बातन हाथी पाइये, बातन हाथी पांव



तो साहब, सियासी बदजुबानी चरम पर है। मध्यप्रदेश विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह फरमा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी ने देश की जांच एजेंसियों को कुत्ता बना दिया है। इधर, राजनीति के आकाश पर विधायक बनकर छाये भाजपा नेता आकाश विजयवर्गीय ने फरमाया है कि कांग्रेसियों के रूप में भोपाल में गदहे एकत्र हो गये हैं।  कुत्ते जैसा वफादार और कोई जानवर नहीं होता। गदहे जैसा मेहनती जीव मिलना भी मुश्किल है। लेकिन नेताओं के श्रीमुख से इन चौपायों का जिक्र उनकी अच्छी क्षमताओं के लिए नहीं हुआ है। यकीनन सिंह का आशय कुत्ते के पालतू होने की बात से है और विजयवर्गीय का मंतव्य उस आम धारणा से है, जिसके तहत गदहे को परले सिरे का मूर्ख माना जाता है। लोकसभा चुनाव की घड़ी थोड़ी और पास सरकने दीजिए। कई और जानवर भी इस सियासी नौटंकी के मंच पर धकेले नजर आ जाएंगे। जो सियासी अधोपतन के अध्यायों में अन्य चरण भी जोड़ते जाएंगे।  लेकिन भाषाओं के तौर पर यह घोर अमर्यादित आचरण आखिर किस तत्व से फलफूल रहा है? क्या यह राजनीतिक लाभ पाने का जरिया है? या यह महज सुर्खियों में छाये रहने की जद्दोजहद है। दोनो ही बात का जवाब 'हां' में दिखता है। सिंह और विजयवर्गीय के वाक्य राजनीतिक हित साधने की गरज का प्रतीक हैं।


वहीं इनमें चर्चा में बने रहने की छटपटाहट भी साफ देखी जा सकती है।  दिग्विजय सिंह के शासनकाल में मंत्री पद और उसके बाद विधानसभा उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी राजेंद्र सिंह के लिए कल की बात हो गयी है। फिलहाल उनकी पहचान अमरपाटन से हारे कांग्रेस नेता के तौर पर ही सिमट कर रह गयी है। लोकसभा चुनाव में उन्हें तवज्जो मिलेगी, इसकी कम संभावना है। क्योंकि सिंह की तुलना में विंध्य के ही एक अन्य दिग्गज नेता अजय सिंह को टिकट मिलने की पूरी उम्मीद है। ऐसे में गरज-बरसकर ही अपनी उपादेयता साबित करने का प्रयास किया जा सकता है। फिर मामला कांग्रेस का हो तो मोदी को किसी भी हद तक जाकर गरियाने जैसा वर्तमान का लोकप्रिय चलन बहुधा कारगर साबित हो जाता है। शायद इसी आस का दामन थामकर सिंह ने अपने स्वभाव के विपरीत जाते हुए तल्ख और कानों को चुभने वाली बात कह दी है। वह सफल भी दिख रहे हैं। विधानसभा चुनाव की पराजय के बाद प्रदेश की राजनीति में 'भूले-बिसरे गीत' की स्थिति में पहुंचाए जा चुके सिंह आज एक बार फिर अखबारों में सचित्र प्रमुखता से दिख रहे हैं। आकाश विजयवर्गीय को राजनीतिक भाग्योदय एवं महत्वाकांक्षा बिरसे में मिले हैं। पिता कैलाश विजयवर्गीय का ऐसा असर कि 'पार्टी विद डिफरेंस' में भी वंशवाद के गिने-चुने उदाहरणों में से एक बन गए।


पिता के रसूख से ही चुनाव भी जीत गए। प्रदेश में फिर भाजपा की सरकार बनने के आसार थे। खबरें थीं कि ऐसा होने पर शिवराज को रिपीट नहीं किया जाएगा। ऐसे में जिन नामों पर चर्चा होती थी, उनमें कैलाश विजयवर्गीय का जिक्र अवश्य किया जाता रहा। लेकिन न सरकार बनी और न ही विजयवर्गीय सहित किसी अन्य विकल्प की लॉटरी खुलने का रास्ता साफ हो पाया। खुद कैलाश इस सबसे भारी विचलित दिख रहे हैं। कांग्रेस के एक अल्पसंख्यक विधायक को वे गाय का मांस खाने वाला कह चुके हैं। पिता की दशा का बेटे पर असर पड़ना तय था, सो वैसा ही हुआ। ऐसे में तीखा बयान ही वह तीर होता है, जो सामने  वाले को पीड़ा से भर  सके। वही तीर आकाश ने चल दिया। वह भी खासे महत्व के साथ मीडिया में जगह पाने में सफल हो गये।  इधर, दिल्ली में बीके हरिप्रसाद तो सुर्खियों के चक्कर में मानसिक संतुलन खोने की कगार पर पहुंच गये दिखते हैं। फरमा रहे हैं कि पुलवामा हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष इमरान खान की मिलीभगत का नतीजा था। किसी ने लिखा था, 'बातन हाथी पाइये, बातन हाथी पांव।' सिंह, विजयवर्गीय और हरिप्रसाद जैसे नेताओं की बातें हाथी का पांव पाने लायक ही हैं। बाकी उस आवाम पर निर्भर है, जो जल्दी होने जा रहे लोकसभा चुनाव में पार्टियों के लिए उनके ऐसे नेताओं के चलते हाथी का चयन करती है या हाथी के पैर तले दबाने का।

loading...

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति