कांग्रेस, ट्रेजडी सीरियल से संजीदा होने तक



मशहूर हास्य धारावाहिक 'उलटा-पुलटा' के जनक जसपाल भट्टी याद आ रहे हैं। इसके एक ऐपिसोड में मुख्य पात्र टीवी धारावाहिक बनाने के लिए दूरदर्शन से अनुबंध करता है। तमाम हास्यपरक प्रसंगों के बीच अंतत: सीरियल तैयार हो जाता है। जिसे उस साल के सर्वाधिक कॉमेडी सीरियल का पुरस्कार मिलता है। यह घोषणा सुनकर मुख्य पात्र चौंकता है। असिस्टेंट के कान में कहता है, 'यार हमने तो ट्रेजडी सीरियल बनाया था, यह भला कॉमेडी कैसे हो गया?' खासकर मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की गतिविधियों को लेकर भट्टी और उनके धारावाहिक का यह अंक काफी साम्य रखता है। यकीनन कांग्रेस में यदि सुशील शर्मा जैसे तंदूरबाज रहे हैं तो इस पार्टी को अनंत ऐसे चेहरे भी मिले, जो अनुभव की भट्टी में तपकर कुंदन बने हैं। लेकिन हुआ यह भी कि कई ने तपने की बजाय तप करके पार्टी में खास मुकाम हासिल कर लिया। यह तप उस आलाकमान को खुश करने के लिए हुआ, जो अधिकांश समय चापलूसी पसंद रहा। जिसने पार्टी को उसकी छवि की वजह से मिली लोकप्रियता को खुद की बदौलत समझने में कोई शर्म नहीं की। तप के बाद क्रम आया, जप और जयकार करने वालों का। अंतत: इनकी उप समितियां बनीं। जिनके प्रमुख अघोषित उस्ताद कहलाए और उनके पिछलग्गू पट्ठे के अघोषित नामकरण के साथ पार्टी की नई रीति-नीति के संवाहक बने। तो कांग्रेस ने जबरदस्त तरीके से मध्यप्रदेश के लोगों को इस बार समझाया कि नहीं, हम गंभीर हैं इस बार सरकार बनाने के लिए। जल्दी टिकट घोषित कर देंगे। लेकिन यह सिर्फ कहा सुना रह गया। बाद में जब टिकट बांटने बैठे तो भारी माथापच्ची से लेकर धींगामुश्ती तक सब कुछ हो गया। पर आखिरकार कांग्रेस के जिन एक सौ पचपन और आज जारी सौलह  नामों की सूची बाहर आई तो इस बार मामला कामेडी से होता हुआ ट्रेजड़ी से बचता बचाता थोड़ा-सा समझदारी भरा सामने आया है।


    भाई भतीजावाद से लेकर पट्ठावाद और पेराशूट उम्मीदवारों तक सब कुछ इस्तेमाल करते हुए आखिर कांग्रेस ने इस बात का ध्यान रखने की कोशिश तो की है कि जीतने लायक उम्मीदवारों का चयन कर लें। उसके कई सारे उम्मीदवारों में कोई नुक्स नहीं निकाल सकते हैं। आखिर उसके पास आप्शन सीमित ही तो हैंं। दावेदार बहुत थे लेकिन गंभीर दावेदार इनसे बेहतर भला और क्या होते। अब अगर जयवर्द्धन सिंह, लक्ष्मण सिंह या प्रियव्रत सिंह दिग्विजय सिंह के बेटे, भाई-भतीजे हैं तो इससे उनकी जीतने की क्षमता पर कहां फर्क पड़ता है। कांग्रेस में वैसे भी परिवारवाद की बात करने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि कांग्रेस इसके बारे में बुरा-बुरा बोलती भी नहीं। जो बोलते हैं, वो करें तो सवाल उठते हैं। अब कई सारे पट्ठे भी जीतने में सक्षम हैं चाहे फिर वे रामनिवास रावत हों या फिर गोविंद राजपूत, पी सी शर्मा हों या फिर महेन्द्र सिंह चौहान, हर्ष यादव हो या नेवी जैन। ये सब कांग्रेस की इन स्थायी समितियों के मिले-जुले रूप का नमूना है। तपने वाले तप करते रह गए कि भाजपा से पहले प्रत्याशियों की सूची घोषित कर दी जाए। ऐसा नहीं हुआ और वे बेचारे तपना भूलकर सुलगते रह गए।  सुप्रीम कोर्ट ने तो तेज आवाज वाले बमों पर आज रोक लगाई है, कांग्रेस में अब तेज आवाज वाले पटाखे नहीं, बल्कि उस भूकम्प की संस्कृति का समय है, जो ईश्वर ही जाने कि कभी आ भी पाएगा या नहीं। अब वहां 'कोई बम कम' हैं और 'जिधर बम, उधर हम' का चलन वहां कुछ ही समय में अत्यंत लोकप्रिय हो चुका है। अब संजय शर्मा, पद्मा शुक्ला या फिर संजय सिंह मसानी आखिर दम तो रखते हैं। तो अब बचे तप और जप करने वाले। भाई लोगों ने फिर बाजी मार ली। कल हुआ टिकट वितरण इन तपस्वियों और जापकर्ताओं के गौरवयमी बायोडाटा में एक बार फिर नई उपलब्धियों की इबारत बन गया है। जिनके भाई थे, उन्होंने भाई-भतीजावाद किया। जिनके पट्ठे हैं, उन्होंने पट्ठावाद का पुन: परचम लहराया। कहते हैं, 'रांड, सांड, सीढ़ी, संन्यासी। इनसे बचो तो नहा लो काशी।'


