आलाकमान को प्यारे हुए नेताजी



विशुद्ध चम्चत्व की प्रतियोगिता ने भाषा की समृद्धि में विशिष्ट तरह का योगदान दिया है। मरीज को देखने गये तो बोला, 'सुना है हुजूर के दुश्मनों की तबीयत नासाज है।' किसी ने इस फानी दुनिया को अलविदा कहा, तो कहा, 'अल्लाह के  प्यारे हो गये।' या फिर 'भगवान ने अपने पास बुला लिया।' ऐसे ही कुछ लोगों की शिवराज सिंह चौहान को आज दरकार है। उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाये जाने की दुर्घटना को ऊपर बताये गये तरीकों की तर्ज पर पेश किया जाने के लिए। जो यह कह सकें, 'दिल्ली का दिल हमारे साहब के बिना नहीं लग रहा था, इसलिए उन्हें वहां बुला लिया गया।' कहा यह भी जा सकता है, 'हमारे टाइगर भाईजान आलाकमान को प्यारे हो गये। सीधी-सी बात है कि शिवराज सिंह चौहान को सियासी डेप्यूटेशन पर भेज दिया गया है। मध्यप्रदेश से दूर। अमित शाह ने यह निर्णय ठीक उस दिन लिया, जिस दिन शिवराज के नेतृत्व में 11 दिसंबर, 2018 से लेकर कल के बीच भाजपा ने राज्य में कांग्रेस के हाथों पराजय की शर्मनाक हेट्रिक बना ली थी। पूर्व मुख्यमंत्री तो एक विज्ञापन की पंक्ति की तरह 'पकड़े रहना, छोड़ना नहीं' की शैली में प्रदेश भाजपा पर पकड़ बनाए रखने की जुगत में लगे रहे, उधर दिल्ली ने बे-दिल होते हुए उनके सारे अरमान और किये-कराये पर  पानी फेर दिया।


  किसी एक अखबार के इस अनुमान में दम नहीं है कि प्रदेश में अगला लोकसभा चुनाव राकेश सिंह के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। सिंह के सिर पर शाह का हाथ है। यह हाथ उस सिर पर भी विराजमान है, जिसे नरोत्तम मिश्रा कहते हैं। शाह की कोशिश थी कि नेता प्रतिपक्ष का पद मिश्रा को मिले। कहा जाता है कि शिवराज, राजेन्द्र शुक्ला या भूपेन्द्र सिंह के लिए कोशिश कर रहे थे। इस खींचतान में एक सही नेता जो वास्तव में नेता प्रतिपक्ष का हकदार है, उन गोपाल भार्गव को उनका हक मिल गया। भार्गव की तो ताजपोशी हो गयी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री को नेता प्रतिपक्ष को रिमोट से संचालित करने की कोशिशों को देखते हुए आलाकमान ने शिवराज का कोई और उपयुक्त उपयोग सोच लिया है। वे भले ही किसी भी रूप में मध्यप्रदेश के नेतृत्व से दूर रहे लेकिन यह संभव नहीं है कि लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में उनकी  उपयोगिता को दरकिनार किया जा सके। चुनाव लोकसभा का होगा इसलिए नेतृत्व तो जाहिर तौर पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का ही होगा।  वैसे भी यह राजनीति है। इसमें कभी भी, कुछ भी हो सकता है। राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को ठिकाने लगाने के लिए पंजाब का राज्यपाल बना दिया था। राजनीति के चाणक्य ने यह मौका भी भुनाया और वहां लोंगोवाल समझौता कराकर गांधी की नजर में अपने नंबर बढ़वा लिए।


इसलिए कल के निर्णय को शिवराज के सियासी करियर के लिए मर्सिया गाने का मौका नहीं समझना चाहिए। किस्मत उन पर पूरे तेरह साल मेहरबान रही है। नर्मदा मैया की कृपा हुई तो चौहान दिल्ली में भी अपनी उपयोगिता साबित कर देंगे।   एक दूसरे अखबार ने संभावना जताई है कि शिवराज को उनके प्रदेश से दूर रखने के लिए किसी अन्य राज्य का प्रभार दिया जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो क्या शिवराज अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वि कैलाश विजयवर्गीय जैसा कमाल दिखा पाएंगे? विजयवर्गीय को हरियाणा का प्रभारी बनाया गया और वहां भाजपा की सरकार बन गयी। वे अभी पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी देख रहे हैं और वहां भाजपा का ग्राफ बढ़ रहा है। मालवा के इस नेता को निपटाने की यह कोशिश ही उनके राजनीतिक पुनरुद्धार का जरिया बनी। इसलिए चौहान के समर्थकों को मायूस नहीं होना चाहिए। दुआ करना चाहिए कि उनका नेता फिर किस्मत की कश्ती पर बैठकर सियासी तूफान का मुकाबला कर लेगा। फिलवक्त समर्थकों को सलाह दी जा सकती है कि नेताजी की स-सम्मान वापसी की उम्मीद में समय बितायें। कुछ गीत गुनगुनाए। एक गाना इस वक्त बड़ा मौजू लगता है। बोल हैं, ‘हम इंतेजार करेंगे तेरा कयामत तक। खुदा करे कि कयामत हो और तू आए।’ कयामत किसके ऊपर और किसके कारण आती है, यह दीगर बात है। मुख्य मुद्दा तो यह कि इंतजार का जज्बा कायम रहना चाहिए। कुछ गलत तो नहीं कहा ना! 

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प्रकाश भटनागर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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