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गहरी न हो बुनियाद तो न तामीर कीजिए

गठबंधन का कोई लिखित संविधान या नियमावली नहीं है। लेकिन यह तो किया ही जा सकता है कि हाथ मिलाने से पहले सारी बातें साफ-साफ तय कर ली जाएं। देश के अनेक क्षेत्रीय दलों को गठबंधन के गणित ने राष्ट्रीय फलक तो प्रदान कर दिया, लेकिन गठबंधन का धर्म ठीक से न निभाए जाने की प्रवृत्ति ने कई ऐसे प्रसंग दिखाए, जिन्हें हम उपेंद्र कुशवाह की रालोसपा के रूप में वर्तमान उदाहरण के तौर पर देख सकते हैं। खुद भाजपा इसी बीमारी की शिकार है। तेलगुदेशम पार्टी और रालोसपा उससे नाता तोड़ चुके हैं। शिवसेना उसे आंखें दिखा रही है। read more  आगे पढ़ें

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कमलनाथ का मूल्यांकन

एक हजार करोड़ का कर्ज लेकर नाथ ने शिवराज सिंह चौहान की रवायत को कुछ अलग अंदाज में आगे बढ़ा दिया है। अलग अंदाज यूं कि शिवराज ने कर्ज के पैसे का इस्तेमाल वोट बटोरने वाले कामों के लिए किया। नाथ इस राशि का इस्तेमाल वोट मिल जाने का कर्ज चुकाने लोकसभा में वोट वापसी के इंतजाम के तौर पर कर रहे हैं। उन्हें किसानों का कर्ज माफ करना है। बसपा सुप्रीमो मायावती के इस कथन पर भी वह सकारात्मक रुख दिखा चुके हैं कि सूदखोरों से लिया गया कर्ज भी माफ किया जाए। read more  आगे पढ़ें

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राज शिवराज के भविष्य का

विपक्षी महागठबंधन का दांव सही पड़ा तो छप्पन इंच का सीना महज पांच साल में अतीत की बात हो जाएगा। ऐसा हुआ तो शिवराज को ताकत मिलेगी। किंतु ऐसा नहीं हुआ तो जाग के फिर सो जाता हूं, वाली पंक्ति तो जाफरी लिख ही गये हैं। हां, एक बात और बता दें। जाफरी ने इसी नज्म में एक जगह लिखा है, हर चीज भुला दी जाएगी, यादों के हसीं बुतखाने (मंदिर) से, हर चीज उठा दी जाएगी। फिर कोई नहीं ये पूछेगा, सरदार कहां है महफिल में ? यह शिवराज के लिए हमारी अपेक्षा नहीं है, लेकिन सियासत में विपरीत समय किसी भी दशा से साक्षात्कार करवा सकता है। फिर शिवराज को तो भाजपा में वीरेंद्र कुमार सखलेचा, उमा भारती सहित लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी तथा जसवंत सिंह आदि-आदि का उदाहरण याद होगा ही। नहीं? read more  आगे पढ़ें

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मामला प्रदेशाध्यक्ष पद का

एक सवाल उठता है। नाथ ने जब जरूरत नहीं कहा तो उनका आशय नये प्रदेशाध्यक्ष से था या केवल अजय सिंह से? क्योंकि क्षमताओं से लबरेज होने के बावजूद सिंह बीते कई घटनाक्रमों में कमतर साबित हो चुके हैं। चौधरी राकेश सिंह प्रकरण से लेकर चुरहट सहित विंध्य में कांग्रेस की चुनावी पराजय ने उनकी क्षमताओं पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यह सही है कि कई समर्थकों ने सिंह के लिए सीट खाली करने की बात कहकर उनके प्रति यकीन जताया है, लेकिन यह भी तो सही है कि जो शख्स अपने परम्परागत गढ़ चुरहट की जनता का ही विश्वास कायम नहीं रख पाया, उसे किस वजह से चुनावी साल में प्रदेशाध्यक्ष पद जैसी अहम जिम्मेदारी दे दी जाए? दोनो बार नेता प्रतिपक्ष रहते हुए सिंह ने तत्कालीन शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ दमदार तेवर दिखाए। वे अपनी हार के कारण तो जानते हैं लेकिन विंध्य में इस हार के पीछे की साजिश समझने का आग्रह वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से जरूर कर रहे हैं। लेकिन अब सरकार बन गई है तो कोई उनकी बात को शायद गंभीरता से नहीं ले रहा है। नेता प्रतिपक्ष रहते हुए भी वे पार्टी में अपनी लकीर लंबी नहीं कर पाएं, ऐसे में कांग्रेस उनकी दम पर संगठन को आगे बढ़ाने का जोखिम शायद ही लेना चाहेगी।read more  आगे पढ़ें

