इससे पहले कि बहुत देर हो जाए



आओ हो जाए मुकाबला। मामला खालिस सियासी है। सिनेमा के नजदीक भी दिखता है। राजकपूर की फिल्म 'जिस देश में गंगा बहती है' की तरह। दो विरोधी पक्षों के बीच 'हम भी हैं, तुम भी हैं, दोनो हैं आमने-सामने' वाली शैली की याद दिलाती हुई। बता दें कि इस फिल्म के कई हिस्से मध्यप्रदेश में नर्मदा के तट पर बसे भेड़ाघाट में फिल्माये गये थे। मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी को गंगा नदी बताते हुए।  तो इसी मध्यप्रदेश के नर्मदा तट पर बसे शहडोल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को आज चुनौती दे डाली। अब तंज में बदले जा चुके 'चाय वाले' का जवाब उन्होंने कांग्रेस की तथाकथित दरबारी पद्धति की खाल उधेड़ते हुए दिया। एक ही परिवार की बात कही और चुनौती दे डाली कि कांग्रेस की चार पीढ़ियों ने जो विकास किया और उनकी सरकार के चार साल का मुकाबला करा लिया जाए।  सचमुच जो लोग  खोये हुए विकास को तलाश रहे हैं, तो इसमें उनकी गलती नहीं है। क्योंकि इस चुनाव में विकास का मुद्दा तो कहीं जा छिपा लगता है। जो है वह अहंकार से भरा हुआ। दूसरे को किसी भी हद तक जाकर नीचा दिखाने के 'वैमनस्यपूर्ण' भाव से परिपूरित। अमित शाह फरमाते हैं कि मनमोहन सिंह देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का हक चाहते थे, लेकिन मोदी आदिवासियों सहित दलितों के लिए उनकी पैरवी करते हैं। मोदी को फिक्र है कि कांग्रेस में एक ही परिवार का कब्जा है।


किंतु इस सबके बीच वह बात कहां है, जिसे सुनकर कहा जा सके कि किसी ने काम के नाम पर वोट मांगा है? कायदे से मोदी को नोटबंदी के बाद देश को हुए फायदे के बारे में बताना था। जीएसटी की उपलब्धियां गिनानी थी। उज्जवला योजना के तहत धुएं से मुक्त महिलाओं की बात करना थी। देश में चले सफाई अभियान पर बात करना थी। गरीबों के लिए आवास का मुद्दा उठाना था। और जो भी अपनी सरकार की इन चार सालों में मिली उपलब्धियां मोदी को इस लायक लगती जो मतदाता को उन्हें वोट देने के लिए प्रेरित करतीं, वो गिनानी चाहिए थी। कांग्रेस की चार पीढ़ियों ने क्या किया, यह देश जानता है और अच्छे बुरे फल कांग्रेस को मिलते रहे हैं। बारी तो अब इन साढ़े चार सालों की है। एक अहम सवाल। इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप आखिर किसके लिए लगाए जा रहे हैं? क्या आम जनता का पेट इस बात से वाकई दुख सकता है कि किसी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर परिवारवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है? यदि ऐसा है तो फिर पेट में मरोड़ तो इस मसले पर भी उठेगी कि इसी  प्रदेश में कैलाश विजयवर्गीय, डॉ. गौरीशंकर शेजवार और हर्ष सिंह जैसे दिग्गज भाजपाई अपने बेटों के लिए सियासी बिसात बिछाने में कामयाब हो गए हैं। वो भी 'पार्टी विद डिफरेंस' के नाम पर। देश की आम जनता ने कांग्रेस को कभी भी परिवारवाद के चलते खारिज नहीं किया। और भी देश की तमाम क्षेत्रीय पार्टियां भी परिवारवाद से ही चल रही हैं और जनता उन्हें स्वीकार करती है।


कायदे से भाजपा के वैचारिक दुश्मन कामरेड़ों के अलावा अब देश में कोई और ऐसा दल है ही नहीं जो परिवारवाद या व्यक्तिवाद से ऊपर उठ कर राजनीति कर रहा हो। तो अब मोदी को कांग्रेस को लताड़ना हो तो उसके कामों पर लताड़े। बताने को अपनी उपलब्धियां हो तो वो बता कर तुलना करें।  जनता को इस बात से मतलब है कि किसने उसके हित में काम किया और किसने नहीं। पीढ़ी दर पीढ़ी गांधी-नेहरू परिवार की बपौती बनी रहने के बावजूद यदि कांग्रेस कई साल तक देश की सत्ता संभालने में कामयाब रही तो इसकी वजह आम जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता और विकल्प का अभाव था । वही स्वीकार्यता यदि हासिल हुई तो विजयवर्गीय सहित शेजवार और सिंह के चिरंजीव भी दिसंबर के दूसरे सप्ताह में विधायक बने नजर आ जाएंगे। तो फिर दरबारी होने पर हायतौबा किसलिए? किसी परिवार का आधिपत्य होने पर विधवा प्रलाप की स्थिति क्यों नजर आना चाहिए?  खैर, मोदी हैं, शाह हैं और हैं राहुल गांधी भी। तीनों जब तक मध्यप्रदेश की सरजमीं पर सक्रिय हैं, ऐसे आरोप लगते रहेंगे। जुमले उछलते रहेंगे। मीडिया के एक वर्ग को खबरों की खुराक मिलती रहेगी। लेकिन आम जनता भ्रम का शिकार रहेगी कि इस सबमें उसके लिए क्या है। कहां हैं वह तथ्य और कामयाबियां, जिनकी बदौलत वह किसी दल को वोट देने या न देने का मन बना सके। शायद यही वजह है कि चुनाव पार्टी की बजाय व्यक्ति पर तेजी से केंद्रित होता जा रहा है। प्रत्याशी का आंकलन उसकी जाति या धर्म के आधार पर होने लगा है। नीतियों की जगह जातियों ने ले ली है। यह लोकतंत्र का वह काला अध्याय है, जो अंतत: घोरतम कालिख का ही सबब बनेगा। इससे सबक लेने की जरूरत है, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।  

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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