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सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण पर बोली सपाक्स, कहा- यह चुनावी लॉलीपॉप

अब तक आरक्षण के नाम से बचती आ रही कांग्रेस ने भी इस मसले पर अपने विचार रखे हैं। कांग्रेस के नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कहना है कि पार्टी हमेशा से सवर्ण वर्ग के गरीबों को सुविधाएं देने के पक्ष में है, लेकिन सिंह ने भाजपा की मंशा पर सवाल उठाते हुए संविधान में संशोधन किए बगैर इसे महज जुमला बताया।  आगे पढ़ें

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‘माई का लाल’ के बाद के मोदी

शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद के दम्भ में जिस समय पदोन्नति में आरक्षण को लेकर मदमस्त आचरण दिखाया था, तब उनके साथ-साथ मोदी ने भी कल्पना नहीं की होगी कि इसका क्या परिणाम होगा। सपाक्स भले ही राजनीतिक गलियारों में दमदार उपस्थिति दर्ज न करवा सका हो, किंतु सामाजिक स्तर पर उसने वह हलचल मचा दी, जिसके चलते कहीं नोटा का असर दिखा तो कहीं सवर्ण बाहुल्य वाली सीटों पर भाजपा के मत प्रतिशत कमी दर्ज की गयी। जाहिर कि एट्रोसिटी एक्ट को लेकर फैली विपरीत गरम हवा के थपेड़ों ने भी मोदी की नींद उड़ा दी है। उनकी स्वाभाविक चिंता आने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर है। मोदी की काबीना मंत्री स्मृति ईरानी भी दो दिन पहले एक सार्वजनिक कार्यक्रम में 2019 सभी के लिए मुश्किल होने वाला है कह चुकी हैं। सीधी सी बात है कि उनका भी इशारा आम चुनाव की ओर था और मोदी की सवर्णों के प्रति यह चिंता भी खालिस सियासी स्वरूप की है। read more  आगे पढ़ें

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बीमारी का इलाज कीजिए, बीमार का नहीं

सवाल यह कि इस समूह का नेतृत्व किसके नाम किया जाए। सपाक्स वाले हीरालाल त्रिवेदी या करणी सेना के लोकेंद्र सिंह कालवी या फिर अन्य सत्तर संगठनों के लोग? नेतृत्व का सवाल गैर-वाजिब नहीं है। क्योंकि मामला केवल विरोध करने या हक मांगने का नहीं रह गया है। मामला सियासी हो चुका है। राज्य की 230 विधानसभा सीटों पर आरक्षण के विरोधी सपाक्स के लोगों ने राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। इसलिए यह पड़ताल जरूरी है कि 230 उम्मीदवारों का नेता कौन होगा। त्रिवेदी की नीयत और कालवी की ताकत पर कोई शक-शुबहे की गुंजाइश नहीं है। सितंबर की सितमगर धूप से अविचलित होकर नारेबाजी करते अन्य सत्तर संगठनों ने भी जता दिया है कि वह आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके हैं। तो फिर, नेतृत्व की बात तो तय करना ही होगी। read more  आगे पढ़ें

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इस बंद की बहुत बड़ी खुली चुनौती

यानी इस आंदोलन ने दिखा दिया कि यदि मुद्दा वाजिब हो तो बंद को सफल बनाने के लिए किसी जबरदस्ती, मारपीट, भीड़ या झूठे बयानों की जरूरत नहीं होती। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य में भारी वृद्धि के खिलाफ आंदोलन करने जा रहे हैं। यानी मुद्दा तो वाजिब है। फिर भी बंद को छह सितंबर जैसा कितना समर्थन मिल पाएगा, यह देखने वाली बात ही होगी। इसकी वजह है। सपाक्स एवं अन्य संगठन एक ऐसे मसले पर सामने आए, जिसके लिए उनकी नीयत पर किसी को संदेह नहीं था।read more  आगे पढ़ें

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