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धन्यवाद कमलनाथ जी

यह बात पूरी तरह सही थी कि विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए चुनाव वाली स्थिति कांग्रेस के असंतुष्ट तबके को तोड़ने की कोशिश के तहत ही की गयी थी। फिर संदेह नूरा कुश्ती के भी नजर आए। हालांकि इससे कमलनाथ या कांग्रेस की साख पर तो बट्टा नहीं लगा लेकिन पन्द्रह साल सत्ता में रहने का रिकार्ड दर्ज करने वाली भाजपा का नौसीखिया पन जाहिर हुआ। यह साफ है कि कमलनाथ सरकार के कार्यकाल तक प्रदेश में सत्ता तथा विपक्ष के बीच राजनीतिक शुचिता से सर्वथा परे कई प्रसंग देखने मिलेंगे। फिर भी संतोष इस बात का है कि कमलनाथ ने काजल की कोठरी में रहते हुए भी कलंक की इस कालिख से खुद को दूर रखने की एक छोटी सी कोशिश तो की ही है। भला क्या हैसियत हो सकती है मुकेश तिवारी या फिर उस जैसे किसी अन्य हेडमास्टर की? read more  आगे पढ़ें

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आलाकमान को प्यारे हुए नेताजी

सीधी-सी बात है कि शिवराज सिंह चौहान को सियासी डेप्यूटेशन पर भेज दिया गया है। मध्यप्रदेश से दूर। अमित शाह ने यह निर्णय ठीक उस दिन लिया, जिस दिन शिवराज के नेतृत्व में 11 दिसंबर, 2018 से लेकर कल के बीच भाजपा ने राज्य में कांग्रेस के हाथों पराजय की शर्मनाक हेट्रिक बना ली थी। पूर्व मुख्यमंत्री तो एक विज्ञापन की पंक्ति की तरह पकड़े रहना, छोड़ना नहीं की शैली में प्रदेश भाजपा पर पकड़ बनाए रखने की जुगत में लगे रहे, उधर दिल्ली ने बे-दिल होते हुए उनके सारे अरमान और किये-कराये पर पानी फेर दिया।  आगे पढ़ें

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सियासी बवासीर की ऐसी तकलीफ

मध्यप्रदेश की सरजमीं पर इस समय भाजपा के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ही दिखते हैं। खुद उन्हें पहला तमाचा तब पड़ा, जब अपेक्षाकृत मजबूत हुई कांग्रेस ने उनकी सरकार को पटखनी दे दी। दूसरा तमाचा विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में विजय शाह की पराजय के रूप में भाजपा के गाल पर पड़ा। पार्टी को तीसरा और सर्वाधिक ताजातरीन पड़ा झापड़ उपाध्यक्ष के तौर पर हिना कांवरे की जीत तथा भाजपाई जगदीश देवड़ा की हार के तौर पर अभी तक फिजा में गूंज रहा है। बिना किसी तफ्तीश के कहा जा सकता है कि शेष दो झापड़ का इंतजाम मुखिया यानी शिवराज ने ही किया था। अध्यक्ष पद के मतदान के समय उन्होंने ही विधानसभा से भाजपा के बहिष्कार की घोषणा की थी। इस पद पर हार के बावजूद उपाध्यक्ष का चुनाव कराने की सोच भी उनके दिमाग की ही उपज थी। तो क्या यह भी अकेले पिटता तो... वाली दलील से जुड़ा मामला ही है? read more  आगे पढ़ें

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अब तुनकमिजाजी से परहेज करें भार्गव

