बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी



लगता है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए कफील आजर की एक गजल न सिर्फ सुनने, बल्कि उसे समझने का यह सही समय आ गया है। आजर ने फरमाया है, ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी....।’ ये नज्म मौजू इस लिहाज से है कि पहले बात निकली, फिर बातें निकाली गयीं और वो फकत ‘दूर नहीं’, बल्कि बहुत दूर तक जा रही हैं। यह क्रिया की पूरी तरह स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।  मसला यह है कि बात बेहद नाजुक मोड़ पर पहले निकली, फिर निकाली गयी। मोड़ खालिस सियासी है। घुमावदार। संकरा। फिसलन से भरा हुआ। मामला, ‘नजर हटी तो दुर्घटना घटी’ वाला हो चुका है। कुल जमा दिमागी खर्च इस बात का कि बात क्या निकली थी? वह थी, पुलवामा का जवाब, जो जल्दी ही ‘मुंंहतोड़’ की भारतीयता से परिपूरित चादर पहनकर इस देश के सामने आ गया। लेकिन फिर क्या हुआ? किसी व्यक्ति ने अपनी झक सफेद दाढ़ी में उस चादर को अटका लिया। एक संगठन ने उस चादर को तार-तार होकर फटने की हद तक खींचा, जिसका एक सिरा विदर्भ की वांछित राजधानी तक तक बंधा हुआ था। या फिर कोई ‘मोटा भाई’ यूं भी प्रकट हुआ कि तीन राज्यों में अपनी हार से अरमानों भरे सीने में लगी चोट के निशानों को इसी चादर तले छिपाने का जतन करने लगा।  नि:संदेह पुलवामा का जिस तरह जवाब दिया गया, वह इस देश की ख्वाहिश का प्रतिनिधित्व करता था।


एक सच्चा भारतीय होने के नाते मैं बिना किसी शक-शुबहा के मानता हूं कि हमारे चालीस वीर जवानो की हत्या का सबब बने जैश के कई आतंकी बालाकोट में भयावह मौत का शिकार हुए होंगे। किंतु यह हमारी गौरवमयी सेना ने किया, मोदी या शाह ने नहीं। भाजपा ने नहीं। संघ ने नहीं। मोदी सरकार के प्रधानमंत्री हंैं तो उन्हें श्रेय देने में भी दिक्कत नहीं है। आखिर राजनीतिक इच्छा शक्ति का तो मोदी ने परिचय दिया ही है। लेकिन हर किसी मंच पर खड़े होकर आप इसका श्रेय लेने की हिमाकत करेंगे तो राजनीति तो आपके विरोधी दलों को भी करनी है या नहीं करनी! लेकिन ऐसा किया गया। गोया कि जो रणबांकुरे देश की सरहद के पार जाकर बम गिरा आये, वो कमल का फूल लगा ध्वज अपने उस सीने पर लपेटे हुए थे, जिसके नीचे वह छप्पन इंच का सीना था, जिस पर भगवा रंग में ‘नरेंद्र मोदी का सर्वाधिकार सुरक्षित’ लिखा हुआ था।  सेना का कोई राजनीतिक दल नहीं होता। वह केवल देश को जानती है। लेकिन अब तो माहौल यह है कि सेना को कमल के फूल पर विराजित दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। ‘हाउ इज द जोश...!’की जगह उसे ‘नमस्ते सदा वत्सले...’ के लिए तैयार करने का उपक्रम चल रहा है। आखिर क्या जरूरत थी मोदी को सेना के शौर्य का राजनीतिकरण करने की? जाहिर है कि मामला इसका सियासी लाभ लेने का था, इसलिए विपक्ष भी उन पर पिल पड़ा कि सबूत दें। मोदी को अपनी नहीं, तो ना सही, कम से कम संघ और भाजपा की गरिमा का लिहाज करना चाहिए था।


लेकिन वो पिल पड़े, इस कार्रवाई का श्रेय लेने के लिए। तो, जब आपने सेना के शौर्य का राजनीतिकरण खुद किया है तो फिर विपक्ष से गैर-राजनीतिक व्यवहार की उम्मीद आप कैसे कर रहे हैं! ग्वालियर में संघ ने फरमाया है कि सबूत मांगने वाले देशद्रोही हैं। संघ की देशभक्ति के लिए कोई अविश्वास नहीं है, लेकिन उससे कोई तो यह पूछे कि भला आपकी उत्तरोत्तर रूप से दिशा-विहीन हो रही राजनीतिक पौध (गुरूजी, डॉ हेडगेवार या दीनदयालजी की परिकल्पना से कोसों दूर पनपी गाजरघास/अमरबेल जैसी निहित स्वार्थां के लिए ठेंगा बताती) को मूर्खता से रोकने का कोई फॉर्मूला है आपके पास!!! मोदी ने बात निकाली तो वह दूर तलक तो जाएगी ही। यह संचरण उसका स्वाभाविक राजनीतिक हक है। आप एक टेलीकास्ट करके सेना के शौर्य का अभिनंदन कर देते। नौटंकी से बचते हुए। क्रेडिट लेने की सियासत से ईमानदारी से विरत होकर। पूरा देश जान रहा है कि मोदी है तो मुमकिन है। लेकिन गला फाड़ रोज चिल्लाओगे, अपनी धमक दिखाओगे तो दूसरा क्यों चुप रहेगा? अब रविवार को लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम का एलान हो गया है। अब आप राष्ट्रवाद और राष्ट्रदोह का फैसला जनता को करने दें। 23 मई को उसके हिसाब किताब का परिणाम देश के सामने होगा। अब कम से कम सोमवार से आप अपने पांच साल का जवाब दें, और विपक्ष आपसे पांच साल का जवाब मांगे, यह इस लोकतंत्र के हित में ज्यादा होगा। बनिस्बद इसके कि कौन राष्ट्रवादी है, कौन देशद्रोही। जनता जिसके विरोध में फैसला देगी तो इसका मतलब यह भी नहीं होगा कि चुनाव में हारने वाला राष्ट्रदोही होता है। कम से कम प्रमाणपत्र बांटने का साहस किसी को नहीं करना चाहिए। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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