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15 सीटों पर प्रत्याशी घोषित होने के बाद 14 सीटों पर बढ़ा संशय, भाजपा से शिवराज को बना सकती है उम्मीदवार

संभावना है कि सोमवार तक अगली लिस्ट आ सकती है। ग्वालियर से विवेक शेजवलकर या नारायण कुशवाह के नाम पर नेता देर रात तक विचार कर रहे थे। वहीं छिंदवाड़ा में पार्टी ने मनमोहन शाह बट्टी के नाम को विचार में लिया है या फिर किसी बड़े को भेजा जा सकता है। सागर में पिछड़े वर्ग को देखते हुए लक्ष्मीनारायण यादव को रखने पर विचार कर रही है। संघ से यहां लक्ष्मीकांत शर्मा का नाम प्रस्तावित है। धार से मुकाम सिंह निगवाल, मालती पटेल या छतर सिंह के नाम पर विचार चल रहा है।  आगे पढ़ें

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वंशवाद की दीमक की चपेट में भाजपा

गनीमत यह है कि भाजपा में कम से कम ऐसा तो फिर भी नहीं होगा कि इन लोगों के मांगे गए टिकट पार्टी दे ही देगी। लेकिन ताज्जुब यह है कि संघ के ऐसे संस्कारी स्वयंसेवक सत्ता का सुख भोगने के बाद आखिर अपनी पार्टी और संघ के संस्कारों को कैसे भूला बैठे? ऐसे कई नाम हैं, जो बता रहे हैं कि किसी समय वंशवाद के लिए कांगे्रस को सोते-जागते कोसने वाली इस पार्टी ने कैसे इसी मामले में परम्पराएं ताक पर रखने के क्रम को बढ़ाना जारी रखा है। भाजपा में नेताओं के परिवार में कई लोग आगे आए हैं लेकिन यह तब ही संभव हुआ है जब उन्होंने लंबा राजनीतिक सफर पार्टी के भीतर तय किया है। दीपक जोशी, विश्वास सारंग, राजेन्द्र पांडे इसके उदाहरण कहे जा सकते हैं तो सुरेन्द्र पटवा को अपवाद की श्रेणी में रखा जा सकता है। हालांकि बाद में भाजपा के निर्णयों में कई बार यह साफ परिलक्षित हुआ है कि इस पार्टी ने वंशवाद को एक तरह से स्वीकार कर लिया है। किसी विधायक या सांसद की मृत्यु हुई तो टिकट परिवार में ही किसी को देने की परम्परा अब भाजपा में आम हो गई है। ऐेसे ढेर सारे उदाहरण भाजपा में है। इस ने परिवार में टिकट मांगने वाले नेताओं को प्रोत्साहित तो किया ही है। read more  आगे पढ़ें

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भाजपा में भोपाल सीट को लेकर मचा घमासान, नहीं चाहिए बाहरी प्रत्याशी

बाहरी नेता को भोपाल से टिकट दिए जाने के खिलाफ राजधानी के नेता लामबंद हो गए हैं। सारे नेताओं ने एक साथ मिलकर तय किया कि बाहरी प्रत्याशी पार्टी ने थोपा तो वे विरोध करेंगे। इस अवसर पर गौर ने कहा कि टिकट पर पहला हक सांसद आलोक संजर का है। इसके बाद फिर महापौर आलोक शर्मा का हक बनता है। उन्होंने कहा कि पार्टी टिकट देगी तो मैं भी चुनाव लड़ने के लिए तैयार हूं। उधर, पूर्व सीएम गौर की चौरसिया समाज के प्रतिनिधिमंडल के साथ मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात भी हुई। इसे गौर ने गैर राजनीतिक बताया। इस दौरान नाथ और गौर की एकांत में दस मिनट चर्चा भी हुई। गौर ने कहा कि दमोह में देवेंद्र चौरसिया के आरोपियों की गिरफ्तारी न होने से समाज नाराज है।  आगे पढ़ें

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विदिशा से साधना सिंह को चुनाव लड़ाने के लिए समर्थकों ने शुरू लॉबिंग, सुषमा-राजनाथ से मिले

भाजपा केंद्रीय नेतृत्व के सूत्र बताते हैं कि सुषमा स्वराज के चुनाव लड़ने से इनकार करने के बाद विदिशा जैसी आसान सीट पर किसी वरिष्ठ नेता को मैदान में उतारा जाएगा। यह बाहरी भी हो सकता है। इसका कारण यह है कि मध्यप्रदेश की विदिशा सीट से ज्यादा आसान सीट भाजपा के पास दूसरी नहीं है। यह सीट भाजपा का गढ़ है। साधना की दावेदारी जताने का मामला पहली बार नहीं हुआ है। इसके पहले भी 2006 के उपचुनाव, 2009 और 2014 में भी शिव समर्थक साधना सिंह को टिकट दिलाने के लिए जोर लगाते रहे हैं।  आगे पढ़ें

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नाथ कर्ज उतारेंगे या मर्ज हटाएंगे ?

जो दिखाया जा रहा है वह यह है कि नाथ ने सिंह के लिए किसी कठिन मुकाबले की रूपरेखा खींच रखी है और यह भी कि दिग्विजय वही करेंगे, जो उनसे कहा जाएगा। हालांकि प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस की वापसी के बाद सिंह का यह कथन आसानी से गले नहीं उतरता है। वर्तमान मुख्यमंत्री की सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री, मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मेरी मर्जी, वाली भूमिका में ही दिखते हैं। इसलिए हाजमोला की भारी-भरकम खुराक के बावजूद सिंह की यह बात हजम नहीं हो पा रही कि वह किसी भी सीट से मुकाबले के लिए तैयार हैं। ऐसे में यही नजर आता है कि सिंह को सियासी वानप्रस्थ से पहले निरापद स्थान के तौर पर राजगढ़ से ही चुनावी मैदान में उतार दिया जाए। इस निर्णय की कांग्रेस के भीतर आलोचना होना तय है और तब नाथ के पास यह सुभीता होगा कि वह कह सकें कि दिग्विजय को पहले कठिन सीट की पेशकश की गयी थी, जिसके लिए उन्होंने कभी भी मना नहीं किया था। और राजगढ़ भी कठिन ही सीट है। कांग्रेस की सरकार और दिग्विजय सिंह का माइनस कर देंगे तो यह वो सीट है जिसने प्रदेश के बाहर से आए हुए जनसंघियों को भी गले लगाया था।read more  आगे पढ़ें

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मध्यप्रदेश: बदले सियासी हालात, भाजपा के आसान नहीं होगा पिछला परिणाम दोहराना

प्रदेश में इस बार चार चरणों में वोट डलेंगे। चुनाव आयोग ने पूरे देश में सुरक्षा बलों की उपलब्धता के लिहाज से यह कार्यक्रम बनाया है। इतना लंबा चुनाव कार्यक्रम पहले शायद ही कभी आया हो। जितना लंबा चुनाव अभियान होगा, संघर्ष भी उतना ही कड़ा होगा। सियासी समीकरणों पर निगाह डालें तो मध्यप्रदेश में कुल 29 लोकसभा सीटे हैं। इनमें से 19 सामान्य, छह आदिवासी और चार अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। पिछले चुनाव में 29 में से 27 सीटें भाजपा ने जीती थीं। प्रदेश के इतिहास में पहली बार भाजपा को लोकसभा चुनाव में इतनी बड़ी सफलता मिली थी।  आगे पढ़ें

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धिक्कार आंदोलन: शिवराज सिंह बोले-कमलनाथ सुन लें, मैं यह खेल अब नहीं चलने दूंगा

