भाजपा के पास मौका है.....



उम्मीदवारों के चयन में जो गलतियां भाजपा को करना थी वो कर चुकी। उसके पास अब भी मौका है कि वो स्थितियों को संभाल लें। कांग्रेस जितना बेहतर कर सकती थी, वो उसकी पहली सूची से जाहिर हो गया। उम्मीदवारों के चयन की असली चुनौती उसकी अब शुरू होती है। कांग्रेस की दूसरी लिस्ट देखकर उसकी मजबूरियां समझ में आ रही है। जिस तरह से पहली सूची में केवल जीतने के जिस क्राइटेरिया के आधार पर कांग्रेस ने टिकट बांटे हैं, उसका वो आधार दूसरी सूची से नदारत है। लिहाजा भाजपा अगर चाहे तो अपनी पहली सूची की गलतियों को सुधार कर अपनी संभावनाओं को संभाल सकती है। उसे कम से कम एक दर्जन से ज्यादा टिकट बदलने होंगे, जो और ज्यादा कठिन साबित हो सकता है। हालांकि भाजपा ने सोमवार को जो दूसरी सूची जारी की है, उसमें सावधानी नजर आ रही है। पर कांग्रेस को अभी पचास से ज्यादा टिकट और बांटने हैं। भाजपा को अब केवल चौंतीस उम्मीदवारों का ही चयन करना है। नामांकन भरने के आखिरी दिन तक दोनों प्रमुख दलों के पास अपनी भूल सुधारने का मौका है।  चौथी बार सरकार बनाने की कोशिश कर रही भाजपा के पास खोने के लिए सिर्फ सत्ता ही नहीं, अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए उसका मनोबल भी दांव पर है। इस लिहाज से जैसा हल्ला भाजपा ने मचाया था, वैसा अब तक तो खास कुछ नहीं हुआ। जब चुनाव जीतना ही सब कुछ हो, तब केवल बाबूलाल गौर, सरताज सिंह, कैलाश चावला का टिकट काटना और संगठन की ताकत दिखाना भाजपा नेतृत्व का अंहकार ही माना जाना  चाहिए।


निश्चित तौर पर इस तर्क में दम है कि गोविंदपुरा से भाजपा जिसे टिकट देगी वो चुनाव जीत जाएगा। लेकिन अगर जीतने की गारंटी के साथ उम्र के आखिरी पड़ाव पर गौर साहब टिकट मांग रहे हैं तो उसे देने में भला क्या आपत्ति होना चाहिए। क्योंकि यह जीत गौर की ही नहीं होगी, पार्टी के लिए एक सीट की गारंटी भी होगी। जहां तक बाकी कार्यकर्ताओं को मौका देने का सवाल है तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर दस बार गौर को ही क्यों रिपीट कर दिया गया। और अकेले गौर ही नहीं हैं, भाजपा और कांग्रेस में ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं, जहां नेताओं ने एक ही सीट पर लंबे समय तक चुनाव लड़ा। डा. लक्ष्मीनारायण पांडे अगर मंदसौर संसदीय सीट से लगातार ग्यारह बार चुनाव लड़ सकते थे तो बाबूलाल गौर के लड़ने पर कौन सा आसमान टूट रहा है, यह समझ से परे है। फिर डा. पांडे तो तीन बार चुनाव भी हारे हैं।  सरताज सिंह का मामला तो और भी दिलचस्प है। सिवनी मालवा और गोविंदपुरा सीट में फर्क है। सिवनी मालवा को हर कोई भाजपाई नहीं जीत सकता। वो सरताज सिंह के ही बस की बात है। फिर सरताज सिंह को छेड़ने का तब तो कोई मतलब नहीं है जब आप लगातार चौथी बार सरकार में वापसी चाहते हैं। ऐसे ही मनासा का फैसला वहां कार्यकर्ताओं को समझ में ही नहीं आ रहा है। वहां कैलाश चावला का टिकट काटना था तो कम से कम किसी और कार्यकर्ता को दिया जा सकता था।


लगातार पार्टी से बगावत करते आ रहे शख्स को टिकट देने का संदेश क्या है? इसे पार्टी नेतृत्व का अहंकार भी कहा जा सकता है कि इतने सीरियर नेताओं पर निर्णय लेने से पहले उन्हें कम से कम भरोसे में तो लिया जाता। रामानुरागी भाजपा इस समय रावण के अहंकार में जी रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस की मजबूरी है कि उसे जीतने वाले उम्मीदवारों की तलाश भाजपा के असंतुष्टों में करना पड़ रही है। भोपाल में हुजूर और गोविंदपुरा पर कांग्रेस इंतजार कर रही है। जीतेन्द्र डागा आए तो टिकट दें या फिर बाबूलाल गौर क्या निर्णय करते हैं और उन पर भाजपा किस फैसले पर पहुंचती है। कांग्रेस खड़े पैर बाबूलाल गौर, कृष्णा गौर, जीतेन्द्र डागा, हिम्मत कोठारी किसी को भी अपना उम्मीदवार बनाने के लिए राजी है। कांग्रेस का जहां अब पेंच फंस रहा है, वहां उसे जीतने की जरासी संभावना वाले उम्मीदवार भी तलाशना कठिन हो रहा है। कई सारे टिकट तो उसके हार्दिक पटेल भी तय करवा रहे हैं। मंदसौर विधानसभा क्षेत्र में लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस ने अगर हार्दिक के चक्कर में आकर किसी पाटीदार को टिकट दे दिया तो भाजपा उम्मीदवार के लिए चुनाव बहुत आसान हो जाएगा। जबकि चुनाव को कठिन बनाने वाले चेहरे उसके पास है। लब्बोलुआब यह कि दोनो पार्टियां समझ रही हैं कि सारा दारोमदार इस बार केवल चुनाव लड़ने वाले चेहरों पर टिका है। कांग्रेस ने गलतियों से अतीत में सबक नहीं लिया तो उसका वर्तमान संकट में है। और भाजपा, वो भविष्य के लिए संकट पैदा करने में जुटी है। उसके पास मौका है अभी अपनी गलतियों को सुधारने और सबक लेने का। वरना वैसे भी कांग्रेस और भाजपा के बहुत सारे अंतर मिटते तो जा रहे हैं।

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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