भगवामयी दिग्विजय और मुसलमान....



यह काफी हद तक समझ से परे है। सच कहें तो सच से भी परे दिखता है। भगवाधारियों के समूह के बीच दिग्विजय सिंह का मुुस्कुराते हुए सहज दिखना उनके भीतर के अब तक के हिंदू से कतई मेल नहीं खाता। हिंदुत्व के प्रति उनकी विचारधारा से इसका कोई तालमेल नहीं हो सकता। सबसे बड़ी बात यह कि दिग्विजय जिस श्रेणी के धर्म निरपेक्ष हैं, उस श्रेणी में भगवा के समीप जाना तो दूर, उसकी स्मृति करना तक गुनाहे-अजीम में शामिल किया जाता है। असल में भोपाल के चुनाव ने हिन्दूत्व की दो समानांतर लाइन खड़ी कर दी है। एक हिन्दूत्व की और दूसरी सनातनी कर्मकांडी हिन्दूत्व की। फिर भी भोपाल की सड़कों पर ऐसा होना हैरतअंगेज है। दिग्विजय भगवाधारियों से घिरे हुए थे। कुछ दिन पहले तक थाली के बैंगन की तरह इधर से उधर लुढ़क रहे कंप्यूटर बाबा कल सधे हुए कदमों से उनके साथ कदमताल कर रहे थे। कहने को तो आसपास की भीड़ दिग्विजय के समर्थकों की थी, किंतु आश्चर्यजनक रूप से उसमें से कोई भी न तो 'ओसामाजी' कह रहा था और न ही साधूओं की इस जमात को किसी 'साफ्ट हिन्दूत्व' की थ्योरी से जोड़कर देखा जा सकता है।  खैर, अपन को इससे कोई मतलब नहीं कि कल वाली भीड़ में कितने भगवाधारी असली थे और कितने पुलिस वालों को यह चोला पहनने पर मजबूर किया गया। हमारी यह जानने में भी कोई दिलचस्पी नहीं है कि कल की पदयात्रा के कितने समय बाद कंप्यूटर बाबा को कमलनाथ मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री का पद मिल पाएगा


अपना मतलब और रुचि केवल इस बात के लिए है कि इस सारे मजमे के पीछे मंसूबा क्या था? धार की भोजशाला तो आपको याद होगी ही। प्रदेश में शिवराज की सरकार रहते हुए वहां शुक्रवार को बसंत पंचमी के कारण हिंदू-मुस्लिमों के बीच टकराव काफी बढ़ गया था। हैरतअंगेज रूप से सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए, जो आमतौर पर भाजपाई परिपाटी से सर्वथा विपरीत थे। तब एक अखबार ने भाजपा की स्थिति पर लिखा था, 'रहीम तो पहले ही थे छूटे, अब भाजपा से राम भी रूठे।' भाजपा ने ऐसा क्यों किया, यह शिवराज ही जानें। लेकिन दिग्विजय ने बुधवार को जो किया, उसकी वजह की पड़ताल किए बिना पानी तक गले के नीचे उतारने का मन नहीं कर रहा है। जाहिर है दिग्विजय सिंह ने जो किया हिन्दूओं को साधने के लिए किया। उन्होंने हिन्दूओं को साधने के फेर में अपने अल्पसंख्यक समर्थकों को एक तरह से अपने पूरे प्रचार अभियान से दूर या सीमित रख छोड़ा है। दिग्विजय का भगवा रोड शो बहुत सारे सवाल उठा रहा है। दिग्विजय कंप्यूटर बाबा द्वारा उनकी विजय की कामना के लिए किए गए यज्ञ में शामिल हुए। माहौल पूरा भाजपामयी था। रोड़ शो में भी ऐसा ही हुआ। इस भीड़ में दिग्विजय सिंह के पीछे चल रहे नासिर इस्लाम के चेहरे के तनाव को साफ महसूस  किया जा सकता था। इसलिए सवाल यह कि इस सारी प्रचार कवायद में मुस्लिम वर्ग कहां है? भोपाल संसदीय क्षेत्र में इस वर्ग की करीब चार लाख की आबादी है। जानकारों का  कल से पहले यही मानना था कि यह वर्ग एकजुट होकर दिग्विजय को वोट करेगा।


लेकिन क्या अब भी ऐसा हो पाएगा? जिस भगवा के डर ने मुस्लिमों को भाजपा से दूर कर रखा है, वो तो उनकी उम्मीद के विपरीत कांग्रेस में भी बराबर से नुमाया हो रहा है। वहां भी तिरंगे दुप्पटे की जगह भगवा दुप्पटे ने ले ली है। यह तो उस हिन्दूत्व की ताकत सामने आ रही है जिससे दिग्विजय सिंह को नफरत है लेकिन जीत तो उसी की नहीं हो गई क्या?  मुस्लिम समुदाय तो शायद कल से यही सोच-सोचकर बेचैन हो रहा होगा कि जिस भगवाबाजी से नाखुश होकर उसे यहां कांग्रेस और दिग्विजय सिंह को वोट देना है, वो दिग्विजय तो उस भगवाबाजी में  भाजपा से भी एक कदम आगे निकल गये हैं। तो इस समुदाय के बीच तो अब भारी धर्मसंकट का माहौल हो गया होगा। क्योंकि इस तबके के मतदाताओं को कहीं वह कांग्रेस नजर ही नहीं आ रही , जो इससे पहले तक उन्हें अपनी-सी लगती थी। ओशो रजनीश उस समय अमेरिका में भारतीय दर्शन की दम पर छा गये थे। उन्होंने चर्च लॉबी की चूलें हिलाकर रख दी थीं। बड़ी संख्या में ईसाई मतावलम्बी यकायक हिंदू धर्म और संस्कृति के मुरीद हो गये थे। तभी एक समान प्रकृति के कई घटनाक्रम हुए। जिनके लिए कहा जाता है कि उनकी योजना तत्कालीन कलकत्ता (अब कोलकाता) में बनायी गयी थी। भारी संख्या में हिंदू से ईसाई बने भारतीय अमेरिका पहुंचने लगे। वे वहां ईसाइयत का प्रचार करते नजर आये। ओशो के चलते हिंदुस्तान की तरफ आकृष्ट हुए अमेरिकी ईसाई हतप्रभ रह गये।


उनके भीतर आसानी से यह भाव संचारित कर दिया गया कि हम जिस देश के हिंदू दर्शन की तरफ आकर्षित हुए, उसी देश के लोग तो ईसाइयत का झंडा लेकर चल रहे हैं। इससे कई लोगों का ओशो की ओर से मोहभंग हुआ। हालांकि ऐसा होने की और भी वजह रहीं। लेकिन कलकत्ता का काला जादू इसमें सबसे ज्यादा कारगर साबित हुआ।  क्या भोपाल संसदीय क्षेत्र के मुस्लिम मतदाता भी इसी तरह खुद को ठगा हुआ महसूस नहीं कर रहे होंगे? क्या उन्हें यह नहीं लग रहा होगा कि भगवा राजनीति के खिलाफ जिस कांग्रेस पर उन्होंने आंख मूंदकर भरोसा किया, वही पार्टी भगवामयी आचरण कर चुनाव जीतने की कोशिश कर रही है? गोया कि दिग्विजय को जीत के लिए सिर्फ और सिर्फ हिंदू मतों की जरूरत है।  यज्ञ और भगवा रोड शो किसी भी रूप से दिग्विजय के सॉफ्ट हिंदुत्व का हिस्सा नहीं थे। वह हार्डकोर जैसा मामला था, जिसके लिए मुस्लिम मतावलम्बी अब तक केवल भाजपा और मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित उसके आनुषंगिक संगठनों से नाराज थे। अब इस फेहरिस्त में काफी हद तक कांग्रेस और पूरी तरह से दिग्विजय का नाम भी जुड़ गया है।  लेकिन दिग्विजय जैसा चतुर राजनीतिज्ञ ऐसी गलती नहीं कर सकता। इसलिए संभव है कि ऐसा होने के पीछे कुछ और फैक्टर काम कर रहे हों। मुमकिन है कि कांग्रेस की मुस्लिम लीडरशिप ने दिग्विजय को यकीन दिला दिया हो कि आप तो भगवा लेकर आगे बढ़ो, मुस्लिम झक मारकर आपके पीछे-पीछे ही आएंगे। मोदी और भाजपा का डर उनके आगे कोई और रास्ता छोड़ता भी नहीं है।


मध्यप्रदेश में मुस्लिमों का दुर्भाग्य है कि यहां कोई तीसरी ऐसी राजनीतिक ताकत नहीं है जिस पर वे भरोसा कर सकें। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की मौजूदगी के बाद कांग्रेस यह सोचकर पूर्णत: आश्वस्त हो गयी है कि अब तो मुस्लिम मतदाताओं के पास उसे वोट देने के सिवाय और कोई विकल्प ही नहीं बचा है। हुआ तो शायद ऐसा ही कुछ है, वरना कोई वजह नहीं बनती थी कि दिग्विजय के प्रचार से मुस्लिम समाज को दूर रखा जाए। लेकिन ऐसा हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री को कुछ दिन पहले तक 'सच्चे हिंदू' की उपाधि देने कांग्रेस के दोनों विधायक आरिफ अकील और आरिफ मसूद, दिग्विजय के इस भगवापरस्त चुनाव अभियान में 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना' वाली हैसियत तक ही सिमटे नजर आ रहे हैं। तो अब मुस्लिम मतदाता क्या करे? क्या यह साबित कर दे कि वह वाकई कांग्रेस के एक विवश वोट बैंक में तब्दील होकर रह गया है? यह मानकर पंजे के आगे का बटन दबा दे कि इसके अलावा और कोई विकल्प उसके सामने है ही नहीं? या फिर वह सन 1989 का इतिहास दोहरा दे? उस साल के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने केएन प्रधान पर फिर यकीन जताया। नतीजा यह कि राम मंदिर आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका से नाराज मुस्लिम समाज ने बसपा प्रत्याशी अब्दुल रऊफ खां को 97 हजार से अधिक वोट दिये थे। प्रधान खेत रहे। भाजपा के सुशील चंद्र वर्मा जीत गये। मुस्लिमों का यह वह गुस्सा था कि इसके बाद से आज तक कांग्रेस इस सीट पर चुनाव नहीं जीत सकी है। इसलिए यदि दिग्विजय ने इस वर्ग के मतदाता को हांकने वाली नीयत से भगवामय राजनीति का रुख अख्तियार किया है तो उन्हें यह समझना चाहिए कि यह वर्ग प्रतिक्रिया करने में पूरी तरह सक्षम है। यदि उसे कोई अब्दुल रऊफ नहीं दिखा तो उसे मतदान के लिए घर से बाहर न निकलने या नोटा का बटन दबाने का विकल्प तो दिख ही जाएगा। क्योंकि अब मुस्लिमों के डर इतने भर से खत्म नहीं हो जाएंगे कि मोदी या भाजपा हार जाए ? (जारी)

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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