पूरी तरह अतीत के कब्रिस्तान में दफन इस मामले का जिक्र यकीनन सोद्देश्य किया गया है। इसमें बुराई भी नहीं है। सबको याद आना चाहिए कि भार्गव वाकचातुर्य के फेर में ऐसा कुछ कह गए थे कि तत्कालीन सुंदरलाल पटवा सरकार की खाट खड़ी हो गयी थी। इस लिहाज से यह भी याद किया जा सकता है कि इस कांड के कई साल बाद भार्गव ने एक महिला विधायक के लिए ‘मियां-बीवी राजी...’ जैसी बात कहकर एक और हंगामे का सूत्रपात कर दिया था।  आगे पढ़ें

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कालीराम का फट गया ढोल

अब जब लड़ने का फैसला कर ही लिया था तो हारने से क्या डरना था। कांग्रेस ने शुरूआत बेईमानी से की लेकिन लगता है जैसे कुश्ती नूरा थी। क्योंकि कांग्रेस बाद में पांचवा प्रस्ताव भी मानने को तैयार थी, लेकिन भाजपा ने सदन से बाहर जाने का फैसला शायद पहले ही कर लिया था। यह तो परसों रात ही तय हो गया था कि कांग्रेस के पास 121 सदस्यों के समर्थन की पुख्ता व्यवस्था है। ऐसे में भाजपा को जगहंसाई कराने से बचना चाहिए था। उसने कल निर्णय लिया कि इस पद के लिए चुनाव कराएगी। फिर ऐनवक्त पर पार्टी ने बहिर्गमन किया तो क्या उसका भी डर नहीं था कि वोटिंग होने की सूरत में उसके ही कुछ सदस्य कांग्रेस के प्रत्याशी का समर्थन कर सकते हैं? इसलिए अपनी जांघ उघाड़कर दिखने की प्रक्रिया से बचने के लिए उसके सदस्यों को सदन से बाहर का रुख करना पड़ा? इससे बेहतर तो यही होता कि राज्य की परम्परा के अनुरूप अध्यक्ष पद पर सत्तारूढ़ दल का विधायक चुनने दिया जाता और उपाध्यक्ष पद सम्माजनक तरीके से भाजपा के खाते में आ जाता। पर डरी हुई कांग्रेस ने पहले से ही उपाध्यक्ष का पद खुद के पास रखने का फैसला किया हुआ था। उपाध्यक्ष कोई बहुत निर्णायक भूमिका में नहीं रहता है लेकिन जब रोज के ही टकराव सामने दिख रहे हैं तो सत्तापक्ष के पास इसके अलावा रास्ता भी बाकी नहीं था। इसलिए मध्यप्रदेश में सत्तापक्ष और विपक्ष फिलहाल दोनों एक दूसरे से डरे हुए नजर आ रहे हैं।read more  आगे पढ़ें

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‘माई का लाल’ के बाद के मोदी

शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद के दम्भ में जिस समय पदोन्नति में आरक्षण को लेकर मदमस्त आचरण दिखाया था, तब उनके साथ-साथ मोदी ने भी कल्पना नहीं की होगी कि इसका क्या परिणाम होगा। सपाक्स भले ही राजनीतिक गलियारों में दमदार उपस्थिति दर्ज न करवा सका हो, किंतु सामाजिक स्तर पर उसने वह हलचल मचा दी, जिसके चलते कहीं नोटा का असर दिखा तो कहीं सवर्ण बाहुल्य वाली सीटों पर भाजपा के मत प्रतिशत कमी दर्ज की गयी। जाहिर कि एट्रोसिटी एक्ट को लेकर फैली विपरीत गरम हवा के थपेड़ों ने भी मोदी की नींद उड़ा दी है। उनकी स्वाभाविक चिंता आने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर है। मोदी की काबीना मंत्री स्मृति ईरानी भी दो दिन पहले एक सार्वजनिक कार्यक्रम में 2019 सभी के लिए मुश्किल होने वाला है कह चुकी हैं। सीधी सी बात है कि उनका भी इशारा आम चुनाव की ओर था और मोदी की सवर्णों के प्रति यह चिंता भी खालिस सियासी स्वरूप की है। read more  आगे पढ़ें

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