शनि के होते हैं बारह भाव जाने कैसा होता है उनका प्रभाव



प्रथम भाव में पहले भाव मे शनि गोचर की गति और दशा मे शोक पैदा करते हैं। प्रथम भाव में शनि अपने स्थान से तीसरे भाव को भी देखता है। प्रथम भाव का शनि सुनने में कमी कर देता है, और सामने वाले को जोर से बोलने पर ही सुनायी देता है, या वह कुछ का कुछ समझ लेता है। कर्इ बार इसीलिये जीवन साथी के साथ कुछ सुनने और कुछ समझने के कारण सम्बन्धों मे कडुवाहट घुल जाती है, और सम्बन्ध टूट भी जाते हैं। प्रथम भाव से दसवी नजर सीधी कर्म भाव पर भी पड़ती है। दूसरे भाव में दूसरा भाव, धन का भाव है,यानि रुपया,पैसा,सोना,चान्दी,हीरा,मोती,जेवरात आदि। शनि देव दूसरे भाव में अपने ही परिवार वालों से झगड़ा करवा देते हैं।यहां शनि चौथे भाव आैर आठवें भाव को भी देखता है। जिनके इस भाव में शनि होता है वे कुछ करना चाहते हैं कुछ और ही समझ मे आता है। तीसरे भाव में शनि शनि का तीसरा भाव पराक्रम का होता है। इस भाव से शनि पंचम भाव को भी देखता है, जिनमे शिक्षा,संतान और तुरंत आने वाले धन का पता चलता है। नवें भाव को भी तीसरा शनि आहत करता है, जब शनि इस भाव में होता है तो व्यक्ति के ननिहाल खानदान को प्रताड़ित करता है। चौथे भाव मे शनि चौथे भाव में शनि का मुख्य प्रभाव व्यक्ति के लिये काफ़ी कष्ट देने वाला होता है।पुराणों के अनुसार इस शनि की उपस्थिति आजीवन कष्ट देने वाली बतार्इ गर्इ है। हां अगर यह शनि तुला, मकर, कुम्भ या मीन का होता है, तो इससे मिलने वाले कष्टों मे कुछ कमी आ जाती है।


पांचवे भाव का शनि इस भाव मे शनि व्यक्ति को मन्त्र वेत्ता बना देता है जिनके चलते वो अनेक लोगों का भला करने वाला तो बन जाता है, लेकिन अपने लिये आैर जीवनसाथी, जायदाद, और नगद धन के साथ जमा पूंजी के लिये दुख ही उठाता है। इस भाव में शनि के होने से संतति मे विलंब होता है,आैर जीवनसाथी के साथ मन मुटाव होने के कारण संबंधों आैर जीवन के प्रति उदासीनता आ जाती है। छठे भाव में शनि इस भाव मे शनि सभी प्रकार के दैहिक, दैविक और भौतिक रोगों का कारण बन जाता है, लेकिन ये पारिवारिक शत्रुता को समाप्त कर देता है। ,जिस व्यक्ति के छठे भाव में शनि होता है वह नौकरी में सफ़ल होता रहता है, लेकिन अगर वो स्वयं को काम करना चाहता है तो असफ़ल हो जाता है। इस भाव का शनि कही आने जाने पर रास्तों मे भटकाव भी देता है, और अक्सर लोग जानी पहचानी जगह को भी भूल जाते है। सातवें भाव मे शनि शनि का सातवां भाव पत्नी और मन्त्रणा करने वाले लोगो से संबंधित होता है। इससे ग्रसित व्यक्ति दूसरों की अपेक्षा अपने को हमेशा हर बात में छोटा ही समझता रहता है, आैर कुंठा का शिकार हो जाता है। पेट और जनन अंगो मे सूजन और महिलाआें की बच्चेदानी आदि की बीमारियां इसी शनि के कारण से मिलती है। आठवें भाव में शनि मान्यता है कि इस भाव का शनि खाने-पीने और मौज-मस्ती करने के चक्कर में जेब हमेशा खाली रखता है। किस काम को कब करना है इसका अन्दाज नही होने के कारण इससे ग्रस्त व्यक्ति अक्सर आवारागीरी चक्कर में पड़ जाता है।


वैसे आठवें भाव में उच्च का शनि अत्तीन्द्रीय ज्ञान की क्षमता भी देता हैं आैर गुप्त ज्ञान का कारक भी बनता है। नौवें भाव का शनि नवां भाव भाग्य का माना गया है, इस भाव में शनि होने पर कठिन और दुखदायी यात्रायें करने की संभावना होती है। इससे जुड़ा व्यक्ति सेल्स या दूसरे ट्रैवलिंग वाले कामों से जुड़ा होता है। हालांकि अगर यह भाव सकारात्मक हो तो व्यक्ति मजाकिया आैर हंसने हंसाने वाला हो सकता है परंतु विपरीत होने पर वो गंभीर आैर एकांतप्रिय हो जाता है। नवें शनि वालों को जानवर पालना बहुत अच्छा लगता है आैर वो प्रकाशन के काम से भी जुड़े हो सकते हैं। दसवें भाव का शनि शनि का दसवां भाव व्यक्ति के मन को कठिन कामो की तरफ़ ले जाता है, इसीलिए मेहनत वाले, जैसे लकडी, पत्थर, लोहे आदि के काम सब दसवें शनि के क्षेत्र मे आते हैं। एेसे व्यक्ति की नजर बहुत ही तेज होती है वह किसी भी रखी चीज को नही भूलता है, मेहनत की कमाकर खाना जानता है, पर अपने रहने के मकान का केवल ढांचा ही बना पाता है, कभी भी बढ़िया आलीशान मकान नहीं तैयार पाता है। ग्यारहवें भाव का शनि शनि दवाइयों का कारक भी है, और इस घर मे वह व्यक्ति को साइंटिस्ट भी बना सकता है। जरा भी प्रखर बुद्घि वाला बुध का साथ पा जाए तो गणित के फ़ार्मूले और नई खोज भी कर सकता है। इस भाव से ग्रस्त अक्सर परिवार आैर रिश्तों के प्रति उदासीन होता है। बारहवें भाव का शनि बारहवां भाव धर्म का घर होता है, परंतु ये व्यक्ति को जन्म के बाद अपने जन्म स्थान से दूर कर देता है। यह दूरी शनि के अंशों पर निर्भर करती है। एेसे व्यक्ति का रुझान हमेशा धन के प्रति होता है। कर्जा, दुश्मनी आैर बीमारियों से उसे नफ़रत होती है।

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