' कांग्रेस का भी यही हाल है। परम्परागत विडंबनाओं से जितना न्यूनतम तौर पर बच सकी थी, उतना ही बची। इसके बाद काशी नहाने के अंदाज में कुछ पात्र लोगों को भी टिकट दे दिए गए। पात्रता वफादार कांग्रेसी होने की, अपने दम पर खुद के लिए जमीन तैयार करने वाली और जीत की क्षमता से  परिपूरित होने की।  यानी कोशिश करके कुछ संजीदगी तो बरती गई है। प्रदेश कांग्रेस का अतीत देखते हुए इस कोशिश को मजबूरी की संज्ञा भी दे सकते हैं। क्योंकि यह तो वह दल है, जिसकी दिवंगत नेत्री जमुना देवी एक समय अपने भतीजे उमंग सिंघार को टिकट दिलाने के लिए अड़ गई थीं। एक पत्रकार ने उनसे पूछा, 'कहा जाता है कि आपका भतीजा नहीं जीत पाएगा। फिर टिकट की जिद क्यों?' जमुना देवी का जवाब आया, 'तो, हमारे बाकी कौन से प्रत्याशी ही जीत  पा रहे हैं?' यह एक घटनाक्रम प्रदेश कांग्रेस के उस हाल का प्रतिनिधि माना जा सकता है, जिसमें कई दिग्गज चेहरे पार्टी के बारे में सबसे अंत में सोचते हैं। वह चेहरे, जिनके माथे पर आज भी बीते लगातार तीन विधानसभा चुनाव की हार का गोदना साफ देखा जा सकता है। यह आज कल चलन में आया अस्थायी गोदना नहीं है। यह वह छाप है, जो जिंदगी भर आदमी के शरीर से नहीं हटती। हां, प्लास्टिक सर्जरी इसे छिपाने का तरीका होता है। कांग्रेस को इस छाप से मुक्ति पाना ही होगी। अपने गौरवयमी अतीत को वापस लाने के लिए सख्त कदम वाली प्लास्टिक सर्जरी करते हुए, ताकि ऐसे बदनुमा गोदने हमेशा के लिए खत्म किए जा सकें। लिहाजा, नेताओं की जिद मे ंभी कुछ उम्मीदवार तो कांग्रेस को तय करने ही पड़े हैं। वैसे भी सरकार बनाने के लिए कौन सी 230 सीट जीतना जरूरी होता है। जितना जरूरी होता है, उससे तो ज्यादा ही बेहतर आप्शन कांग्रेस ने तय कर लिए हैं। इसलिए इस बार मुकाबला रोचक होगा। कांग्रेस क्योंकि समय बहुत गंवा चुकी है, और अभी रूठने मनाने के दौर का समय और निकलेगा। इसलिए कांग्रेस उम्मीदवारों का एक माइनस प्वार्इंट यह भी होगा कि उनके पास समय और संगठन दोनों का अभाव होगा और ऐसे में पूरे चुनाव को उन्हें ढोना भी खुद है। शुरू में जसपाल भट्टी के धारावाहिक को याद किया गया था। इस चुनाव में कांग्रेस कामेडी और टेÑजडी से हटकर संजीदा होने तक तो आ गई है। बाकी आगे उसकी किस्मत।  

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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