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साध्वी का घोर अनुचित आचरण

यह समझ से परे है कि जिस पार्टी का संगठनात्मक ढांचा तथा अनुशासन सर्वाधिक सख्त माना जाता हो, उसी पार्टी में भगवा धारण करने वाले कई लोग क्यों जुबानी अंगारों का प्रतीक बन जा रहे हैं। किसी समय साध्वी उमा भारती ने तो समूची पार्टी की इज्जत भरी बैठक में मीडिया के सामने उतारकर रख दी थी। यकीनन यह भाजपा की जरूरत है कि भगवा आतंकवाद जैसे प्रोपेगेंडा के मुकाबले का मजबूती से जवाब देने के लिए भगवाधारियों की ही मदद ले, किंतु ऐसे लोगों पर अंकुश लगाना भी तो पार्टी के कर्ताधर्ताओं का ही जिम्मा है। किंतु ऐसा होता नहीं दिख रहा। इससे हो यह रहा है कि गैर-राजनीतिक भगवाधारी भी अपनी छवि पर दाग लगता महसूस कर रहे हैं।साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का ताजा बयान बे-सिर पैर का है। चलिए मान लिया कि हेमंत करकरे ने उन्हें अमानवीय यातनाएं दीं। इन बातों का जिक्र करते हुए उनका आपा खो देना भी समझ में आता है। किंतु ये अचानक गोडसे कहां से बीच में आ गये? क्या साध्वी को यह इल्म भी नहीं कि मीडिया तो अधिकांश सवाल पूछता ही सनसनी के लिए है। फिर ऐसा कैसे हो गया कि एक सवाल का बचकाना और पूरी तरह असामयिक जवाब देकर उन्होंने देश-भर में अपनी ही पार्टी को नीचा देखने पर मजबूर कर दिया?  आगे पढ़ें

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कुछ तो वहां जरूर है, पत्थर जहां गिरा

1891 वो साल है जिस साल विद्यासागर का देहांत हुआ। तब न राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कोई अस्तित्व था और न ही भाजपा नामक किसी शै का उद्भव हुआ था। यह कांग्रेस के भी शुरूआती दिन थे। यह दिवंगत पुण्यात्मा तो परसों से पहले कभी भी ममता बनर्जी की आस्था का केंद्र भी नहीं थी। तो फिर अचानक क्या हो गया कि इनकी प्रतिमा टूटी और आरोप-प्रत्यारोप का क्रम शुरू हो गया! ऐसा लगता है कि अधिकांशत: प्रतिमाओं का महत्व उनके तोड़े जाने के बाद ही समझ आता है। त्रिपुरा में व्लादिमीर लेनिन मूर्ति बने खड़े थे। दशकों से उनका प्रमुख उपयोग एक ही था। उनके जरिये वामपंथी वहां अपनी सत्ता होने का भाव जता देते थे। ठीक वैसे ही, जैसे जंगल में शेर एक विशेष परिधि में लघुशंका करके वहां अपना अधिकार घोषित कर देता है। भाजपा सत्ता में आयी और राज्य से वामपंथी गुरूर की तरह ही लेनिन महोदय भी तोड़ दिये गये। परसों से जैसे ममता बिफरी हुई हैं, वैसे ही त्रिपुरा में वामपंथी लाल-पीले हो गये। गोया कि मामला अफगानिस्तान के बमियान में बौद्ध प्रतिमाओं को ढहा दिया जाने वाला हो। चलिये त्रिपुरा में तो यह सत्ता परिवर्तन का असर था, लेकिन पश्चिम बंगाल में भला भाजपा को विद्यासागर से क्या आपत्ति हो सकती है? विद्यासागर समाज सुधारक थे, शिक्षाविद् थे, बंगाल के रूढ़िवादी समाज में विधवा विवाह उनकी बदौलत स्थान पा सका। यानि वे उनकी ऐसी कोई पहचान अस्तित्व में नहीं है जिसमें उन्हें धर्मनिरपेक्ष या साम्प्रदायिक जैसा कोई तमगा दिया जा सकता हो।read more  आगे पढ़ें

