पंख होने का सबूत दें दिग्विजय सिंह



यह अर्जुन सिंह को कांग्रेस से निकाले जाने के ठीक अगले दिन की बात है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित एक हिंदी दैनिक ने उन्हें समर्पित एक चौथाई पेज की सामग्री प्रकाशित की। जिसकी एक लाइन आज भी याद है। उसमें सिंह के पिता राव शिव बहादुर सिंह के सियासी करियर की बेहद अपमानजनक तरीके से समाप्ति, उन्हें हुई जेल और उनकी मृत्यु का जिक्र था। इसके बाद लिखा गया था, हालांकि इस बात का कोई लिखित प्रमाण नहीं है, लेकिन उस समय सिंह के मातम में पहुंचे विंध्य के कई लोगों का दावा था कि पिता के निधन से व्यथित अर्जुन सिंह ने कांग्रेस से बदला लेने की बात कही थी। कालांतर में हुआ यह कि सिंह ने कांग्रेस में रहते हुए ही पार्टी को उसके सबसे बड़े राष्ट्रीय संकटों में से एक में डाल दिया था। उन्होंने मांग रख दी कि अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के लिए कांग्रेस मुस्लिमों से माफी मांगे। पार्टी ऐसा नहीं कर सकती थी। उसने किया भी नहीं। पता नहीं यह सिंह की उलझाऊ मांग का असर था या नरसिंह राव के प्रधानमंत्री रहते हुए विवादित ढांचे के ढहने का गुस्सा, मुसलमान उसके बाद तेजी से कांग्रेस से अलग होते चले गये। नतीजा यह हुआ कि पार्टी का देश के कई मुस्लिम बाहुल्य वाले राज्यों/इलाकों में जनाधार तेजी से सिकुड़ता चला गया। मुस्लिमों का वो खोया हुआ भरोसा आज तक कांग्रेस हासिल नहीं कर सकी। मुसलमान अब केवल उन्हीं राज्यों में कांग्रेस को वोट करता है जहां उसके पास कांग्रेस का कोई सशक्त विकल्प नहीं है। यह घटनाक्रम दिग्विजय सिंह को लेकर याद आ रहे हैं। अर्जुन सिंह से इसके तार दो रूप से जुड़ते हैं। पहला यह कि दिग्विजय किसी समय अर्जुन के पटु शिष्य थे। दूसरा, वह भी आये दिन अपने बयानों से पार्टी को अपने भूतपूर्व सियासी गुरू की ही तरह संकट में डालने का काम कर रहे हैं। पुलवामा की जघन्य आतंकी वारदात को हादसा बताकर उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। ऐसा वह तमाम मौकों पर करते आए हैं। विवादित फिल्म निर्माता मीरा नायर की उस समय निर्माणाधीन फिल्म 'द फायर' का वाराणसी में तीखा विरोध हुआ था। क्योंकि नायर ने फिल्म में सीता और राधा नामक महिलाओं के बीच समलैंगिक संबंध बताये थे।


हिंंदुओं के विरोध के बावजूद नायर इन पात्रों के नाम बदलने को तैयार नहीं थीं। तब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर दिग्विजय ने नायर को निमंत्रण दिया था कि पात्रों के इन्हीं नामों के साथ वे इस राज्य में आकर फिल्म की शूटिंग करें। सरकार उन्हें पूरा संरक्षण देगी। फिर बटाला हाउस मुठभेड़ पर उन्होंने सोनिया गांधी के आंसुओं की जिस अंदाज में चिंता की, उससे पार्टी नेतृत्व सांसत में आ गया था। दिग्विजय ने ओसामा बिन लादेन जैसे समूची मानवता के दुश्मन को 'जी' का संबोधन प्रदान कर कांग्रेस की फजीहत कराने में कोई कसर नहीं उठा रखी। सिंह के खाते में ही इस तथाकथित थ्योरी का अभ्युदय जाता है कि देश की अधिकांश आतंकी वारदातों में हिंदुओं का हाथ होता है।   कांग्रेस को दिग्विजय सिंह के बयानों जैसी इतनी भारी असुविधाएं तो तब भी नहीं महसूस हुई होंगी, जब यह पार्टी मतदाताओं के लिहाज से हिंदुओं की अपेक्षा मुस्लिमों की अधिक परवाह करने वाली कही जाती थी। किंतु तब उसके नेता इस तत्व को बैलेंस करना जानते थे। आखिर यह राजीव गांधी ही थे, जिन्होंने अयोध्या में जन्म भूमि का ताला खुलवाया था। लेकिन संतुलन ऐसा साधा गया कि पार्टी ने बहुत गिने-चुने मौकों पर ही इसका श्रेय लिया। यह पीवी नरसिंह राव ही थे, जिनके कार्यकाल में विवादित ढांचा गिराया गया, लेकिन राव ने बगैर समय गंवाए अयोध्या में उस जगह मस्जिद की तामीर कराने की बात कहकर बैलेंसिंग एक्ट की क्षमता का ही परिचय दिया था। अब मामला अलग है। दिग्विजय पार्टी को अल्पसंख्यक प्रेम की ऐसी तराजू में पटक देते आए हैं, जिसके दूसरे पलडे में कुछ भी रखकर उसे ईमानदारी से तौलने वाला मामला कहा ही नहीं जा सकता। कुछ ऐसे ही अंदाज में उन्होंने पार्टी को गोवा में विपक्ष में ले जा पटका, वह भी तब, जबकि भाजपा की तुलना में वहां कांग्रेस के विधायक अधिक थे और पार्टी द्वारा सरकार बनाने का दावा करने की सूरत में भाजपा का वहां की सत्ता से बेदखल होना तय था। कम से कम ऐसे प्रसंग कांग्रेस के लिए शुभचिंतक होने वाले भाव के प्रतीक तो नहीं ही है।


