देश के मन की बात का समय



लीजिए साहब। तिल की अलग-अलग किस्मों की औकात नापने का वक्त आ गया। 23 मई को पता चल जाएगा कि किस तिल में कितना तेल है। छप्पन इंच सीना फेम नरेंद्र मोदी कुछ अच्छे, कुछ बुरे निर्णयों और कुछ पूरे, कुछ अधूरे वादों की डगमगाती कश्ती को लेकर चुनावी भवसागर में उतर चुके हैं। बीते कुछ ही समय में देश के कई राज्यों में सत्ता के श्रृंगार से विहीन की गयी कांग्रेस अब तीन राज्यों में विजय की नथ पहनकर राजनीतिक शमियाने में विजय की मंगल ध्वनि सुनने को आतुर हो गयी है। उत्तरप्रदेश में साइकिल ने हाथी मेरे साथी फिल्म की तर्ज पर सुपरहिट वाली सफलता हासिल करने का जतन तेज कर दिया है


तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल, अन्नाद्रमुक, द्रमुक, राष्ट्रीय जनता दल, एआईएमआईएम, हम, आम आदमी पार्टी, टीआरएस, टीडीपी, जेडीएस, राकांपा तथा जेडीयू आदि कभी हां, कभी ना की शैली में एक पल मोदी के विरुद्ध एकजुट होते तो दूसरे ही पल तिनका-तिनका बिखरते नजर आने के बावजूद चुनाव में भारी उलटफेर का दम भर रहे हैं।  इस सबके बीच देखा जाए तो यह निर्वाचन कई तत्व और तथ्यों की अग्नि परीक्षा साबित होने जा रहा है। इनमें सबसे अहम यह कि देश की जनता 23 मई को बताएगी कि इतिहास में पहली बार भाजपा को स्पष्ट बहुमत प्रदान करने के निर्णय पर वह संतुष्ट है या उसे पछतावा है। वह इस बात पर भी अपने रुख का इजहार करने जा रही है कि नोटबंदी तथा वस्तु एवं सेवा कर अर्थात जीएसटी जैसे व्यापक असर वाले फैसलों पर उसकी क्या प्रतिक्रिया रहेगी।


मतदाता यह भी स्पष्ट कर देगा कि राष्ट्रवाद की किस व्याख्या का वह समर्थक है? वैसे यह देश के दुर्भाग्य का प्रतीक ही है कि राजनीतिक हितों को साधने के फेर में राष्ट्रीयता के तत्व को किसी पांचाली में तब्दील कर दिया गया है।  सच कहा जाए तो मोरारजी देसाई से लेकर चरण सिंह, चंद्रशेखर, इंद्रकुमार गुजराल और एचडी देवेगौड़ा जैसे कार्यकाल देखने के बाद मुल्क की आवाम सियासी खिचड़ी से अपच महसूस करने लगी है। शायद यही वजह रही कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को उसके दूसरे कार्यकाल में अनिर्णय की सरकार मानने के बाद उसने बीते चुनाव में नरेंद्र मोदी पर यकीन करके भाजपा को साफ बहुमत प्रदान कर दिया। लेकिन ऐसा होने तक इस देश में एकदलीय शासन की अवधारणा काफी कमजोर हो चुकी थी।


लिहाजा भाजपा को भी यह भरोसा तो था नहीं कि वह अपने बलबुते देश में पहली बार बहुमत की सरकार बना लेगी। इसलिए भाजपा ने चुनाव के पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बैसाखी स्वीकार की और पूरा बहुमत मिलने के बावजूद वह इस बैसाखी से खुद को विरत नहीं कर सकी। इस चुनाव में भी उसने गठबंधन के साथ ही मैदान में उतरने का फैसला किया है। यह चुनाव भी प्रमुख रूप से एनडीए और यूपीए के रूप में तो होगा। लेकिन बाकी क्षेत्रीय दल भी अपने स्तर पर अब तक महागठबंधन बनाने पर जोर देते रहे हैं। लेकिन अगर इस महागठबंधन में कांग्रेस नहीं होगी तो यह वैसे ही बेअसर हो जाएगा। बरसाती मेंढक की मूर्ति को पूजने वाले राजनीतिक दल अपनी-अपनी सुविधा अनुसार किसी खेमे का चयन करते हुए टरार्ने लगेंगे।


किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि लालू यादव द्वारा घास न डाले जाने पर उपेंद्र कुशवाह की रालोसपा एक बार फिर नमो का रट्टा मारती हुई दिख जाए और जीतन राम मांझी की हम का टेलीफोन वह नंबर डायल करने लगे, जिसे एनडीए कहते हैं।  इस चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक समरसता अभियान की लाज दांव पर रहेगी तो कांग्रेस के राफेल सहित गब्बर सिंह टैक्स, नोटबंदी विरोधी अभियान एवं राहुल गांधी के अब तक न आ सके भूकम्प की ताकत का भी इसमें खुलासा हो जाएगा। यह मतदान ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में ठांठें मारती सियासी इच्छाओं की जन-स्वीकृति का परिचायक होगा तो इसमें मोदी-विरोधी गतिविधियों की गहराई भी नाप ली जाएगी। आने वाली 11 अप्रैल से लेकर 19 मई तक इन सारे तथ्यों का हश्र दर्ज किया जा चुका होगा। नतीजे वाले दिन यानी 23 मई की शाम तक पता चल जाएगा कि देश के मन की बात क्या है। यह बात हम सभी को अपने-अपने स्तर पर दर्ज करानी है। ताकि देश के राजनीतिक दल समझ सकें कि मुल्क एवं इसकी आवाम की बेहतरी के उनके अलग-अलग खांचों में से किस को जनमत ने कितने अंक दिए हैं। लिहाजा अभी से मतदान का मन बना लें एवं यह संकल्प भी ले लें कि यह मत देश के लिए होगा, स्वस्थ लोकतंत्र के लिए होगा, जातिवाद, क्षेत्रवाद या किसी प्रलोभन के लिए नहीं। लोकतंत्र के महायज्ञ की शुचित पूरी तरह हम पर निर्भर है, यह मत भूलिएगा। 

loading...

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति