हे नाथ! ये कैसे हो गया...!



हिंदू धार्मिक कहानियों में एक प्रसंग बहुधा आता है। किसी अप्रत्याशित स्थिति के लिए कहा जाता है, फिर मां पार्वती ने भगवान शिव से पूछा- हे नाथ! ऐसा क्यों हो गया! उत्तर में शिवजी संबंधित घटना का संबंधित पात्र के कर्म, भाग्य, दोष या अन्य किसी कारक से संबंध स्थापित कर देते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि पाठक को अच्छे और बुरे कर्म के नतीजों का भान कराया जा सके।  राजनीतिज्ञ तो केवल भारतीय मुद्रा वाली लक्ष्मी को ही देवी और अच्छे राजनीतिज्ञ अवसरों को ही देवता मानते हैं। तो मुमकिन है कि कल की तारीख से लेकर आज तक परेशान हाल दिख रहे कमलनाथ, प्रवीण कक्कड़, राजेंद्र मिगलानी, रातुल पुरी और अश्विन शर्मा जैसे अपने परम भक्तों की सूरत देखकर सियासत की देवी ने अपने समकक्ष देवता से पूछ ही लिया हो, हे नाथ! इन्होंने रात-दिन मेरी ही चिंता की। मेरे लिए ही हर उपक्रम किया। मुझे पाने का कोई मौका नहीं गंवाया। ये आपके सतत दास रहे। आपकी आराधना के लिए दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा। फिर भला इनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है! सादे कपड़े पहनकर कड़क तेवर दिखा रहे ये असुर और उनकी मदद को पापियों की टोली की तरह मुस्तैद ये जवान कौन हैं?  तब अवसर देवता कहेंगे, हमारे भक्तजनों को यह सब इसलिए भोगना पड़ा कि इन्होंने कलयुगी आचरण के महाव्रत की एक पवित्र शर्त का उल्लंघन किया। जिसे सावधानी कहते हैं। देवी, पहले इन्होंने आपकी कृपा हासिल की।


इस पुण्य की बदौलत मैं भी साक्षात रूप से इनके लिए प्रकट हुआ। यहां तक सब वैसा ही था, जैसा कल्कि अवतार के आने के पहले तक चलता रहेगा। लेकिन समस्या यह हुई कि ये सतर्क नहीं रहे। बीती 17 दिसंबर, 2018 के बाद से इन्होंने आपके और मेरे बीच विभेद करने का महापाप किया। यूं तो ये बदस्तूर आपको ही पूजते रहे, लेकिन इस अनुष्ठान का केंद्र इन्होंने आपके माध्यम से अपने हक में मेरे स्थायित्व के प्रयास को बना दिया। इन्हें चाहिए था कि ये सतत रूप से आपका आशीर्वाद हासिल करते रहे। ऐसे में मेरा तो इनके हक में आना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के हिसाब से यूं ही संभव बना रहना था। फिर भी हे देवी, आप किंचित भी परेशान न हों। इनके पास से जो गया, वह इनका था ही नहीं। वह व्यवस्था के जिन-जिन सुराखों, राजनीतिक प्रपंचों की जिन-जिन नालियों, बाहुबल के जिन-जिन षड़यंत्रों से पाया गया, अब सब उन्हीं सुराखों, प्रपंचों और षड़यंत्रों की भेंट ही चढ़ा है। यह विभिन्न राजनीतिक दलों का चोला पहनकर हृदय में हमारे प्रति एक समान श्रद्धा रखने वाले राजनीतिज्ञों के बीच का वह आवागमन है, जो सदा से चलता आ रहा है और यूं ही चलता रहेगा। और हां, जिन कड़क तेवर वाले असुर और वर्दी वाले पापियों का आपने पूछा, वे कलयुग की वो लाठियां हैं, जिन्हें व्यवस्था की भैंस को अपने हिसाब से हांकने के लिए हाथ में पकड़ने का संघर्ष 25 अक्टूबर 1951 अर्थात प्रथम आमचुनाव से लेकर आज तक सतत रूप से चला आ रहा है।


यह काल्पनिक संवाद नंगे सच से भी अधिक यथार्थ के नजदीक है। यकीनन कल से शुरू हुई आयकर छापे की कार्रवाई के तार लोकसभा चुनाव से जुड़ रहे हैं। यकीनन यह भी कि यहां बगैर आग के धुआं नहीं निकला। धुआं ऐसा निकला कि करोड़ों रुपए की बेनामी संपत्ति का गुबार चारों ओर छा गया। कल तक इतराकर, लहराकर चलने वाले चेहरे इस धुएं की कालिख से घिरते दिख रहे हैं। कालिख उन हाथों पर भी दिखती है, जिनके आदेश पर आयकर विभाग ने इतनी बड़ी कार्रवाई की। क्योंकि यह तो मुमकिन नहीं है कि राज्य में केवल एक दल से जुड़े लोग ही भ्रष्ट आचरण कर रहे हैं। इसलिए दिग्विजय सिंह की इस बात में बुराई नहीं दिखती कि छापे तो मामा-मामी और अमित शाह के ठिकानों पर भी मारे जाने चाहिए।  दरअसल, देश की जांच एजेंसियां हर शासन में विरोधी के लिए आंच एजेंसियां बनाकर ही इस्तेमाल की गयी हैं। ऐसा किसी समय इंडियन एक्सप्रेस समूह पर पड़े छापों में दिखा तो आज उनका उदाहरण भोपाल सहित पचास जगह हुई कार्रवाई के रूप में देखा जा सकता है। खुद नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने भी यूपीए सरकार में यह सब भोगा है। भ्रष्टों का खुलासा होना ही चाहिए, लेकिन इस कदम के  पीछे पीक एंड चूज जैसी दुर्भावना हो तो फिर यही कहा जा सकता है कि देश में राजनीति के अपराधिकरण से बड़ा संकट अपराधियो के राजनीतिकरण से व्याप्त हुआ है। यह बात हरेक दल पर समान रूप से लागू होती है। ये जो बेपर्दा हुए, कम बड़े मगरमच्छ नहीं है लेकिन पिछले साल के दिसम्बर के पहले के पन्द्रह साल में पैदा हुए कई बड़े मगरमच्छ बचे हुए हैं।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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