दत्तात्रेय ब्राहृण का अल्पसंख्यक एजेंडा



वह ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का शुरूआती दौर था। एक प्रतिष्ठित फिल्म समीक्षक ने लिखा कि इसके प्रस्तोता अमिताभ बच्चन खुश दिखने की तमाम कोशिशों के बावजूद तनाव छिपा नहीं पा रहे। इसकी मुख्य वजह उन पर छाये तत्कालीन आर्थिक संकट और बेटे अभिषेक बच्चन का करियर परवान पर चढ़ने की असफल कोशिशों को बताया गया था। यदि अमिताभ वाकई तनाव में थे तो यह सच है कि उनकी बंद महत्वाकांक्षी परियोजना अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी एबीसीएल और बेटे का डगमगाता सितारा इसकी मुख्य वजह रहे होंगे। इसलिए राहुल गांधी आज यदि अमर्यादित होकर नरेंद्र मोदी पर बरसे तो मान लिया जाना चाहिए कि वह अपने जीजा रॉबर्ट वाड्रा से चल रही पूछताछ की पीड़ा की तिलमिलाहट से ऐसा कर गुजरे। इसलिए पूरी तरह विचलित दिखते गांधी ने अजीबो-गरीब मुद्राएं दिखायीं। ऐसे शब्द बोले, जो उनके मुंह से इससे पहले शायद ही कभी सुने गये हों।  ‘कौन बनेगा...’ ने यदि अमिताभ की तंगहाली से उबरने में मदद की तो आज की मुद्रा भी गांधी के लिए फायदे का सौदा बनती दिख रही है। इसके लिए उनके सही स्थान के चयन की प्रशंसा करना चाहिए। गांधी ने ऐसा उस कार्यक्रम में कहा और किया, जो पूरी तरह अल्पसंख्यकों को समर्पित था। राम मंदिर आंदोलन को फिर दी जा रही हवा का पंखा कहां से संचालित हो रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है।


शक की सुई सीधी मोदी की ओर जाती है। इसलिए अल्पसंख्यक फिर नाराज है और यही वजह रही कि गांधी के शब्दों का कार्यक्रम में मौजूद इस तबके के लोगों ने जबरदस्त तरीके से स्वागत किया। गांधी श्रोताओं के सामने ‘तुम मुझे वोट दो, मैं आरएसएस को लानत दूंगा’ वाली शैली में गरजे। खूब तालियां उनके हिस्से में आयीं। यानी कम से कम इस तबके को खुश या संतुष्ट करने की गरज से कांग्रेस के जनेऊधारी एवं स्वयंभू दत्तात्रेय ब्राहृण अध्यक्ष ने अपना ‘अल्पसंख्यक बनाम भाजपा’ वाला एजेंडा सेट कर लिया है।  अब आगे क्या? गांधी के तेवर तो वह हैं, जो उनकी और समर्थकों की दृष्टि में आगामी आम चुनाव को ‘कांग्रेस बनाम भाजपा’ बनता देख रहे हैं। बीते कुछ समय में गांधी कम से कम तीन बार फ्रंट फुट पर खेलने की बात कह चुके हैं। माना जा सकता है कि वह गठबंधन से इतर अपनी ही पार्टी की दम पर नरेंद्र मोदी को हराने का जतन कर रहे हैं। जो कि आसान नहीं है। हो सकता है कि प्रियंका गांधी फैक्टर उत्तरप्रदेश में कुछ काम कर जाए, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि घोर जातिवादी राजनीति में पग चुका यह प्रदेश इस खेल के महारथी अखिलेश यादव एवं मायावती के सियासी गठबंधन का भी अखाड़ा बन चुका है। फूलपुर और गोरखपुर सीट पर भाजपा को धूल चटाकर सपा एवं बसपा अपनी ताकत का अहसास करा चुकी हैं।


शेष अधिकांश राज्यों में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व है। ऐसे में यह आसान नहीं दिखता कि गांधी अपनी पार्टी की दम पर फ्रंट फुट पर खेलने के बावजूद कोई बड़ा चमत्कार दिखा पाएंगे।  तो बातचीत का सार यही कि कांग्रेस को मोदी को हराने के लिए अन्य दलों का साथ तो लेना ही होगा। फिर भी गांधी ने आज एक रास्ता दिखा दिया। अल्पसंख्यकों को रिझाने का। यदि पार्टी इसमें आगे भी सफल रही तो उसकी स्थिति मजबूत होना तय है। फिर भी मोदी को हराने के लिए केवल यह जतन काफी नहीं दिखता। इसके लिए जिस सामूहिक ताकत की आवश्यकता प्रतिपादित हुई है, उसे अर्जित करने के लिए गांधी को कांग्रेस का कायाकल्प करना पड़ेगा। इस प्रक्रिया को कम से कम आगामी आम चुनाव तक तो पूरा नहीं ही किया जा सकता है। फिलहाल गांधी को उधार की ताकत से ही काम चलाना होगा, जिसके लिए दुकानें तो क्या, सपा, बसपा, तृणमूल, टीडीपी, राजग, केसीआर कांग्रेस, राकांपा आदि की शक्ल में पूरा का पूरा डिपार्टमेंटल स्टोर कांग्रेस के सामने खुला हुआ है। यह बात और है कि इस पार्टी की राजनीतिक रूप से कमजोर माली हालत को देखते हुए उसे किस स्टोर से उधार मिल पाएगा और किस से नहीं। आज की तिथि में यह साफ दिखता है कि कांग्रेस जोश में होश खोकर अकेले आगे चली तो वह खुद के साथ-साथ विपक्षी गठबंधन की कोशिशों के लिए महंगा साबित होगा।  बाकी राहुल खुद समझदार हैं। 

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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