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मणिशंकर अय्यर पर एक लघु शोध

वह मनोचिकित्सक आज भी सक्रिय हैं। कई बार मन होता है कि मणिशंकर अय्यर को उनके पास लेकर जाऊं। पता लगाऊं कि बेहद पढ़े-लिखे और ज्ञानी इस शख्स की समस्या क्या है। क्योंकि अय्यर के साथ कुछ तो भारी गलत हुआ है। वह पाकिस्तान के गुण गाते हैं। उस देश पर उन्हें इतना भरोसा है कि वहां की सरकार से नरेंद्र मोदी को अपदस्थ करने में सहयोग मांग चुके हैं। उन्होंने पाकिस्तानी सेना द्वारा पांच भारतीय सैनिकों की निर्मम हत्या पर लोकसभा में चर्चा कराने से इनकार कर दिया था। वह पाकिस्तान जाकर आतंकवादियों की मेहमानी कबूल कर चुके हैं। बीते साल ही उन्होंने कहा था कि उन्हें भारत में नफरत और पाकिस्तान में प्यार मिलता है। पहले उन्होंने नरेंद्र मोदी को नीच कहा और अब इस बात को फिर सही बताकर विवाद खड़ा कर दिया है। तो इस सबकी पड़ताल किया जाना तो बनता है। बात लाहौर से शुरू करें। अय्यर वहां पैदा हुए थे। विभाजन के बाद उन्हें भारत आना पड़ गया। मुझे लगता है कि लाहौर में उनका कुछ ऐसा छूटा कि वह उसकी पीड़ा से अब तक मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। ऐसा क्या हो सकता है?  आगे पढ़ें

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एक पाती कमल हासन के नाम

आपकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं हैं। समस्या यह कि इस किस्म की आपकी तबीयत उस समय हरी होना शुरू हुई, जब रजनीकांत ने राजनीतिक रुचि का प्रदर्शन आरम्भ किया। यहीं मामला आपके लिए बिगड़ने लगा। क्योंकि आपको एक अभिनेता के तौर पर गढ़ी गयी छवि के जरिये जनता का समर्थन मिलने की उम्मीद थी। किंतु इस समर्थन के लिहाज से रजनीकांत आपसे कई गुना आगे हैं। तमिलनाडु में वह भगवान की तरह पूजे जाते हैं। आपको अपनी फिल्में हिट कराने के लिए उनमें स्पेशल इफेक्ट डालने होते हैं। इससे भी काम न चले तो फिल्म को लेकर विवाद खड़े करने होते हैं। इधर, रजनीकांत को किसी फिल्म को सुपर हिट करने के लिए उसमें केवल अपना नाम देना होता है। फिर रजनीकांत का रुख भाजपा के प्रति अच्छा है। इसलिए आपको अपनी दाल गलाने के लिए हिंदू-विरोधी राजनीति से ही शुरूआत करना पड़ी है। ममता बनर्जी के साथ आपकी एक तस्वीर देखी है। उसमें आप एक थैला लेकर कैमरे के सामने खींसें निपोर रहे हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि इस थैले में बनर्जी का वह तमाम साहित्य भरा होगा, जो आपको यह शिक्षा दे सके कि किस तरह सेक्यूलर होने के नाम पर घोर हिंदू-विरोधी राजनीतिक करके किसी राज्य का मुख्यमंत्री बना जा सकता है।  आगे पढ़ें

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इस भारी भरकम मतदान के मायने

तो क्या यह मान लें कि मध्यप्रदेश में हो रही यह बम्पर वोटिंग राज्य सरकार के खिलाफ विशेषत: किसानों के गुस्से का नतीजा है? या फिर यह कमलनाथ सरकार ने जैसा वो दावा कर रही है कि संकल्प पत्र के जिन वचनों को उसने पूरा कर दिया है यह उसके प्रति लोगों का समर्थन है। लोगों में आक्रोश तो दनादन हो रही बिजली कटौती को लेकर भी है। भोपाल में जहां पांच दशक बाद मतदान प्रतिशत ने साठ का आंकडा पार किया है, वहां तो माना जा सकता है कि दिग्विजय सिंह और हिंदू आतंकवाद की प्रतीक साध्वी प्रज्ञा ठाकुर एक विषय हो सकती हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह भी है कि भोपाल लोकसभा के भी ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान ज्यादा बढ़ा है। खेती किसानी से ज्यादा वास्ता ग्रामीण आबादी का ही होता है।एकतरफा सोचना ठीक नहीं है। इसलिए यह तथ्य भी नहीं बिसराया जा सकता कि यह प्रतिशत मोदी सरकार के खिलाफ जनादेश वाला मामला भी हो सकता है। अनेकानेक मोर्चों पर यह सरकार भी असफल रही है। लेकिन मोदी की प्रति नाराजगी या समर्थन तो देश भर में एक जैसा ही होता, इसमें मध्यप्रदेश क्यों अलग जाता दिख रहा है? दिमाग पर बहुत अधिक जोर डालने के बावजूूद मामला नाथ या गांधी के बराबरी वाली नाराजगी का प्रतीत नहीं हो पाता। मध्यप्रदेश के संदर्भ में इसकी एक वजह नजर आती है। यहां पंद्रह साल बाद बनी कांग्रेस की सरकार से भाजपा-विरोधियों की अपेक्षाएं अनंत तक पहुंच गयी थीं। खासतौर पर दस दिन में कर्ज माफी की बात ने जनमत को सर्वाधिक प्रभावित किया था। read more  आगे पढ़ें

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अभी और बढ़ेगा यह सियासी उथलापन

मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बनने के बीच मोदी को जो सियासी सबक मिले, उनका सन 2014 से अब तक लाभ उठाने में मोदी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने कई वरिष्ठ नेताओं और घनिष्ठ रिश्तेदारों पर जांच एजेंसियों के कसे शिकंजे से बिलबिला रहे विपक्ष के इस आरोप में कई मौकों पर दम दि खता है कि मोदी ने जांच एजेंसियों का दुरूपयोग किया है। ठीक उसी तरह, जैसा कभी खुद उन और अमित शाह के खिलाफ किया गया था। यानी वर्तमान प्रधानमंत्री ने जो किया, वह कतई नया नहीं था। हां, मोदी अगर चाहते तो प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुसार मर्यादा का एक नया अध्याय लिख सकते थे। लेकिन उनके सत्तासीन होने को ही कई लोग इस देश में पचा नहीं पाए तो मोदी के लिए भी प्रधानमंत्री पद की मर्यादा को उच्च स्तर पर बनाए रखना उनके अतीत को देखते हुए मुश्किल ही था। इस देश के राजनीतिक कदाचार में वह कोई नयी प्रेक्टिस का हिस्सा नहीं था। read more  आगे पढ़ें

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न मुस्लिम कुछ भूलेंगे और न ही हिंदू

इस कॉलम में हमने पहले भी याद दिलाया है कि किस तरह मंसूर अली खां पटौदी और उनके तत्कालीन चुनाव प्रबंधक गुफराने-आजम की जुगलबंदी ने पटौदी को यहां बुरी तरह हार दिलवाई थी। धु्रवीकरण का सबसे तगड़ा उदाहरण तब भी देखने को मिला था, जब 1992 के दंगों के बाद हुए 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने भोपाल उत्तर सीट से बेहद ताकतवर जनता दल उम्मीदवार आरिफ अकील को नौ हजार से अधिक मतों से शिकस्त दे दी थी। कांग्रेस की तो भोपाल उत्तर के मतदाताओं ने लगातार दो चुनावों में जमानत जब्त करा दी थी। यह वो दौर था जब न कांग्रेस पर हिन्दू भरोसा कर रहे थे और ना ही मुस्लिम। याद दिला दें कि यह वह समय था, जब संघ सहित तमाम हिंदूवादी संगठनों ने इस बात के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था कि हिंदू मत विभाजित न होने पाये। इसके लिए राजनीतिक स्तर सहित सामाजिक समरसता के भी अनेक वह प्रयत्न किये गये, जिनसे अंतत: शर्मा को जीत हासिल हुई। इस चुनाव में दिग्विजय सिंह ने जिस तरह के हिंदुत्व की आजमायश की है, उससे यह संभावना खारिज नहीं की जा सकती कि इसकी सर्वथा विपरीत और तीखी प्रतिक्रिया सामने आ सकती है।  आगे पढ़ें

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भगवामयी दिग्विजय और बेचारे मुसलमान

