क्या यह "वन डे मात्र रोम" का वक्त है?



आमिर खान एक विज्ञापन करते थे। शीतल पेय का। उसमें एक औरत कहती है कि हर काला और ठंडा पेय कोला होता है। खान का किरदार कहता है कि 'यदि ऐसा है तो यह भेड़ नहीं बकरी है। यह पहाड़ नहीं नदी है और यह जमीन नहीं आसमान है।' औरत चकराती है तो खान कहते हैं, 'यदि हर काला और ठंडा पेय कोला है तो फिर यह सब क्यों नहीं हो सकता?' इसलिए यदि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ कहते हैं कि वंदे मातरम का परिवर्तित स्वरूप लागू किया जाएगा, तो यह बात गले के नीचे  नहीं उतर पाती है। वंदे मातरम का क्या कोई विकल्प है? यह हमारा राष्ट्रगीत है। फिर भला इसे गाये जाने की परंपरा को बंद करने और उसके बाद बचकाना तर्क देने का क्या अभिप्राय हो सकता है। नाथ अब पलटवार कर रहे हैं। भाजपा के हमलों पर उनका सवाल है कि क्या यह गीत न गाने वाला देशभक्त नहीं कहा जाएगा? ऐसा नहीं है। कोई वंदेमातरम गाये बगैर भी देशभक्त हो सकता है। लेकिन इस गीत का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से विरोध तो राज्य की नयी सरकार ने कर ही दिया है। मुमकिन है कि शिवराज सरकार के फैसलों को पलटने के उतावलेपन में ऐसा हो गया हो, लेकिन राष्ट्र के सम्मान से जुड़े मामले में इतना अहं नहीं अपनाया जाना चाहिए। बेहतर होता कि मुख्यमंत्री इस घटनाक्रम को गलती के रूप में स्वीकारते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।


नाथ से बेहतर प्रतिक्रिया तो उनके कानून मंत्री पीसी शर्मा ने दी। उन्होंने साफ कहा कि ऐसा भूलवश हो गया होगा और इसके कारणों का परीक्षण करवाया जाएगा।  वैसे आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सरकार वाकई राष्ट्रगीत वाली बात भूल गयी हो। क्योंकि यह सरकारी आयोजन था और जिन अफसरों पर इसका दारोमदार था, वह इन दिनों नयी सरकार के हिसाब से खुद को ढालने में मसरूफ हैं। और गलती जाहिर तौर पर पलटीबाज अफसरों की ही है। हो सकता है कमलनाथ ने इस कार्यक्रम में अपनी व्यस्तताओं की वजह से आने में असमर्थता जताई हो और इसलिए अफसरों ने इसका मतलब इसे बंद करने से लिया हो। इसलिए अफसरशाही ने तर्क भी दिया कि इसमें मंत्रालय के ज्यादा लोग तो आते नहीं थे। तीन हजार से ज्यादा कर्मचारियों में बस दो-चार सौ आते थे। जहां तक सरकार की बात है, तो वह इस समय जीत के मद में चूर है। नशा कई बातें दिमाग से उतार देता है। ऐसा ही हार के सदमे में भी होता है। शायद इसीलिए ऐसा हो गया कि बीती 11 दिसंबर के बाद से फालिज की शिकार दिख रही भाजपा अपने पितृ पुरुष कुशाभाऊ ठाकरे और पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा को उनकी पुण्यतिथि पर भूल गयी। इन दिवंगत विभूतिओं की स्मृति में कहीं कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किए गए।&


  तो यह मान लिया जा सकता है कि जीत के मद और हार के सदमे के चलते प्रदेश में सत्तारूढ़ एवं मुख्य विपक्षी दल की याददाश्त को कुछ जंग लग गयी है। यूं भी कमलनाथ इस समय ज्यादा ही परेशान चल रहे हैं। डरे हुए हैं। इतने अधिक कि दलित आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के आरोपियों पर से मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया में मायावती की एक ही धमकी में जुट गए। मायावती ने उन्हें साफ धमकी दी है। कमलनाथ की डगमगाती नैया को बहुमत रूपी चप्पू के लिए मायावती के दो विधायकों की काफी जरूरत है। यूं तो कमलनाथ को मौका मिला तो वे हर हाल में विधानसभा से बसपा का खात्मा कर ही देंगे लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से लोकसभा चुनाव तक तो इंतजार करना ही पड़ेगा। लिहाजा कमलनाथ की राष्ट्रगीत संबंधी गलती को यह कहकर भी बिसराया जा सकता है कि कुछ तो सत्ता के मद ने और कुछ इस मद को बनाये रखने के इंतजामात की फिक्र ने उन्हें वंदेमातरम से विरत कर दिया हो सकता है। ऐसे मौके इस सरकार में बार-बार आएंगे। कांग्रेस की नीयत पर शक नहीं है। लेकिन कयास तो लगाया ही जा सकता है। एक बात रह-रहकर याद आती है। इस विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 'वक्त है बदलाव का'  नारा दिया था। वह सही साबित हो गया। इसलिए महीने के पहले दिन वंदेमातरम गाने की प्रथा भी बदलाव की जद में आ गयी होगी। तो नाथ क्या परिवर्तित स्वरूप लागू करेंगे? क्या वह "वन डे मात्र रोम" होगा? रोम इटली की राजधानी है और इटली से नाथ जैसे सच्चे कांग्रेसियों का क्या पावन नाता है, यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है।

loading...

प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति