खुद मुस्लिम दें इस करतूत का जवाब



  सचमुच आज शब्दों का अकाल महसूस कर रहा हूं। जो शब्द मन में आ रहे हैं उन्हें लिखना मुश्किल है। न तरस खाने के लिए उपयुक्त वाक्य मिल पा रहा है और न ही क्रोध जताने के लिए समुचित बात मन में आकार ले पा रही है। यह भाव ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल और हुसैन दलवई के लिए हैं। राजनीति में हद से गुजर जाना जिन-जिन वाकयों को कह सकते हैं, उनमें से एक कल सोमवार को देश के सामने आ गया। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य दलवई ने कहा है कि रमजान के दौरान आम चुनाव होने से मुस्लिम मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाएंगे।  अल्पसंख्यकों के वोट हथियाने के नाम पर इस भौंडे तरीके से उनके पवित्र महीने का इस्तेमाल करने की यह घातक प्रवृत्ति इस मुल्क ने पहली बार देखी है। जवाब में वही हुआ, जो आजकल पलक झपकते ही हो जाता है। मांग उठ गयी कि यदि ऐसा है तो फिर हिंदू त्योहारों का भी चुनाव के नजरिए से ध्यान रखा जाना चाहिए।  तुष्टिकरण के मामले में समय आने पर कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं रहता।


लेकिन अधोपतन इस हद तक हो जाए तो समझ नहीं आता कि ऐसा करने वालों की बुद्धि पर दया की जाए या फिर उनकी कुत्सित फितरत पर गुस्सा जताएं। अब तक तो इस बात पर ही हैरत होती थी कि क्यों कर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन को रोककर पहले ताजियों को सिराये जाने की पक्षधर बनी हुई हैं। अजूबा इस बात पर भी लगता था कि क्यों समाजवादी पार्टी भारत माता को डायन कहने वाले मोहम्मद आजम खान को सीने से चिपकाई हुई है। आज इन बातों का जवाब कुछ-कुछ साफ हो रहा है। वह यह कि तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल और समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश को अब तक तुष्टिकरण की प्रयोगशाला बनाकर इस्तेमाल किया है। अब चुनाव सामने आते ही वह इस दिशा में कई कदम और आगे बढ़ने को आतुर दिख रहे हैं।  इन दो नेताओं के सुर में सुर मिलाने वाले केजरीवाल के लिए आप तो ऐसे न थे कहकर हैरत जतायी जा सकती है, लेकिन वह थाली के बैंगन वाली फितरत के मारे हैं। अपनी पार्टी का दिल्ली से बाहर पुख्ता जनाधार न बन पाने की कुंठा के गुप्त रोगी हैं। लिहाजा उनसे ऐसे आचरण की उम्मीद करना गलत नहीं होगा। कल उठे विरोध के स्वरों की एक पहलू से पड़ताल अवश्यंभावी बन गयी है।


वह यह कि आखिर इस देश में सियासी दलों की नजर में मुस्लिमों की क्या छवि है? क्या वह यह मान बैठे हैं कि मामला उस कौम का है, जो मजहब की बात कहकर जरा  में बरगलाई जा सकती है? क्या उन्हें इस बात का दृढ़ विश्वास है कि देश के मुसलमान को उसके पक्ष में बचकानी दलीलें देकर बहलाया जाना बच्चों का खेल है? यदि वे ऐसा सोचते हैं तो फिर मूर्खता के चरम की नयी परिभाषा इस समाज को मिल गयी है। असदुद्दीन औवेसी की बात में दम है। मुस्लिमों के हित में उनके तर्कों को काटना थोड़ा मुश्किल होता है। वह फरमाते हैं कि जब रमजान के दौरान मुस्लिम बाकी सभी दैनदिनी काम करते हैं तो फिर मतदान में क्या दिक्कत आ सकती है? और मतदान में समय भी कितना लगता है? देश में इस पवित्र महीने के दौरान पहले भी चुनाव हुए हैं और उसका किसी स्तर पर विरोध नहीं हुआ। लेकिन इस बार जो मुद्दा उठाया गया, वह जताता है कि इस चरम मूर्खता के पीछे चुनाव में हार का खौफ काम कर रहा है। समय आ गया है कि खुद मुस्लिम अपने पाकीजा महीने के राजनीतिकरण की इस हरकत का जवाब दें। जता दें कि उनकी मान्यताएं और धार्मिक आचरण इतने कमजोर नहीं कि तुष्टिकरण की सियासत के घाघ लोगों का उसे सहारा लेना पड़ जाए। कल उठी यह मांग इस बात का द्योतक है कि चुनाव तक धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर किस-किस तरह के प्रपंच और रचे जा सकते हैं। इससे मुल्क की आवाम को सावधान रहना होगा। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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