भाजपा ने प्रदर्शनकारियों पर दबाव बनाकर आंदोलन उग्र कर दिया, तब पुलिस ने मजबूरन कार्यकर्ताओं को ओपेन जेल घोषित कर गिरफ्तार किया। हंगामे के बाद प्रशासन ने सभी प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करने का एलान किया। लेकिन बाद में पुलिस ने कार्यकर्ताओं को छोड़ दिया। हालांकि पुलिस शुरुआत से ही शांति व्यवस्था बनाई हुई है ताकि किसी प्रकार से विवाद की स्थिति बनें।  आगे पढ़ें

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गहरा रहे हैं मध्यप्रदेश भाजपा में अंदरूनी झगड़े

खंडवा में लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर हुए कार्यक्रम में प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह के सामने ही सांसद नंदकुमार सिंह चौहान और पूर्व मंत्री अर्चना चिटनिस के समर्थक आपस में भिड़ गए। लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर हो रही बैठक में जैसे ही नंदकुमार सिंह चौहान भाषण देने के लिए खड़े हुए वैसे ही कुछ कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी शुरू कर दी। ये देख सांसद भड़क गए और उन्होंने नारे लगाने वालों को गद्दार बता डाला। इससे कार्यकर्ता भड़क उठे और बात हाथापाई तक पहुंच गई। हंगामा बढ़ता देख खुद प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को बीच बचाव करना पड़ा।read more  आगे पढ़ें

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पूर्व सीएम ने राहुल और कमलनाथ की ली चुटकी, कहा-2 जी, 3जी घोटाले के बाद जीजाजी घोटाला

शिवराज सिंह चौहान ने इशारों-इशारों में मुख्यमंत्री कमलनाथ को फूफा कहकर संबोधित किया। उन्होंने कहा कि फूफा क्या जाने ओला-पाला क्योंकि अब तो प्रदेश में गुंडे और बदमाशों का राज्य आ गया है। पूर्व सीएम ने कहा कि जबतक उनकी सांस चलेगी वे मध्यप्रदेश की जनता को न्याय दिलाने के लिये लड़ते रहेंगे। सम्मेलन में उन्होंने बीजेपी कार्यकतार्ओं को लोकसभा में भारी बहुमत से जिताने का संकल्प दिलाया और बूथ स्तर तक तैयारियां करने को कहा। शिवराज सिंह ने कार्यकर्ताओं को लोकसभा क्षेत्र की 8 विधानसभाओं में 50-50 सभाएं करने की सलाह भी दी।  आगे पढ़ें

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कोई फर्क नहीं नाथ और शिवराज में

इस हास्य कथा वाले आम और नीम के पेड़ जितना ही महीन अंतर राज्य की पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान और वर्तमान कमलनाथ सरकार के बीच नजर आने लगा है। नाथ के शासनकाल की शुरूआत मितव्ययता के जिन दावों के साथ हुई, वह बहुत जल्दी कोरे साबित हो चुके हैं। विज्ञापन वाली सरकार के विरोध से सत्ता में आए कमलनाथ ने भी प्रचार का वही तरीका अख्तियार कर लिया है जिसमें शिवराज अपने तीसरे और आखिरी साबित हुए कार्यकाल में रम गए थे। सब-कुछ वैसा ही होने लगा है। वही सरकारी पैसे की बबार्दी, वाहवाही लूटने के लिए खजाने के रीतते जाने का क्रम। माले मुफ्त, दिले-बेरहम की तरह जनता से मिली टैक्स की रकम के साथ अनाचार। शिवराज ने लगातार चौथी बार सत्ता में आने के लिए यह सब किया और नाथ मुख्यमंत्री पद मिलने के तौर पर पूरे हुए अपने सबसे बड़े अरमान का सुख दीर्घावधि तक भोगने की प्रत्याशा में शायद ऐसा कर रहे हैं। साफ हो गया है कि इस मामले में शिवराज और नाथ के बीच आम और नीम के पेड़ जैसा ही बेमायना फर्क बचा है। read more  आगे पढ़ें

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