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दिलचस्प हुआ दिल्ली लोकसभा चुनाव, सितारों के मैदान में उतरने से बढ़ी रौनक

कांग्रेस के सभी सात उम्मीदवारों- पूर्वी दिल्ली से अरविंदर सिंह लवली, चांदनी चौक से जयप्रकाश अग्रवाल, नई दिल्ली से अजय माकन, उत्तर पश्चिम दिल्ली से राजेश लिलोठिया, पश्चिमी दिल्ली से महाबल मिश्रा, उत्तर पूर्वी दिल्ली से शीला दीक्षित और दक्षिणी दिल्ली से ओलिंपिक कांस्य विजेता विजेंदर सिंह ने अपने नामांकन दाखिल किए हैं।  आगे पढ़ें

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दिल्ली में गठबंधन को लेकर अनिर्णय की स्थिति, सात सीटों पर कांग्रेस लड़ेगी अकेले चुनाव

पार्टी के एक नेता के मुताबिक, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन को नई दिल्ली सीट, शीला दीक्षित को चांदनी चौक, पहलवान सुशील कुमार को पश्चिमी दिल्ली, रमेश कुमार को दक्षिण दिल्ली, जे.पी.अग्रवाल को उत्तर पूर्व दिल्ली और राजकुमार चौहान को उत्तर पश्चिम दिल्ली का उम्मीदवार तय किया गया है। बता दें कि दिल्ली में नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। नामांकन की आखिरी तारीख जहां 23 अप्रैल को है वहीं अब तक राजनीतिक पार्टियों की तरफ से उम्मीदवारों की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। राष्ट्रीय राजधानी की सभी सात सीटों पर छठे चरण के तहत 12 मई को मतदान होने हैं।  आगे पढ़ें

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शीला दीक्षित हो सकती है दिल्ली ईस्ट से कांग्रेस उम्मीदवार, मनाने में जुटे राहुल गांधी

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि पार्टी अब गठबंधन के बिना चुनाव की लड़ाई के मूड में दिख रही है। इसलिए पार्टी पूरी मजबूती के साथ मैदान में उतरने का फैसला किया है और विपक्ष को कड़ी टक्कर देने के लिए पार्टी अपने सबसे सीनियर और अनुभवी नेता को मैदान में उतारने का फैसला किया है। सूत्रों की मानें तो नई दिल्ली, चांदनी चौक, नॉर्थ-ईस्ट और नॉर्थ-वेस्ट की उम्मीदवारी तय होने के बाद जब साउथ दिल्ली का मसला आया तो इस सीट को टाल दिया गया। क्योंकि यहां से पूर्व सांसद रमेश कुमार का नाम आ रहा था और पार्टी अभी किसी भी प्रकार का रिस्क लेने के मूड में नहीं है। बैठक के दौरान कुछ नेताओं ने कहा कि इसका असर पंजाब तक पड़ सकता है, इसलिए इस सीट पर उम्मीदवारी को पेंडिंग में डाला दिया गया।  आगे पढ़ें

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दिल्ली में गठबंधन को सस्पेंस खत्म, राहुल गांधी आप से नहीं करेंगे गठजोड़

कांग्रेस द्वारा कोई आधिकारिक बयान जारी होने से पहले ही केजरीवाल ने पीटीआई से कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में लोकसभा चुनावों के लिए आप से गठबंधन करने से इनकार कर दिया है। दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने हमारे सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स के बताया कि कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं होने जा रहा है। उन्होंने कहा, 'हमने राहुल गांधी के साथ बैठक की थी लेकिन उन्होंने गठबंधन से इनकार कर दिया था।'  आगे पढ़ें

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भाजपा को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए दिल्ली में आप से गठबंधन जरूरी: चाको

गठबंधन के लिए नए सिरे से सर्वे होने से शीला दीक्षित के नाराज होने की बात कही जा रही है। उन्हें मनाने की कोशिश की जा रही है। चाको ने कहा, 'दिल्ली कांग्रेस के पास गठबंधन को लेकर कोई अनुभव नहीं है, हम शीला दीक्षित को पार्टी के हित में मना लेंगे।' सूत्रों का कहना है कि यह चुनाव पार्टी के लिए काफी अहम है। कांग्रेस को हर हाल में बीजेपी को सत्ता में दोबारा आने से रोकना है। ऐसे में पार्टी की सोच यह है कि बीजेपी को सातों सीट गिफ्ट में न मिलें। इसके लिए गठबंधन जरूरी है।  आगे पढ़ें

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बैकफुट पर शीला दीक्षित, आप से गठबंधन के लिए राजी हुई कांग्रेस, जल्द होगी घोषणा

