताया कि इस प्रदेश को राजा के रूप में कितने महान परिवार का जनसेवक मिला है। एक स्थापित सज्जन की तो पत्रकारिता की सक्रियता ही केवल तब तक दिखी, जब तक मालिकान ने उन्हें किसी मुख्यमंत्री के कार्यकाल का एक, दो तीन या चौथा साल पूरा होने पर उसका पूरे पृष्ठ का आल्हा-ऊदल शैली वाला इंटरव्यू छापने की इजाजत देकर रखी थी। कमलनाथ के मामले में ऐसा नहीं हो पा रहा। यह मेरे दु:ख का विषय है। क्योंकि यह हरकारे ही बता सकते हैं कि प्रदेश का नया मुख्यमंत्री चुटकुल सुनता है या नहीं। वह फिल्मों का शौकीन है या नहीं। मेरे लिए इन दो सवालों के जवाब जानना जरूरी है। अब इसकी वजह भी सुन लीजिए। वह यह कि एक भी गाय सड़क पर न दिखने की नाथ की चेतावनी सुनकर मुझे लतीफे और फिल्म, दोनो याद आ रहे हैं।  पहले लतीफा। अरब का शेख बेशकीमती कपड़ो से भरे दो संदूक लेकर चला। रास्ते में नींद लेने से पहले उसने नौकरों को हिदायत दी कि यदि बारिश हो तो किसी भी सूरत में संदूक नहीं भीगने चाहिएं। वह सोकर उठा तो चारों ओर बरसात का पानी भरा हुआ था। उसने नौकरों से पूछा कि संदूक की हिफाजत कैसे की गई। नौकर बोले, ‘हमने संदूकों पर उनके भीतर रखे कपडे लपेट दिए।


कपड़े बर्बाद हुए, लेकिन आपके कहे अनुसार हमने संदूकों को भीगने नहीं दिया।’  फिल्म की बात करने से पहले मैं मुख्यमंत्री जी से क्षमा चाहूंगा। क्योंकि शीर्षक उन्हें अतीत में ले जाकर नागवारी से भर सकता है। शीर्षक है, ‘किस्सा कुर्सी का,’ जिसमें सरकार चूहा पकड़ने वालों को ईनाम देने का ऐलान करती है। इसके जरिये सरकारी तंत्र में व्याप्त भर्राशाही और सामाजिक विषमता का बखूबी चित्रण किया गया था। तो, गौ-माता के सड़क पर न दिखने की नाथ की चेतावनी भी लतीफे या फिल्म के इर्द-गिर्द ही घूूमती दिख रही है। क्योंकि दिग्विजय सिंह से लेकर उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल के अनुभव बताते हैं कि राज्य की अफसरशाही महा घाघ है। वह तुरंत यह सुनिश्चित कर देगी कि मुख्यमंत्री को सड़क पर एक भी गाय न दिखे, लेकिन यह पक्का नहीं किया जाएगा कि नाथ की मंशा पूरी हो। निश्चित ही मुख्यमंत्री का आशय गाय की हिफाजत से है। अपने पूर्व चार मुख्यमंत्रियों की घोर असफलताओं की तफ्तीश की होती तो नाथ साफ-साफ कहते कि वह गाय की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं। तब कहीं जाकर शायद नौकरशाही इस दिशा में कदम उठाती। क्योंकि अफसर तो वही हैं, जो अपने पांव पर गिरते किसान को नजरंदाज कर चल दे रहे हैं। जिसके चलते ज्योतिरादित्य सिंधिया को संबंधित कलेक्टर को फोन कर किसान की मदद के लिए कहना पड़ा। सरकारी फौज वही है, जिस पर अविश्वास के अंदाज में दिग्विजय सिंह को यह ट्वीट करना पड़ रहा है कि पाला पीड़ित इलाकों का फौरन सर्वेक्षण कराया जाए।  खैर, गाय है तो राष्ट्रीय विषय।


उसके नाम पर पल-भर में सैंकड़ों तलवारें हवा में लहरा जाती हैं। हिंदी भाषी प्रदेश में यह तलवार गाय की हिफाजत के नाम पर एक हाथ में कानून लेकर उठाई जाती है। दक्षिण भारत में यह शमशीर उसी गाय को कत्ल कर बीफ का सेवन करने के लिए लहराने का चलन है। गाय की दुलत्ती पड़े तो पल भर में नसीरूद्दीन शाह जैसा शख्स देशद्रोही करार दे दिया जाता है और उसी का आशीर्वाद मिले तो मध्यप्रदेश में कई थकेले नेता गो-सेवा आयोग की शरण में अपने सुखद रिटायरमेंट का इंतजाम कर लेते हैं। ऐसी सियासी दुधारू गाय के लिए नाथ की चिंता वाजिब है। आखिर गाय का संबंध नंदी से है। नंदी का संबंध भगवान शिव से है और नाथ का सीधा ताल्लुक उस पार्टी से है, जिसके सर्वेसर्वा को शिव भक्त का खिताब हाल ही में दिया गया है।  ‘सरकार’ फिल्म में एक गैंग्स्टर अपने आका रहे डॉन के बेटे को जान से मारने का आदेश देते हुए कहता है, ‘इसे मारते समय ज्यादा तकलीफ मत देना। इसके पिता के मुझ पर बहुत अहसान हैं।’ गाय की हिफाजत के लिए गला फाड़ने वाले अधिकांश राज्यों में यही भाव दिखता है। सड़क पर इधर-उधर पन्नियां बिखेरने वाले पूरी ताकत से ‘गाय हमारी माता है’ का नारा लगाते  हैं  । जबकि उनकी यही पन्नी खाकर असंख्य गायों की अकाल मौत हो जाती है। अधिकांश गौ-पालक इस पशु को चारे के नाम पर बेचारा करके रखते हैं। नतीजतन यह निरीह पशु यहां-वहां बिखरी गंदगी से भोजन तलाशकर बीमार हो जाता है। इसलिए मुख्यमंत्री जी, सिर्फ सड़क पर गाय न दिखने की बात से बात नहीं बनेगी। इस पशु की हिफाजत के पुख्ता प्रबंध कीजिए। जन-चेतना से लेकर कठोर दंड तक का प्रावधान करें। किसी कांजी हाउस में जाकर वहां की गायों की दुर्दशा देख लें। खुद आप समझ जाएंगे कि होना क्या है और उससे ठीक उलट, क्या होने जा रहा है।  

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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