दिग्विजय का भगवा रोड शो बहुत सारे सवाल उठा रहा है। दिग्विजय कंप्यूटर बाबा द्वारा उनकी विजय की कामना के लिए किए गए यज्ञ में शामिल हुए। माहौल पूरा भाजपामयी था। रोड़ शो में भी ऐसा ही हुआ। इस भीड़ में दिग्विजय सिंह के पीछे चल रहे नासिर इस्लाम के चेहरे के तनाव को साफ महसूस किया जा सकता था। इसलिए सवाल यह कि इस सारी प्रचार कवायद में मुस्लिम वर्ग कहां है? भोपाल संसदीय क्षेत्र में इस वर्ग की करीब चार लाख की आबादी है। जानकारों का कल से पहले यही मानना था कि यह वर्ग एकजुट होकर दिग्विजय को वोट करेगा। लेकिन क्या अब भी ऐसा हो पाएगा? जिस भगवा के डर ने मुस्लिमों को भाजपा से दूर कर रखा है, वो तो उनकी उम्मीद के विपरीत कांग्रेस में भी बराबर से नुमाया हो रहा है। वहां भी तिरंगे दुप्पटे की जगह भगवा दुप्पटे ने ले ली है। यह तो उस हिन्दूत्व की ताकत सामने आ रही है जिससे दिग्विजय सिंह को नफरत है लेकिन जीत तो उसी की नहीं हो गई क्या? मुस्लिम समुदाय तो शायद कल से यही सोच-सोचकर बेचैन हो रहा होगा कि जिस भगवाबाजी से नाखुश होकर उसे यहां कांग्रेस और दिग्विजय सिंह को वोट देना है, वो दिग्विजय तो उस भगवाबाजी में भाजपा से भी एक कदम आगे निकल गये हैं। तो इस समुदाय के बीच तो अब भारी धर्मसंकट का माहौल हो गया होगा। क्योंकि इस तबके के मतदाताओं को कहीं वह कांग्रेस नजर ही नहीं आ रही , जो इससे पहले तक उन्हें अपनी-सी लगती थी।  आगे पढ़ें

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भगवामयी दिग्विजय और मुसलमान....

दिग्विजय का भगवा रोड शो बहुत सारे सवाल उठा रहा है। दिग्विजय कंप्यूटर बाबा द्वारा उनकी विजय की कामना के लिए किए गए यज्ञ में शामिल हुए। माहौल पूरा भाजपामयी था। रोड़ शो में भी ऐसा ही हुआ। इस भीड़ में दिग्विजय सिंह के पीछे चल रहे नासिर इस्लाम के चेहरे के तनाव को साफ महसूस किया जा सकता था। इसलिए सवाल यह कि इस सारी प्रचार कवायद में मुस्लिम वर्ग कहां है? भोपाल संसदीय क्षेत्र में इस वर्ग की करीब चार लाख की आबादी है। जानकारों का कल से पहले यही मानना था कि यह वर्ग एकजुट होकर दिग्विजय को वोट करेगा। लेकिन क्या अब भी ऐसा हो पाएगा? जिस भगवा के डर ने मुस्लिमों को भाजपा से दूर कर रखा है, वो तो उनकी उम्मीद के विपरीत कांग्रेस में भी बराबर से नुमाया हो रहा है। वहां भी तिरंगे दुप्पटे की जगह भगवा दुप्पटे ने ले ली है। यह तो उस हिन्दूत्व की ताकत सामने आ रही है जिससे दिग्विजय सिंह को नफरत है लेकिन जीत तो उसी की नहीं हो गई क्या? read more  आगे पढ़ें

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नाथ का गुस्सा शिवराज से या राहुल से?

इस लोकसभा चुनाव के बीच पेशागत और कुछ निजी कारणों से भी कई बार देहाती इलाकों में जाना हुआ। हर जगह एक शिकायत मिली। कर्ज माफ न होने की। किसान इससे परेशान दिखे। मेरे कांग्रेसी मित्र भी आॅफ द रिकॉर्ड बातचीत में इस स्थित से शर्मिंदा और उलझन में भरे नजर आये। इसकी वजह केवल और केवल दो रहीं। पहली, राहुल गांधी की नादानी-मिश्रित व्यग्रता और दूसरी, कांग्रेस में उनके खिलाफ बोलने के साहस का अभाव। राहुल जानते थे कि दस दिन में कर्ज माफी किसी भी सूरत में संभव नहीं है। खासतौर से तब तो कतई नहीं, जब इस ऐलान को चट मंगनी, पट ब्याह की तर्ज पर किया जाए। कांग्रेसी हरकारों के सुर ऐसे ही थे, जैसे कि दस दिन में कर्ज माफी का प्रमाण पत्र हर किसान के हाथ में होगा। हरकारे मुतमईन थे कि राहुल गांधी ने कहा है तो यकीनन ऐसा करने के लिए उनके पास योजना भी होगी। लेकिन योजना तो केवल यह थी कि किसी तरह नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाया जाए।  आगे पढ़ें

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