कांग्रेस की उम्दा चुनावी रणनीति



यह कांग्रेस की चुनाव के लिए उम्दा रणनीति का परिचायक है। तमाम अटकलों से अलग सोनिया गांधी ही रायबरेली से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगी। प्रियंका वाड्रा इस सीट से प्रत्याशी हो सकती हैं, ऐसा कयासवीरों का दावा था, बयानवीरों की ख्वाहिश थी। किंतु यह नहीं हुआ। इसका अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि प्रियंका यह चुनाव नहीं ही लड़ेंगी। हो सकता है कि भाजपा की सूची जारी हो जाने के बाद उनका नाम किसी ऐसी जगह के लिए घोषित किया जाए, जो केंद्र में सत्तारूढ़ दल के लिए  प्रतिष्ठा वाली जगह हो और प्रियंका के असर के चलते भाजपा को उस सीट पर पूरी ताकत झोंकनी पड़ जाए। इसे किसी एक जगह घेरकर बाकी जगहों पर कमजोर करने की राजनीति कहा जाता है


  न रायबरेली से सोनिया का तिलिस्म टूटने के आसार हैं और तमाम राजनीतिक अपरिपक्वताओं के बावजूद राहुल गांधी के लिए भी अमेठी में कोई संकट नहीं दिखता है। बसपा और सपा ने भी यही गणित भांपकर राज्य की इन दो सीटों पर प्रत्याशी नहीं उतारने का ऐलान किया है। यानी आज की तारीख में इस प्रदेश से कांग्रेस की बीते चुनाव में मिली दोनो सीट फिर उसकी झोली में आने के पूरे आसार हैं। फिर प्रियंका का क्या? वह साफ कह चुकी हैं कि यह चुनाव नहीं लड़ेंगी। ताकि पार्टी को पूरे राज्य में अधिक से अधिक समय दे सकें। प्रियंका यदि इस बात पर कायम रहीं तो भी वह एक न एक ऐसा क्षेत्र जरूर चुन लेंगी, जहां पार्टी के लिए रायबरेली और अमेठी जैसे तयशुदा अच्छे परिणाम की  उम्मीद हो।


फिर यह सीट किसी मौके पर खुद प्रियंका के लिए चुनी जा सकती है या फिर वहां से उनके फिलहाल मुसीबतजदा शौहर रॉबर्ट वाड्रा को उम्मीदवार बना दिया जाएगा। सियासी ताकत के थपेड़ों में कागज की नाव की तरह इधर से उधर हो रहे वाड्रा समझ गये हैं कि असली दम सत्ता में है। शायद यही वजह है कि गुस्से से भरे अपने कुछ ट्वीट्स में सोनिया गांधी के जमाई ने राजनीति में प्रवेश करने के साफ संकेत दिए हैं।  मुझे लगता है कि कांग्रेस इस चुनाव में प्रियंका फैक्टर की ताकत आजमाना चाह रही है। ऐसे में यदि वह चुनाव मैदान में बतौर प्रत्याशी उतरीं तो तय है कि उनके लिए जीतना प्रतिष्ठा का प्रश्न हो जाएगा। पार्टी को उस एक सीट पर भारी ताकत लगाना होगी। इससे होगा यह कि बाकी सीटों से पंजे की पकड़ ढीली होने लगेगी।


वैसे भी सियासत में कई रास्तों से मंजिल पायी जा सकती है। यदि कांग्रेस अपनी स्थिति सुधार लेती है तो इसमें कोई मुश्किल नहीं कि उसके कब्जे वाली किसी सीट को खाली कराकर बजरिये उपचुनाव प्रियंका की संसद में एंट्री करवा दी जाए। ऐसा नहीं हो, तो भी पर्याप्त सदस्य संख्या के आधार पर श्रीमती वाड्रा को राज्यसभा में भेजा जा सकता है। किंतु कांग्रेस उच्च सदन का दांव शायद ही खेले। वह प्रियंका को जनता के बीच भारी लोकप्रिय बताना चाहेगी। इसका पैमाना लोकसभा चुनाव ही होता है। चुनांचे फिलहाल माना जा सकता है कि आज नहीं तो कल, प्रियंका लोकसभा का चुनाव ही लड़ेंगी।  कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश के लिए प्रत्याशियों की पहली सूची जारी करके अपने आत्मविश्वास का सही समय पर परिचय दिया है। यह घोषणा भाजपा को राहत भी दे सकती है।


इससे यह साफ हो गया है उत्तरप्रदेश में मुकाबला त्रिकोणीय ही होगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिली ताजा सफलता से कांग्रेस जिस तरह आत्मविश्वास में आई है, उसमें उसका खुद का सत्ता में बहुमत से लौटना भले ही संभव नजर नहीं आता हो लेकिन अगर वह भाजपा के बाद भी सबसे बड़ा दल बन गई तो चुनाव बाद विपक्षी एकता की धूरी कांग्रेस ही होगी। मामला  उत्तरप्रदेश का है, इसलिए भाजपा के भीतर भी सियासी उमस बढ़ना लाजमी है। वजह यह कि इस प्रदेश में भाजपा विपक्ष के महागठबंधन का असर पहले ही गोरखपुर और फूलपुर जैसी अपने कब्जे वाली लोकसभा सीटों का उप चुनाव हारकर देख चुकी है। हालात के कई लिहाज से भाजपा के लिए यह चुनाव उतना आसान नहीं है जितना कांग्रेस विरोधी माहौल में 2014 में था। तिस पर प्रियंका की सक्रियता और हाथी तथा साइकल के गठबंधन ने उसकी चिंता को इस राज्य में और बढ़ा दिया है। कुल मिलाकर यह तय है कि आगामी आम चुनाव में उत्तरप्रदेश ही देश की दशा तथा दिशा तय करने वाला राज्य एक बार फिर बन सकता है। क्योंकि अब यहां चुनाव एकतरफा तो शायद ही होगा। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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