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होली पर बचें सिंथेटिक नेताओं से भी

होली के उत्साह का प्रदर्शन कई जगह विभिन्न किस्म के मुखौटे पहनकर भी किया जाता है। इस दिन भांग के सेवन का चलन बरकरार है तो साथ ही शराब के शौकीनों के लिए भी यह दिन सुबह से बोतल का ‘मंगल’ करने की वजह बन जाता है। इससे सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि नशा प्राय: झगड़े या दुर्घटना का माहौल तैयार कर देता है। लोकतंत्र के महापर्व के नजदीक आते ही हमारे इर्द-गिर्द भी मुखौटेबाज सक्रिय हो गये हैं। अपनी असलियत छिपाकर इंसानियत और भाईचारे के प्रतीक का स्वांग रचाकर वोट मांगे जा रहे हैं।  आगे पढ़ें

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तुरंत लाभ की प्रत्याशा में दीर्घकालीन मूर्खता

ब्रहृमलीन युग पुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने लिखा था, बुद्धिमान वे हैं, जो बोलने से पहले सोचते हैं। मूर्ख वे हैं, जो बोलते पहले और सोचते बाद में हैं। अपने अधिकांश सार्वजनिक आचरणों के चलते राहुल गांधी उक्त वाक्य के दूसरे हिस्से में पूरी तरह फिट दिखते हैं। यदि उन्हें सपा और बसपा की चिरौरी करना ही थी तो फिर कोई वजह नहीं थी कि ‘फ्रंट फुट’ वाली बात कही जाए, वो भी छोटा मुंह, बड़ी बात वाले बेवकूफाना तरीके से। लगता है कि गांधी जोश-जोश में यह कह गये और जब होश आया तो वह लपककर बात संभालने के जतन में लग गये और वहां भी उन्हें औंधे मुंह की खाना पड़ गयी।  आगे पढ़ें

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मृत्यु से अवगत ही नहीं उसके अभ्यस्त भी हो गये थे पर्रिकर

पर्रिकर के निधन के पूर्व और पश्चात की परिस्थितियों को मैं भाजपा के संदर्भ में अपार जनप्रियता के खांचे में प्रमोद महाजन और अटल बिहारी वाजपेयी के बरअक्स रखता हूं। तीनों के निधन के सारे पूर्ववर्ती हालात स्पष्ट रूप से सामने थे। सभी जानते थे कि किसी भी समय बुरी खबर आ सकती है। फिर भी पर्रिकर के देहावसान पर भी देश के ऊपर भारी गम की वही छाया साफ दिख रही है, जो महाजन और वाजपेयी के अवसान के बाद नजर आयी थी।  आगे पढ़ें

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नाथ कर्ज उतारेंगे या मर्ज हटाएंगे ?

जो दिखाया जा रहा है वह यह है कि नाथ ने सिंह के लिए किसी कठिन मुकाबले की रूपरेखा खींच रखी है और यह भी कि दिग्विजय वही करेंगे, जो उनसे कहा जाएगा। हालांकि प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस की वापसी के बाद सिंह का यह कथन आसानी से गले नहीं उतरता है। वर्तमान मुख्यमंत्री की सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री, मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मेरी मर्जी, वाली भूमिका में ही दिखते हैं। इसलिए हाजमोला की भारी-भरकम खुराक के बावजूद सिंह की यह बात हजम नहीं हो पा रही कि वह किसी भी सीट से मुकाबले के लिए तैयार हैं। ऐसे में यही नजर आता है कि सिंह को सियासी वानप्रस्थ से पहले निरापद स्थान के तौर पर राजगढ़ से ही चुनावी मैदान में उतार दिया जाए। इस निर्णय की कांग्रेस के भीतर आलोचना होना तय है और तब नाथ के पास यह सुभीता होगा कि वह कह सकें कि दिग्विजय को पहले कठिन सीट की पेशकश की गयी थी, जिसके लिए उन्होंने कभी भी मना नहीं किया था। और राजगढ़ भी कठिन ही सीट है। कांग्रेस की सरकार और दिग्विजय सिंह का माइनस कर देंगे तो यह वो सीट है जिसने प्रदेश के बाहर से आए हुए जनसंघियों को भी गले लगाया था।read more  आगे पढ़ें

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किसलिए नाराज हैं वयोवृद्ध कांग्रेसी?

