शिवराज नहीं तो कुछ भी नहीं?



चलिए, शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रियों को नतीजा आने से पहले ही विधानसभा चुनाव में जीत की बधाई दे दी है। बुधवार को कैबिनेट की बैठक के बाद मुख्यमंत्री के कक्ष से बाहर आते मंत्री मिले-जुले भाव में तैर रहे होंगे। पहला, 'शिवराज ने कहा है तो फिर जीत तय है।' दूसरा, '..बस दुआ यही है कि मंत्री पद बचा रह जाए।' टिकट पा चुके भाजपा विधायक भी अपनी जीत की दुआ और बोनस में मंत्री की कुर्सी की कामना कर ही रहे होंगे। मुख्यमंत्री के इस यकीन से जुड़ी खबर पढ़ने के बाद बाबूलाल गौर, सरताज सिंह, कुसुम मेहदले और माया सिंह के दिल पर क्या बीत रही होगी, इसका भी सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। बुधवार को वल्लभ भवन का यह घटनाक्रम मध्यप्रदेश सरकार के लिए शुभ संकेत हो सकता है। भाजपा के लिए इसे 'शुभ' कहना कठिन लग रहा है। मंत्रियों को खुद के काम पर भरोसा नहीं है? वह इस कदर आउटडेटेट हो चुके हैं कि  मतदाता का रुख समझने की क्षमता भी खो चुके हैं? शिवराज ने कहा है तो 'जीत ही जाएंगे' का यह भाव उस पार्टी का तो कतई नजर नहीं आता, जिसके आदर्शों और विचारों में व्यक्तिवाद से संगठन हमेशा ऊपर रहा है। पर अब ऊपर से नीचे तक भाजपा का फ्रेम बदल रहा है। जो भाजपा कभी अपने संगठन को इस दम से नीचे तक मजबूत रखती थी कि कोई चेहरा उस संगठन का विकल्प न बनने  पाए। लेकिन फिर वो सर्वव्यापी तो चेहरे और संगठन के तालमेल से ही हुई। अटल बिहार वाजपेयी से लेकर नरेन्द्र मोदी के दौर तक भाजपा की सफलता में चेहरे और संगठन के तालमेल ने ही भारतीय राजनीति की दिशा को बदला है।   लेकिन मध्यप्रदेश में तो वो भी होता नजर आ रहा है, जिसकी भाजपा में उम्मीद नहीं थी।


इसके बीज उस नीति-निर्धारक ने बोये, जिसने किसी समय नंदकुमार सिंह चौहान को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया था। यह खेती उन कर्ताधर्ताओं की भी देन है, जिन्होंने किसी भी तरह चुनाव जीतने की होड़ में इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज किया कि किस तरह राज्य में पार्टी और सरकार के नाम पर सिर्फ और सिर्फ 'शिवराज नामक संस्था' का ही वजूद बाकी रह गया है। भाजपा के चाहे जिस स्तर के कार्यकर्ता से बात कर लीजिए। हर कोई अपने विधायक को हारा हुआ मान रहा है। मंत्रियों के क्षेत्र में बात कर लीजिए तो शायद ही इक्का दुक्का मंत्री ऐसे हैं जिनके क्षेत्र का कार्यकर्ता उनके जीतने की संभावना देख रहा है। इसके बावजूद सरकार सब भाजपा की बना रहे हैं। भाजपा ने जिस तरह उम्मीदवार तय किए, माना यही जा रहा है कि इसमें शिवराज की पसंद को तवज्जो मिली है। इसलिए नजारा यह नजर आ रहा है जैसा 1998 में था। तब भाजपा की हार का कारण भाजपा के ही कार्यकर्ता बने थे। अभी भी लगभग ऐसा होता नजर आ रहा है। लेकिन एक फर्क है और वो है, 'ब्रांड शिवराज' का। बीते तेरह सालों में चाहे सरकार के स्तर पर हो या फिर पार्टी के स्तर पर शिवराज को एक ब्रांड के तौर पर ही स्थापित करने की निरंतर कोशिश हुई। इसलिए भाजपा जीतेगी तो यह इस ब्रांड की सफलता है और हारेगी तो यह इस ब्रांड के प्रति लोगों की ऊब होगी। 1998 में हार पार्टी की अपनी और अपने कारणों से थी। तब 'ब्रांड' की समझ भाजपा में शुरू नहीं हुई थी और दिल्ली में अटल बिहार वाजपेयी किसी भी ब्रांड से ज्यादा एक लोकप्रिय राजनेता का बड़ा कद रखते थे।


और इसलिए तमाम एंटी इनकंबेसी से लेकर पार्टी के अपने अंतरविरोध के बावजूद भी अगर भाजपा प्रदेश में चौथी बार सरकार बनाती है तो यह कामयाबी उसके स्थापित ब्रांड की वेल्यू होगी। इसलिए भी कि क्योंकि सरकार है तो पिछले पांच साल में केवल और केवल शिवराज है। बाकी मंत्रियों के नाम पर या तो भाटचारण करने वालों की भीड़ है या इक्के-दुक्के ऐसे चेहरे हैं, जो यही सोचकर खुश होते रहे हैं कि उनका पद सलामत है। नंदकुमार सिंह चौहान ने प्रदेश भाजपा के संगठन को जिस तरह थाली में रखकर शिवराज को अर्पित किया, वैसा तो राज्य में उस समय भी देखने को नहीं मिलता था, जब पटवा-लख्खी की जोड़ी कुशाभाऊ ठाकरे के संरक्षण में अध्यक्ष से लेकर हर महत्वपूर्ण बात के लिए निर्णायक मत रखती थी।  क्या यह वही भाजपा है, जिसके लिए कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी की परछाई बड़ी होने की सूरत में ही उसने योगी आदित्यनाथ को आगे बढ़ाया है? या फिर इसलिए ही शिवराज, रमन सिंह या वसुंधरा का बीते पांच साल के मोदी-शाह युग में बाल भी बांका नहीं हुआ। बीते पंद्रह साल में मध्यप्रदेश में तो शिवराज ही शनै:-शनै: राज्य में सरकार तथा संगठन का पर्याय बन गए हैं। इसमें बुरा नहीं लगना चाहिए। क्योंकि यह शिवराज ही हैं, जिनके चेहरे, पार्टी के प्रति उनकी समझ और लचीले व्यवहार के चलते पार्टी ने लगातार तीन चुनाव में जीत हासिल की। ताजा विधानसभा चुनाव के बाद अब यह सवाल भी सहज रूप से उठ रहा है कि क्या इस मुख्यमंत्री ने ही राज्य में अपना कोई विकल्प पनपने की संभावनाओं को बाकी नहीं छोड़ा है? सवाल तो यह भी उठता है कि क्या शीर्ष नेतृत्व और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तक यह मानकर बैठ गया है कि मध्यप्रदेश में शिवराज नहीं तो कुछ भी नहीं? भाजपा और शिवराज को जाने दीजिए लेकिन भविष्य में भी संघ की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगना थोड़ा कठिन है।

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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