गुरूघंटालों का राग दरबारी



यदि गुरूघंटालों का तुलनात्मक अध्ययन करने की आदत हो तो ‘राग दरबारी’ को पढ़ना अंतत: जीवन की सबसे कठिन प्रक्रियाओं में से एक हो सकता है। रंगनाथ को छोड़ दीजिए। बाकी तो इस उपन्यास के एक-एक पात्र की हरकत  पढ़कर आप इसी भ्रम का शिकार हो जाते हैं कि इनमें से किसे छोटा और किसे बड़ा गुरूघंटाल मानें। राग दरबारी जैसे कई वैद्यजी, रुप्पन, बद्री, प्रिंसिपल साहब, रामाधीन, छोटा पहलवान, जोगनाथ, सनीचर और लंगड़ आपको इस समय देश के सियासी शिवपालगंज में देखने मिल जाएंगे। सबमें होड़ मची हुई है। खुद को अगले से बड़ा गुरूघंटाल साबित करने की। इसके चलते सच का मूल स्वरूप कहीं कंदराओं में जा छिपा है। जो है, झूठ है। अविश्वास से सना हुआ। दुर्भावना की गंदगी से बजबजाता हुआ। दुष्टता के परनाले में बेशर्म के पौधे की तरह पनपता हुआ। मनोहर पर्रिकर बनाम राहुल गांधी का पुराण इसका सर्वाधिक ताजा उदाहरण है। बाकी मिसालों की भी एक्सपायरी डेट अभी नहीं निकली है। नरेंद्र मोदी ने जो चोला 2014 में ओढ़कर सफलता हासिल की, वही चोला अब राहुल गांधी भी अपनी मूल शख्सियत पर कसकर बांध चुके हैं। इतना कसकर कि उनके बेचारे मूल का ही दम घुटता जा रहा है। भारतीय राजनीति के इस धोबीघाट पर आज बगैर किसी मेहनत के ‘मैं हूं गुरूघंटाल’ फिल्म बनायी जा सकती है। मल्टी स्टारर इस फिल्म के लिए कथा सहित पटकथा और संवादों की मगजमारी की कोई जरूरत नहीं है।


शाम को किसी न्यूज बुलेटिन को देख लें और सुबह कुछ अखबार पढ़ लिए जाएं। कहानी, स्क्रिप्ट और डायलॉग तुरंत तैयार हो जाएंगे। लेकिन इस फिल्म के आरम्भ में मोटे हर्फ में ‘हमारे प्रेरणास्त्रोत श्री अरविंद केजरीवाल’ जरूर लिखा जाए। क्योंकि भारतीय राजनीति को झूठ का पर्याय बनाने का आज का लोकप्रिय चलन उनकी ही देन है। इस पूर्व सरकारी अफसर ने अन्ना हजारे के आंदोलन को जिस तरह राजनीति के मयखाने में किसी बार बाला की तरह नचाया, वह ‘न भूतो न भविष्यति’ की प्रत्यक्ष मिसाल कहा जा सकता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री की जुबान काटकर छोटी करना पड़ गई, लेकिन उनके झूठ लगातार बड़ा कद हासिल करते चले गये। लेकिन राजनीति की जीबी रोड या कमाठीपुरा इलाके का यह बेदर्द चलन है कि केजरीवाल को उनके किए का सिला नहीं मिल सका। वह तमाम प्रपंचों के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी से बाहर अपनी पार्टी को सत्ता में नहीं ला सके। मध्यप्रदेश के हालिया विधानसभा चुनाव में तो आम आदमी पार्टी का एक भी उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सका। सियासत के गलियारों में सफेद झूठ को प्रतिस्थापित करने वाले केजरीवाल के इस अवदान का अवमूल्यन होना अभी बाकी है। खैर, निराश नहीं होना चाहिए। राजनीति के अधोपतन के कई काण्ड अभी सामने आना शेष हैं। तब शायद एक ऐसा दिन आए, जब कलियुग के हर पहलू की प्रतिनिधि बन चुकी राजनीति गर्व से कहे, ‘हे केजरीवाल, तुम्हारी जय हो।’


’ इस जयकारे के स्वाभाविक हकदार तो मोदी, राहुल, मायावती, अखिलेश, ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव एंड संस, नीतिश कुमार, रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाह आदि और ‘लाल झंडा सलाम’ का खोखला हो चुका नारे लगाने वाले भी हैं। हर कोई सरापा झूठ में लिपटा हुआ। सच को कांख में दबाकर उसका दम घोटने पर आमादा। सनसनी पसंद मीडिया का एक तबका उनका सहचर है। कॉर्पोरेट में तब्दील हो चुके मीडिया हाउस उनके हमदम हैं। तो फिर रंगनाथ कौन है? रंगनाथ इस देश का वह मूर्ख तबका है, जो आज भी किसी नेता का जोश या ईमानदारी भरा भाषण सुनकर ताली ठोकने लगता है।  सवाल यह उठता है कि गुरुघंटाल यूनिवर्सिटी में राहुल ने एकलव्य की तरह मोदी को ही क्यों गुरू द्रोणाचार्य मान लिया? क्या वह इस बात से आश्वस्त हैं कि सन 2014 के शुरूआती दिनों जैसा थोथा, दम्भ से भरा और सिरे से झूठा आचरण अपना कर दिल्ली के दिल तक कब्जा करना आसान है? यदि गांधी की यह सोच है तो उन्हें इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि वह किसी भी दिन गलत साबित हो सकते हैं। मोदी ने गुजरात में तमाम प्रतिकूल हालात के बावजूद लगातार तीन बार अपनी दम पर भाजपा को विजय दिलाई। भाजपा में कई दिग्गजों के विरोध के बावजूद खुद की क्षमता से प्रधानमंत्री पद तक पहुंच गए। ऐसे-ऐसे अनुभवों में पारंगत होने के बाद उन्होंने बीते आम चुनाव से पहले अपना नया रूप सार्वजनिक किया था। गांधी के हिस्से ऐसी कोई सफलता या संघर्ष नहीं आया है। इसलिए यदि वह केवल झूठ बोलकर आगे बढ़ने और सफल होने का सपना देख रहे हैं तो उन्हें यह याद दिलाना उचित होगा कि नकल के लिए भी अकल की जरूरत होती है। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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