यकीनन यहां सवाल यह भी उठता है कि ऐसा होने के बावजूद मध्यप्रदेश में सिंधिया की जगह कमलनाथ और राजस्थान में पायलट की जगह अशोक गहलोत को क्यों मुख्यमंत्री बनाया गया? अजय माकन के स्थान पर दिल्ली इकाई की कमान शीला दीक्षित को क्यों सौंपी गयी? इसकी वजह भी साफ है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस ऐसे समय जीती, जबकि लोकसभा चुनाव सिर पर आ चुके थे। कई राज्यों में तेजी से जनाधार खो चुकी कांग्रेस यह जोखिम नहीं ले सकती थी कि बेहद तजुर्बेकार चेहरों को दरकिनार कर दिया जाए। गांधी को ऐसे मुख्यमंत्री चाहिए थे, जो अपने दीर्घ सियासी अनुभव की दम पर जीत का यह क्रम आम चुनाव तक बराकरार रख सकें। साफ है कि इस लिहाज से सिंधिया की तुलना में नाथ और पायलट के मुकाबले गहलोत समायानुकूल ज्यादा मुफीद पाये गये। जहां तक माकन का सवाल है, तो दिल्ली में बेहद कमजोर दशा में पहुंच चुकी पार्टी को उबारने के लिए उनकी जगह किसी समय की वाकई लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहीं दीक्षित को सामने लाना अवश्यंभावी हो चुका था।  आगे पढ़ें

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चीन के खिलाफ सख्त कदम का समय

वर्तमान घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है, जब चीन की लगातार कोशिश है कि भारत में निर्यात को और बढ़ाए। उसके इस प्रयास को नाकाम करने के लिए एक बार फिर जनक्रांति की जरूरत है। उसके उत्पादों को न खरीदने का हर भारतीय का संकल्प अजहर मसूद जैसे मानवता के दुश्मन की मदद करने का जबरदस्त प्रतिसाद साबित होगा, इसमें कोई शक नहीं है। राष्ट्रवाद का जो ज्वार पिछले दिनों उठा है उसे साबित करने का यह सही मौका है। यहां सरकार की ओर से भी सख्त कदम की दरकार है। याद रखें कि भारत व चीन दोनों विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सदस्य हैं। ऐसे में भारत डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत चीनी माल पर टैरिफ या गैरशुल्कीय प्रतिबंध लगाकर चीनी माल को रोक नहीं सकता है। लेकिन डब्ल्यूटीओ के नियमों का हवाला देते हुए चीन ने बोवाइन मीट, फल, सब्जियों, बासमती चावल और कच्चे पदार्थो के भारत से आयात पर बाधाएं उत्पन्न की हैं। ऐेसे में भारत द्वारा भी चीन के लागत से कम मूल्य पर माल भेजकर भारत के बाजार पर कब्जा करने का आधार देकर चीन के कई तरह के माल पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाकर उन्हें हतोत्साहित करना होगा। read more  आगे पढ़ें

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नाथ सरकार का ऐसा अनाथ आचरण

इंदौर के विमानतल पर कल एक मोबाइल फोन के चालू स्पीकर पर राज्य के मुख्यमंत्री कमलनाथ का पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से जो संवाद हुआ, वह इस किस्से की तरह ही विचित्र और दयनीय दशा वाला मामला है। उससे भी प्रदेश में मौजूद सरकार नामक संस्था की असलियत सामने आ गयी है। और यह भी समझ में आ गया कि कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बने इस आम चुनाव को कांग्रेस के दिग्गज नेता किस हलके अंदाज में ले रहे हैं। समझ नहीं आता कि कमलनाथ मुख्यमंत्री हैं तो मुख्यमंत्री जैसा दमदार आचरण क्यों नहीं कर पा रहे? और दिग्विजय अब एक पूर्व मुख्यमंत्री से ज्यादा प्रदेश में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं। उनसे संजीदगी की उम्मीद ही की जा सकती है। खासकर, तब और ज्यादा जब विधानसभा चुनाव में उनकी अहम भूमिका को याद किया जाए। read more  आगे पढ़ें

