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कमलनाथ सरकार झूकी डिस्टलर के सामने, बिकेगी अब ड्राट बीयर

मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार आखिरकार एक बड़ी डिस्टलरी के सामने सरेन्डर हो गई है। मंगलवार रात को होने वाली केबिनेट में नई आबकारी नीति में खुली बीयर (ड्राट बीयर) को बैचने सरकार सहमती देने जा रही है। केबिनेट के एजेंडे में नई आबकारी नीति में ड्राट बीयर को अनुमति देने के बारे में प्रस्ताव सोमवार रात को ही शामिल किया गया है। सूत्रों का कहना है कि सरकार का यह फैसला लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए धन की व्यवस्था जुटाने के प्रयासों से जुड़ा है। लिहाजा, अब एक अप्र्रैल से शराब दुकानों पर ड्राट बीयर की बिक्री शुरू हो जाएगी। पिछली 26 फरवरी को होने वाली केबीनेट में इस पर फैसला होना था लेकिन आबकारी मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर इस पर सैद्धांतिक रूप से सहमत नहीं थे। लिहाजा, इस मसले को मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद आज मंगलवार को हो रही बैठक के एजेंडे में शामिल कर लिया गया। read more  आगे पढ़ें

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तो अब कमलनाथ सरकार बिकवाएगी ड्राट बीयर

मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार एक बार फिर विदेशी शराब दुकानों से खुली बीयर बैचने की तैयारी कर रही है। 26 फरवरी को केबीनेट में प्रदेश की नई कांग्रेस सरकार की आबकारी नीति में संभवत: यह फैसला हो जाएगा। सरकार के इस फैसले का इकलौता फायदा राजसेन जिले की एक डिस्टलरी को होगा। और इस फैसले का सबसे ज्यादा नुकसान किशोर वय के युवाओं को होगा जिन्हें सस्ते में और आसानी में बीयर कहीं भी उपलब्ध हो जाएगी। प्रदेश में पहली बार ड्राट बीयर बैचने का फैसला शिवराज सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में किया था करीब चार साल बाद शराब दुकानों से 2013 में इसकी बिक्री पर रोक भी लगा दी थी। हालांकि ड्राट बीयर , बार में उपलब्ध है।read more  आगे पढ़ें

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शिवराज सिंह के मंत्रियों का आयकर चुकाएगी कमलनाथ सरकार

सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि मंत्री वेतन तथा भत्ता अधिनियम 1972 में मुख्यमंत्री, मंत्री और राज्यमंत्री को मिलने वाले वेतन, भत्ते तथा परिलब्धियों की राशि पर आयकर शासन देता है। 2018-19 में मंत्रियों को मिले वेतन तथा भत्ते पर जो कटौती की गई, उसकी प्रतिपूर्ति करने के आदेश दिए गए हैं।  आगे पढ़ें

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कैग की रिपोर्ट के बाद बोले कमलनाथ, कहा- अनियमितताओं की होगी जांच, दोषियों को नहीं बख्शेंगे

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बयान जारी करते हुए कहा है कि विधानसभा के पटल पर रखी गयी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में जिस तरह से पिछली सरकार के कार्यकाल करोड़ों रुपये के नुकसान की बात सामने आयी है। उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि किस तरह का एक गठजोड़ पिछली सरकार में कार्य कर रहा था और भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहा था। सरकार इस पूरे मामले की विस्तृत जांच कराएगी और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।  आगे पढ़ें

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‘मन की बात’ वाला बुधवार

पंद्रह साल के भाजपाई शासन, बीते कई दिनों से चल रही चुनावी चिल्लपो और कांगे्रस के भगवान श्रीराम से भी लम्बे सियासी वनवास का वह साक्षी रहा। यदि शिवराज सरकार का डेढ़ दशक उसे रास आया होगा, तो मतदाता ने उसे एक बार फिर सत्ता में लाने की मंशा से मतदान किया होगा। ऐसे वोटर भी हो सकते हैं, जो सरकार से नाखुश हों या कांग्रेस से आशा कर रहे हों, जाहिर है कि ईवीएम पर उनकी अंगुली ने हाथ का पंजा वाला बटन ही दबाया होगा। read more  आगे पढ़ें

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विवशता अच्छे की बजाय कम बुरा चुनने की

