कालीराम का फट गया ढोल



हमाम में दोनों की हालत एक सी है। दोनों डरे हुए हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस को जैसा जनादेश सत्ता चलाने का मिला है, उसके डर स्वाभाविक हैं। पर भाजपा पन्द्रह साल लगातार सत्ता में रहने के बाद सम्मानजनक ढंग से सत्ता से बाहर हुई है। लिहाजा, उसे तो बड़ा दिल रखना चाहिए था। आखिर विधानसभा चुनाव का ताजा जनादेश भाजपा को एक मजबूत विपक्ष की भूमिका देने का ही है। कांग्रेस के पास लंगडा बहुमत है तो भी अच्छा होता कि सत्तापक्ष और विपक्ष आपस में संवाद कायम करके विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का फैसला करते तो परम्पराएं बची रह जाती। लेकिन डरी हुई कांग्रेस ने प्रोटेम स्पीकर के चयन में ही परम्पराओं को तोड़ दिया और उसके बाद जिस तरह से विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव हुआ तो तय मान कर चलिए अब जब तक कमलनाथ की सरकार को चलना है, विपक्ष के साथ लगातार टकराव ही उसकी नियती होगा। सद्भावना की गुंजाइश दोनों तरफ से खत्म ही मान लेना चाहिए। फिर भी मुझे लगता है कि कांग्रेस से ज्यादा सब्र का परिचय फिलहाल भाजपा को देना था।   बुद्धदेव दासगुप्ता की एक फिल्म थी, 'बाघ बहादुर'। यह देश के उस प्रदेश से जुड़ा मामला है, जिसे बाघ यानी टाइगर स्टेट कहा जाता है। सीधे-सीधे यह उस शख्स से संबद्ध घटनाक्रम है, जिसने सत्ता खोने के बाद खुद ही अपने लिए 'टाइगर' का नया खिताब चुन लिया है। जाहिर है बात शिवराज सिंह चौहान से संम्बद्ध है। राज्य विधानसभा में मंगलवार को जो कुछ हुआ, वह एक शेर याद दिलाता है। 'बरसे बगैर कोई घटा आ के छंट गयी, एक बेवफा का अहदे-वफा याद आ गया।' शिवराज और गोपाल भार्गव एंड कंपनी की गर्जना तो सुनने लायक थी। एक बारगी लगने लगा था कि नर्मदा प्रसाद प्रजापति बाघ के शिकार हो जाएंगे। लेकिन हुआ इससे ठीक उलट। जो गरजे, वो बरस नहीं सके। मतदान की नौबत आयी तो सदन से बाहर चले गए। फिर वही हुआ, जो कांग्रेस चाहती थी। प्रजापति विधानसभा अध्यक्ष बन गये। यह एक लतीफे के नजदीक का मामला है। चोर घर में घुसा। पति-पत्नी जागे तो उसने चाकू निकाल लिया। पति की घिग्घी बंध गयी।


चोर की नीयत महिला पर खराब हो गयी। उसने चॉक से एक घेरा बनाया। पति से बोला कि इससे बाहर निकला तो उसे चीरकर रख देगा। फिर वह महिला से मनमानी के बाद आराम से चलता बना। चोर के जाते ही पत्नी ने बिफर कर कहा, कैसे पति हो तुम! सब कुछ हो गया और कुछ हिम्मत न जुटा सके। पति ने जवाब दिया, मेरी हिम्मत तुम्हें क्या मालूम! जब वो मनमानी कर रहा था, तब कई बार मैंने घेरे से बाहर पैर निकाला था। विधानसभा में  प्रोटेम स्पीकर के दम पर कांग्रेस जो चाहती थी, वह कर गयी और भाजपाई सूरमा घेरे से बाहर पैर निकालने की तर्ज पर सशरीर सदन से बाहर जाकर हिम्मत दिखाने का उपक्रम करते रहे।  अब जब लड़ने का फैसला कर ही लिया था तो हारने से क्या डरना था। कांग्रेस ने शुरूआत बेईमानी से की लेकिन लगता है जैसे कुश्ती 'नूरा' थी। क्योंकि कांग्रेस बाद में पांचवा प्रस्ताव भी मानने को तैयार थी, लेकिन भाजपा ने सदन से बाहर जाने का फैसला शायद पहले ही कर लिया था। यह तो परसों रात ही तय हो गया था कि कांग्रेस के पास 121 सदस्यों के समर्थन की पुख्ता व्यवस्था है। ऐसे में भाजपा को जगहंसाई कराने से बचना चाहिए था। उसने कल निर्णय लिया कि इस पद के लिए चुनाव कराएगी। फिर ऐनवक्त पर पार्टी ने बहिर्गमन किया तो क्या उसका भी डर नहीं था कि वोटिंग होने की सूरत में उसके ही कुछ सदस्य कांग्रेस के प्रत्याशी का समर्थन कर सकते हैं? इसलिए अपनी जांघ उघाड़कर दिखने की प्रक्रिया से बचने के लिए उसके सदस्यों को सदन से बाहर का रुख करना पड़ा? इससे बेहतर तो यही होता कि राज्य की परम्परा के अनुरूप अध्यक्ष पद पर सत्तारूढ़ दल का विधायक चुनने दिया जाता और उपाध्यक्ष पद सम्माजनक तरीके से भाजपा के खाते में आ जाता। पर डरी हुई कांग्रेस ने पहले से ही उपाध्यक्ष का पद खुद के पास रखने का फैसला किया हुआ था। उपाध्यक्ष कोई बहुत निर्णायक भूमिका में नहीं रहता है लेकिन जब रोज के ही टकराव सामने दिख रहे हैं तो सत्तापक्ष के पास इसके अलावा रास्ता भी बाकी नहीं था।


