गठबंधन की अंधी गली में उपेक्षित कांग्रेस



लगता है कि राहुल गांधी को किसी ने यह शेर सुना दिया है। 'दुश्मनी जमकर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे। जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शमिंर्दा न हों।' क्योंकि कांग्रेस के अधिराज ने कल फरमाया कि वे वामपंथी दलों के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोलेंगे। गौर फरमायें कि यह बात उन्होंने उस वायनाड में कही, जिसके राज्य केरल में फिलहाल वामपंथी गठबंधन की सरकार है और वहां इस पंथ का काफी-कुछ असर आज भी कायम है।  क्या यह बात आपको 'मेरे मुंह खोलने से भूकम्प आ जाएगा' वाली आज तक साकार रूप न ले सकी दंभोक्ति की याद नहीं दिला रही? गांधी जमकर बोले और गरजे भी, लेकिन भूकम्प नहीं आया। इसी तरह वह यदि वामपंथियों के खिलाफ मुंह खोल देंगे, तब भी किसी प्रकार की आपदा तो नहीं ही आनी है। जाहिर-सी बात है कि गांधी को चुनावी नतीजों के बाद के हालात की ज्यादा चिंता है। उनकी कोशिश है और उन्हें पता है कि कांग्रेस पूर्ण बहुमत वाली स्थिति में तो अब आ नहीं सकती है तो जिन दलों की बैसाखी पर लटककर कुर्सी तक पहुंचा जा सकता है, उनमें वामपंथी भी एक हो सकते हैं। इसीलिए गांधी विवशता में की जा सकने वाली संभावित दोस्ती के वक्त की शर्मिंदगी से बचने के लिए ही 'बच्चा समझकर छोड़ रहा हूं' वाली शैली का परिचय दे रहे हैं।  यूं तो कांग्रेस की कभी कोई खास विचारधारा रही नहीं है। इसे एक मध्यमार्गीय राजनीतिक दल के तौर पर ही जाना जाता है। लेकिन वहां से भी उसकी पटरी कभी की उतर चुकी है।


रही बात वामपंथियों की तो वे कभी कांग्र्रेस के विरोधी तो कभी दोस्त भी रहे हैं। वैसे वे कांग्रेस के आलोचक हैं लेकिन जहां तक भाजपा विरोध की बात है तो वे कांग्रेस के साथ खड़े दिखते हैं। तिस पर यह तथ्य भी कि कांग्रेस की अपनी कोई विचारधारा कभी रही ही नहीं है। वहां परिवारधारा का बोलबाला था है और शायद रहेगा भी। वामपंथ ने इस दल को हमेशा त्याज्य ही समझा है। दक्षिण पंथ से लड़ने की उसकी मजबूरी ही उन्हें कांग्रेस की तरफ हाथ बढ़ाने के विवश करती है। आज की तारीख में भी सीताराम येचुरी इस दल के इकलौते ऐसे नेता हैं, जो नरेंद्र मोदी को हराने के लिए कांग्रेस के साथ जाने को तैयार हैं, लेकिन प्रकाश करात के समर्थक इसका पूरी ताकत से विरोध कर रहे हैं। वायनाड में दिया गया गांधी का बयान कारत ग्रुप को ही 'लड़ाई-लड़ाई माफ करो और क्या कहते हैं, उसे साफ करो' की तर्ज वाला ही है।  तो आगे क्या? कांग्रेस अध्यक्ष क्या अब यह भी कहेंगे कि वह ममता बनर्जी के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोलेंगे! क्योंकि बहुमत न मिलने पर उधार की खुशी तो तृणमूल कांग्रेस से भी मांगनी ही पड़ेगी। हालांकि बैनर्जी ने गांधी के लिए 'बच्चा' संबोधन का प्रयोग कर पहले ही जता दिया है कि उनकी नजर में कांग्रेस की हैसियत कितनी है। वस्तुत: राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस की यही समस्या है कि वह '...हम पे हो जाये करम हाय जो तेरा, अपनी किस्मत भी संवर जाये जरा..'. के अंदाज में कटोरा लेकर विपक्षी गठबंधन की अंधी गली में उपेक्षित घूम रही है।


मायावती और अखिलेश यादव ने इस दल को उत्तरप्रदेश में घास नहीं डाली। बिहार में कांग्रेस को राष्ट्रीय जनता दल के आगे तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो की मुद्रा में नतमस्तक होने को विवश होना पड़ गया। आंध्रप्रदेश में तेलगुदेशम पार्टी और तेलंगाना में टीआरएस उसे भाव नहीं दे रही हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस ने जैसे ही द्रमुक से हाथ मिलाया, उस दल ने राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई की मांग उठाकर उनके बेटे की पार्टी को शर्मिंदगी की स्थिति में डाल दिया। कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस से समझौता होने की देर थी कि उमर अब्दुल्ला ने वजीरे-आजम युग की वापसी की बात कहकर कांगे्रसियों को मुंह छिपाने पर मजबूर कर दिया। हद तो यह है कि देश के सबसे बुजुर्ग राजनीतिक दल को इस वयस में पहुंचने के बाद भी चंद्रशेखर रावण की नवजात भीम आर्मी  के समक्ष 'जिसे तू कबूल कर ले, वो अदा कहां से लाऊ...!' वाला आचरण दिखाना पड़ रहा है।  दरअसल, कुछ अपवादों को छोड़कर अपने उपाध्यक्षीय और अध्यक्षीय कार्यकाल में कांग्रेस को मिली चुनावी पराजयों के चलते गांधी बौखलाहट से भर गये हैं। उनका एक ही मकसद है, किसी तरह मोदी को सत्ता से हटाना। इसके लिए समय आने  पर उनका दल भारी वैचारिक मतभेदों के बावजूद किसी भी सक्षम पार्टी से 'चाहे मार डालो राजा, चाहे काट डालो राजा, हम तो यारी करेंगे...' कहते हुए लिपटने में गुरेज नहीं करेगी। इसे किसी समय के सर्वाधिक शक्तिशाली राजनीतिक दल के अस्तित्व का संकट कहें या बदहाली से उपजी निर्लज्जता, इसका फैसला आप ही कीजिए। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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