दिल्ली की बात करें तो 2017 के नगर निगम चुनाव में कांग्रेस को 22 और आप को 28 फीसद मत मिले थे, जबकि भाजपा का मत फीसद 35 फीसद रहा था। ऐसे में अगर आप और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो दोनों का मत फीसद 50 हो जाएगा। पार्टी के हित में भी यही है कि दिल्ली में त्रिकोणीय मुकाबले से बचा जाए। चाको ने भाजपा की तरफ इशारा करते हुए कहा कि बड़े दुश्मन को हराने के लिए भी यह गठबंधन जरूरी है। उन्होंने कहा कि दिल्ली की सात सीटों का बंटवारा भी मुश्किल नहीं है। आप सीटों के आधे-आधे बंटवारे पर तैयार है।  आगे पढ़ें

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किसलिए नाराज हैं वयोवृद्ध कांग्रेसी?

यकीनन यहां सवाल यह भी उठता है कि ऐसा होने के बावजूद मध्यप्रदेश में सिंधिया की जगह कमलनाथ और राजस्थान में पायलट की जगह अशोक गहलोत को क्यों मुख्यमंत्री बनाया गया? अजय माकन के स्थान पर दिल्ली इकाई की कमान शीला दीक्षित को क्यों सौंपी गयी? इसकी वजह भी साफ है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस ऐसे समय जीती, जबकि लोकसभा चुनाव सिर पर आ चुके थे। कई राज्यों में तेजी से जनाधार खो चुकी कांग्रेस यह जोखिम नहीं ले सकती थी कि बेहद तजुर्बेकार चेहरों को दरकिनार कर दिया जाए। गांधी को ऐसे मुख्यमंत्री चाहिए थे, जो अपने दीर्घ सियासी अनुभव की दम पर जीत का यह क्रम आम चुनाव तक बराकरार रख सकें। साफ है कि इस लिहाज से सिंधिया की तुलना में नाथ और पायलट के मुकाबले गहलोत समायानुकूल ज्यादा मुफीद पाये गये। जहां तक माकन का सवाल है, तो दिल्ली में बेहद कमजोर दशा में पहुंच चुकी पार्टी को उबारने के लिए उनकी जगह किसी समय की वाकई लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहीं दीक्षित को सामने लाना अवश्यंभावी हो चुका था।  आगे पढ़ें

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शीला दीक्षित बोलीं: आतंक के खिलाफ मनमोहन का रुख मोदी जैसा सख्त नहीं, भाजपा ने किया धन्यवाद

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित ने गुरुवार को ऐसा कुछ बोल दिया जो एक तरफ बीजेपी को भा गया, तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने उन्हें निशाने पर लिया। उनके इस कथित बयान से अब उनकी अपनी पार्टी के लिए यह मुसीबत खड़ी हो सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार शीला दीक्षित ने कहा है कि पूर्व पीएम मनमोहन सिंह आतंकवाद को लेकर उतने सख्त नहीं थे, जितने कि पीएम मोदी हैं। लेकिन इसके बाद शीला दीक्षित ने इस पर सफाई दी है। उन्होंने कहा है कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है।  आगे पढ़ें

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आप का ऐलान: दिल्ली और पंजाब की सभी सीटों पर उतारेंगे अपने उम्मीदवार!

पार्टी सूत्रों का कहना है कि गैर बीजेपी मित्र दलों की ओर से आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से कई बार इस मसले पर बात हुई है कि गैर बीजेपी मतों का विभाजन रोकने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए। पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू, एम.के. स्टालिन, फारूख अब्दुल्ला से इस मसले पर केजरीवाल की कई बार बात हुई लेकिन पार्टी को अब लग रहा है कि कांग्रेस के दो दिग्गजों के बयानों ने पार्टी की राह आसान कर दी है।  आगे पढ़ें

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प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद शीला दीक्षित के सामने सबसे बड़ी चुनौती कार्यकर्ताओं को एक्टिव करना

शीला और उनकी टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती सबको साथ लेकर चलने की तो है ही, इससे भी बड़ी चुनौती चुनावी साल में सुस्त पड़े नेताओं और वर्करों को ऐक्टिव करना है। दो से तीन महीने के अंदर चुनाव होने हैं और इस दरम्यान नई टीम तैयार कर उसे चुनावी रण में बीजेपी और आप के टक्कर के लिए भी तैयार भी करना है। दूसरी ओर दोनों पार्टियों की टीमें महीनों पहले मैदान में कूद चुकी है।  आगे पढ़ें

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