इसलिए मध्यप्रदेश में सत्तापक्ष और विपक्ष फिलहाल दोनों एक दूसरे से डरे हुए नजर आ रहे हैं। आज के घटनाक्रम से एक बात तय है। कांग्रेस के मन से 109 सदस्यों वाले भारी-भरकम विपक्ष का खौफ कम नहीं हो पाएगा । यदि भाजपा ने 'बंद मुट्ठी लाख की...' वाली बात ध्यान रखकर चुनाव का निर्णय नहीं लिया होता, तो आज उसके लिए भी '...खुल गयी तो खाक की' वाली नौबत आती, यह तय नहीं था। लेकिन ऐसे में एक्सपोज तो वो कांग्रेस होती जो भाजपा पर हार्सट्रेड़िग के आरोप लगा रही है। आश्चर्य होता है कि कांग्रेस के पास अपने और परायों के साफ बहुमत के बावजूद अध्यक्ष पद हेतु मुकाबला करने का फैसला राजनाथ सिंह जैसे घुटे हुए राजनीतिज्ञ की मौजूदगी में लिया गया था तो फिर मैदान छोड़ने की रणनीति का क्या मतलब हुआ। उपसंहार से पहले जरा 'बाघ बहादुर' की बात हो जाए। फिल्म का मूल चरित्र बाघ का स्वांग रचकर लोगों का मनोरंजन करता था। वह अपने गांव में लोगों की श्रद्धा का केंद्र था। फिर एक दिन वहां असली बाघ पहुंच जाता है। जिसका रिंग मास्टर रोज शाम पिंजरें में उतरकर बाघ से लड़ाई का खेल दिखाता था। इसके चलते बाघ बहादुर की लोकप्रियता घट जाती है। तब वह रिंगमास्टर को चुनौती देता है कि पिंजरे में जाकर बाघ से लड़ेगा। यदि वह जीता तो असली बाघ हमेशा के लिए वहां से रुखसत कर दिया जाएगा। भीषण संघर्ष में बाघ अंतत: बाघ बहादुर को ढेर कर देता है। शिवराज खुद को टाइगर बता रहे हैं, वह कम से कम इस फिल्म जैसे बाघ बहादुर तो साबित नहीं ही हो पाए। पिंजरे के भीतर जाकर संघर्ष करने की बजाय वे पलटन सहित वहां से भाग निकले। आज का दोष ताजा बने नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव पर कम हैं। क्योंकि सदन में बहिर्गमन का एलान भी शिवराज ने ही किया था। हां, एक बात और। फिल्म में बाघ बहादुर के मरने के बाद भी उसका एक समर्थक लगातार ढोल बजाता रहता है। यह हिंसा से अहिंसा के अनवरत संघर्ष  का प्रतीक दृश्य था। जहां तक शिवराज एंड कंपनी के पलायन का सवाल है, उससे 'बाघ बहादुर' की बजाय एक अन्य फिल्म का गीत ही याद आ रहा है, जिसके बोल थे, 'कालीराम का  फट गया ढोल...।' अब भला और क्या कहा जा सकता है?

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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