तो फिर यह क्या है? पार्टी के प्रति कोई नाराजगी? किसी खास और जाहिर तौर पर प्रभावशाली चेहरे के लिए कोई खुन्नस? ऐसा है तो यह किसके लिए है?  क्या ओसामा जी और बटाला हाउस के समय यह भाव सोनिया गांधी के लिए था। क्या अब ऐसा राहुल गांधी के लिए है या फिर इस बार पूर्व मुख्यमंत्री के निशाने पर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ हैं? अंदरखाने की खबर है कि सरकार में दिग्विजय के लगातार हस्तक्षेप (अतिक्रमण कहना उचित होगा) से नाथ नाराज हैं। हो सकता है कि सिंह के पर कतरने की कोई कवायद शुरू की गयी हो। मुमकिन है कि इस बात का गुस्सा पुलवामा के आतंकी हमले को लोकसभा चुनाव के ठीक पहले दुर्घटना बताने की शक्ल में सामने आया होगा। यूं तो सिंह के राहुल  से नाखुश होने की भी तमाम वजह मौजूद हैं। प्रदेश के बीते विधानसभा चुनाव के समय राहुल ने यहीं की सरजमीं पर जिस तरह दिग्विजय की एक से अधिक मौके पर सार्वजनिक तौर से उपेक्षा की थी, वह सबको बखूबी याद है। एक लतीफा याद आता है। विमान में यात्री के बगल की सीट पर इंसानी जुबान बोलने वाला तोता बैठा था। उसने सर्विस वाला बटन दबाया। एयर होस्टेस आ गयी। तोता बोला, कुछ नहीं जी, मैं तो फालतू मजे ले रहा था। वह मुस्कुराती हुई चली गयी। तोते ने कई बार ऐसा किया और हर बार एयर होस्टेस उसकी बात का बुरा माने बिना मुस्कुराहट बिखेरती हुई वापस गयी। पड़ोसी यात्री को शगल सूझा। उसने भी बटन दबाया। एयर होस्टेस प्रकट हुई। यात्री ने तोते वाला डायलॉग दोहरा दिया। वह गुस्से से भर गयी। क्रू मेंबर्स वहां आए। यात्री ने कहा, मैंने तो वही किया और कहा, जो तोता कर और कह रहा था। तय हुआ कि दोनो को पैराशूट के बगैर विमान से बाहर फेंक दिया जाए। हजारों फीट की ऊंचाई से तेजी से नीचे आते यात्री से तोते ने पूछा, क्यों! उड़ना जानते हो? यात्री घबराहट से चीखते हुए बोला, नहीं। मेरे पंख नहीं हैं। तोते ने पंख फैलाकर उड़ते हुए कहा, पंख नहीं हैं तो फिर क्यों विमान में फालतू मजे ले रहे थे! लोकसभा चुनाव के लिए 'टेक आफ' कर चुकी कांग्रेस के विशालकाय विमान में सवार कोई तोता यदि दिग्विजय सिंह की प्रेरणा का स्रोत है, तो उन्हें हजार फीट की ऊंचाई से नीचे गिरने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो सिंह कम  से कम यह प्रमाण तो दे ही दें कि उनके पंख ऊग आये हैं। सबूत मांगने की बात पर किसी को बुरा नहीं लगना चाहिए। क्योंकि अब तो देश की सेना के शौर्य का प्रमाण मांगने का भी तो फैशन चल पड़ा है। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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