अब तुनकमिजाजी से परहेज करें भार्गव



सम-सामयिक मुद्दों को लेकर अपनी रवायत के हिसाब से आज बात तो हिना कांवरे बनाम जगदीश देवड़ा होना थी, लेकिन इस पर चर्चा निरर्थक महसूस हो रही है। विधानसभा उपाध्यक्ष पद पर कांग्रेसी कांवरे की ताजपोशी होना तय है। इसलिए बात कुछ और। फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ी। जिसमें मध्यप्रदेश विधानसभा के कुख्यात ‘चप्पल-चूड़ी कांड’ की याद दिलाई गई थी। निशाने पर राज्य के नये नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव हैं। पोस्ट डालने वाले का कहना था कि भार्गव के संदर्भ में उसे यह घटना फिर याद आ गयी।  पूरी तरह अतीत के कब्रिस्तान में दफन इस मामले का जिक्र यकीनन सोद्देश्य किया गया है। इसमें बुराई भी नहीं है। सबको याद आना चाहिए कि भार्गव वाकचातुर्य के फेर में ऐसा कुछ कह गए थे कि तत्कालीन सुंदरलाल पटवा सरकार की खाट खड़ी हो गयी थी। इस लिहाज से यह भी याद किया जा सकता है कि इस कांड के कई साल बाद भार्गव ने एक महिला विधायक के लिए ‘मियां-बीवी राजी...’ जैसी बात कहकर एक और हंगामे का सूत्रपात कर दिया था।


  लेकिन जो हुआ और जिसे हुए अरसा बीत गया, उसे आज से जोड़ना कितना उचित कहा जा सकता है? मध्यप्रदेश की यही विधानसभा है, जिसमें एक तत्कालीन भाजपा विधायक तत्कालीन अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के चैम्बर मेंं बंदूक लहराते हुए घुस गया था। इधर, अध्यक्ष पद का चुनाव हार चुके विजय शाह भी एक समय सदन के भीतर एक सदस्य को जूता दिखाकर मारने की धमकी देकर उलझ गए थे। दोनो मामलों की जांच के बाद सख्त कार्रवाई की सिफारिश की गयी थी, लेकिन आसंदी ने सभी पक्षों से बातचीत कर सजा स्थगित कर दी। यह यकीन जताते हुए कि सदस्य भविष्य में ऐसा आचरण फिर कभी नहीं करेंगे। मालवा क्षेत्र से आने वाले कांग्रेस के एक तत्कालीन विधायक द्वारा आसंदी पर विराजमान तत्कालीन उपाध्यक्ष भेरूलाल पाटीदार के लिए इस्तेमाल किया गया आपत्तिजनक शब्द तो रिकॉर्ड तक में दर्ज था। लेकिन मामला  वहीं थम गया। यह याद दिलाने का आशय खराब आचरण के तुलनात्मक अध्ययन का नहीं है। मंतव्य केवल यह है कि ऐसे मामलों की सर्वशक्तिमान आसंदी ही जब संबंधित का फैसला कर चुकी हैं, तब उनकी याद को किसी के वर्तमान व्यवहार से संबद्ध करने का प्रयास कुछ  खलता है।&


  यहां यूपी के एक नेता याद आते हैं। नाम नहीं लूंगा। उस समय वहां के मुख्यमंत्री की हैसियत से वह भोपाल आए  थे। अनौपचारिक चर्चा के दौरान मैंने उनसे विरोधी पक्ष के कुछ आरोपों के बारे में पूछा। उनका जवाब था, ‘कभी मेरे गृह क्षेत्र आइए। वहां की जनता अखबार ही नहीं पढ़ती। इसलिए मेरी सेहत पर किसी आरोप का कोई फर्क नहीं पड़ता है।’ भार्गव के विधानसभा क्षेत्र रहली की अधिकांश जनता अखबार पढ़ती और न्यूज चैनल देखती ही होगी। इसके बावजूद सन 1985 से आज तक के हर चुनाव में उसने भार्गव को ही चुना है। जाहिर है कि राज्य विधानसभा में विरोधी दल के नये नेता पर उनके मतदाता का यकीन कायम है। फिर इतिहास का पन्ने खोलकर सोशल मीडिया ट्रायल शुरू करने का कोई खास औचित्य नहीं रह जाता है। हां, भार्गव की जिम्मेदारी बहुत बढ़ गयी है। इसी क्रम में उन्हें अपनी संजीदगी भी बढ़ाना होगी। कई मौकों पर सदन के भीतर भी वह शॉर्ट टैम्पर्ड नजर आ चुके हैं। दिवंगत कांग्रेस नेता रत्नेश सोलोमन की एक टिप्पणी पर उन्होंने बेहद तल्ख जवाब देकर सनसनी मचा दी थी। अब भार्गव से अपेक्षा रहेगी कि वह तुनकमिजाजी से कुछ परहेज कर जिम्मेदारी के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करें। क्योंकि प्रदेश की जनता ने उनकी पार्टी को 109 सीट देकर यह विश्वास जताया है कि उसे एक बहुत सशक्त विपक्ष की दरकार है।

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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