निश्चित ही हर मतदाता इतना चिंतन नहीं करता। इसलिए हमारी कल्पना केवल वोटर के उस वर्ग के लिए है, जो यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके मताधिकार का प्रयोग सुपात्र के लिए ही हो। हालांकि सुपात्र का यह पैमाना विचित्र है। विडंबना से भरा हुआ है। क्योंकि सुपात्र के नाम पर वह केवल यह तय कर सकता है कि भाजपा तथा कांगे्रस के बीच कम बुरा दल कौन सा है। अच्छाई की बात सोचना समय खराब करने की प्रक्रिया से अधिक और कुछ नहीं है। सत्तागत खामियों में भाजपा ने पहले कांग्रेस की बराबरी की और इस मामले में वह अब उससे और आगे निकलने की कोशिश कर रही है। read more  आगे पढ़ें

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करिश्मा नहीं, करामात वाली है यह सूची

इससे पहले तक खूब शोर था। पार्टी को दो सौ से पार जाना है। इसके लिए मौजूदा में से करीब आधे विधायकों के टिकट काट दिए जाएंगे। परिवारवाद नहीं चलेगा। दागी या विवादित छवि वालों के चयन से परहेज बरता जाएगा। लेकिन पहली सूची तो कुछ और ही कह रही है। मामला उस तत्व की एक बूंद भी न दिख पाने का है, जिसे लेकर हो-हल्ला मचाया जा रहा था। सूची सबसे पहले यही बता रही है कि ऐसा ही हाल रहा तो दो सौ से ज्यादा सीट तो दूर, बहुमत के लाले भी पड़ सकते हैं। यह तो कांग्रेस को तश्तरी में रखकर सत्ता परोसने जैसा मामला दिखता है। यह लिस्ट करिश्माई नहीं, बल्कि खालिस करामाती है। उदाहरण के तौर पर हर्ष सिंह और गौरीशंकर शेजवार हटे तो उनके बेटों को टिकट मिल गया। यानी वंशवाद का दंश अब यह पार्टी भी झेल रही है, दिग्गज नेताओं की सहमति से। इससे साफ है कि सिंह और शेजवार सहित राज्य में दिग्गज भाजपाइयों ने अपने-अपने इलाके में घर से बाहर का कोई और नेतृत्व पनपने ही नहीं दिया। पन्ना बाई का टिकट काटा तो उनके पति पंचूलाल को टिकट दे दिया। पहले पंचू लाल का काटा था तो पत्नी को दे दिया। कार्यकर्ताओं को गढ़ने वाली पार्टी का यह हाल है। नए कार्यकर्ता ही तैयार नहीं हो पा रहे हैं। read more  आगे पढ़ें

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शीशा हो या दिल हो...

संघ को भी कुछ नहीं। यह तथ्य स्वीकारने के बावजूद कि राष्ट्रीय ध्वज के प्रति उनके समर्पण का मार्ग वन-वे नहीं है। यह टू-वे रास्ता है, जिसमें तिरंगा और दूसरी तरफ भगवा ध्वज है। शिवराज के काफिले पर पत्थर पड़ा तो कांच टूट गया। संघ ने तो कांच से पत्थर तोड़ने वाला दांव खेला है। विरोधियों की मेजबानी का जोखिम उठाकर। डॉ. प्रणब मुखर्जी की शक्ल में किया गया यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा। कल उसका और विस्तार किया गया। भागवत ने अलग-अलग मसलों पर सफाई तो पेश की, लेकिन अंदाज कहीं से कहीं तक डिफेंसिव नहीं था। वह आक्रामक रहे। एक होटल में लिखी उस पंक्ति की तरह, जिसमें कहा गया था, हमारी सज्जनता यहां आने वाले ग्राहकों के व्यवहार पर ही निर्भर करती है। read more  आगे पढ़ें

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पत्थर, जूते और अजय सिंह

तो सवाल यह कि दिवंगत अर्जुन सिंह के चिरंजीव फिलवक्त मुसीबत में लाकर किसके लाभ का अधिक सबब बनाये जा सकते हैं। शिवराज? नहीं। उनका सीधा मुकाबला तो नाथ एवं सिंधिया से है। कमलनाथ या ज्योतिरादित्य? जवाब, हो सकता है, है। वजह यह कि कांग्रेस की जीत की सूरत में नाथ एवं सिंधिया के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर बराबरी का संघर्ष होना तय है। यदि बीच का रास्ता तलाशने की नौबत आई तो अजय सिंह उसी तरह लाभ की स्थिति में आ सकते हैं, जिस तरह सुभाष यादव बनाम माधवराव सिंधिया के घमासान में दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बना दिए गए थे। तो क्या यह मान लें कि कांग्रेस की ओर से प्रायोजित किसी मल्लयुद्ध में सिंह को भाजपा धोबीपछाड़ देने की कोशिश कर रही है?  आगे पढ़ें

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