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खुद मुस्लिम दें इस करतूत का जवाब

आखिर इस देश में सियासी दलों की नजर में मुस्लिमों की क्या छवि है? क्या वह यह मान बैठे हैं कि मामला उस कौम का है, जो मजहब की बात कहकर जरा में बरगलाई जा सकती है? क्या उन्हें इस बात का दृढ़ विश्वास है कि देश के मुसलमान को उसके पक्ष में बचकानी दलीलें देकर बहलाया जाना बच्चों का खेल है? यदि वे ऐसा सोचते हैं तो फिर मूर्खता के चरम की नयी परिभाषा इस समाज को मिल गयी है। असदुद्दीन औवेसी की बात में दम है। मुस्लिमों के हित में उनके तर्कों को काटना थोड़ा मुश्किल होता है। वह फरमाते हैं कि जब रमजान के दौरान मुस्लिम बाकी सभी दैनदिनी काम करते हैं तो फिर मतदान में क्या दिक्कत आ सकती है? और मतदान में समय भी कितना लगता है? देश में इस पवित्र महीने के दौरान पहले भी चुनाव हुए हैं और उसका किसी स्तर पर विरोध नहीं हुआ। लेकिन इस बार जो मुद्दा उठाया गया, वह जताता है कि इस चरम मूर्खता के पीछे चुनाव में हार का खौफ काम कर रहा है। समय आ गया है कि खुद मुस्लिम अपने पाकीजा महीने के राजनीतिकरण की इस हरकत का जवाब दें। read more  आगे पढ़ें

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देश के मन की बात का समय

इस सबके बीच देखा जाए तो यह निर्वाचन कई तत्व और तथ्यों की अग्नि परीक्षा साबित होने जा रहा है। इनमें सबसे अहम यह कि देश की जनता 23 मई को बताएगी कि इतिहास में पहली बार भाजपा को स्पष्ट बहुमत प्रदान करने के निर्णय पर वह संतुष्ट है या उसे पछतावा है। वह इस बात पर भी अपने रुख का इजहार करने जा रही है कि नोटबंदी तथा वस्तु एवं सेवा कर अर्थात जीएसटी जैसे व्यापक असर वाले फैसलों पर उसकी क्या प्रतिक्रिया रहेगी। मतदाता यह भी स्पष्ट कर देगा कि राष्ट्रवाद की किस व्याख्या का वह समर्थक है? वैसे यह देश के दुर्भाग्य का प्रतीक ही है कि राजनीतिक हितों को साधने के फेर में राष्ट्रीयता के तत्व को किसी पांचाली में तब्दील कर दिया गया है।  आगे पढ़ें

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बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

नि:संदेह पुलवामा का जिस तरह जवाब दिया गया, वह इस देश की ख्वाहिश का प्रतिनिधित्व करता था। एक सच्चा भारतीय होने के नाते मैं बिना किसी शक-शुबहा के मानता हूं कि हमारे चालीस वीर जवानो की हत्या का सबब बने जैश के कई आतंकी बालाकोट में भयावह मौत का शिकार हुए होंगे। किंतु यह हमारी गौरवमयी सेना ने किया, मोदी या शाह ने नहीं। भाजपा ने नहीं। संघ ने नहीं। मोदी सरकार के प्रधानमंत्री हंैं तो उन्हें श्रेय देने में भी दिक्कत नहीं है। आखिर राजनीतिक इच्छा शक्ति का तो मोदी ने परिचय दिया ही है। लेकिन हर किसी मंच पर खड़े होकर आप इसका श्रेय लेने की हिमाकत करेंगे तो राजनीति तो आपके विरोधी दलों को भी करनी है या नहीं करनी! लेकिन ऐसा किया गया। गोया कि जो रणबांकुरे देश की सरहद के पार जाकर बम गिरा आये, वो कमल का फूल लगा ध्वज अपने उस सीने पर लपेटे हुए थे, जिसके नीचे वह छप्पन इंच का सीना था, जिस पर भगवा रंग में ‘नरेंद्र मोदी का सर्वाधिकार सुरक्षित’ लिखा हुआ था। read more  आगे पढ़ें

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