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शिवराज सिंह के मंत्रियों का आयकर चुकाएगी कमलनाथ सरकार

सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि मंत्री वेतन तथा भत्ता अधिनियम 1972 में मुख्यमंत्री, मंत्री और राज्यमंत्री को मिलने वाले वेतन, भत्ते तथा परिलब्धियों की राशि पर आयकर शासन देता है। 2018-19 में मंत्रियों को मिले वेतन तथा भत्ते पर जो कटौती की गई, उसकी प्रतिपूर्ति करने के आदेश दिए गए हैं।  आगे पढ़ें

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कमलनाथ का मूल्यांकन

एक हजार करोड़ का कर्ज लेकर नाथ ने शिवराज सिंह चौहान की रवायत को कुछ अलग अंदाज में आगे बढ़ा दिया है। अलग अंदाज यूं कि शिवराज ने कर्ज के पैसे का इस्तेमाल वोट बटोरने वाले कामों के लिए किया। नाथ इस राशि का इस्तेमाल वोट मिल जाने का कर्ज चुकाने लोकसभा में वोट वापसी के इंतजाम के तौर पर कर रहे हैं। उन्हें किसानों का कर्ज माफ करना है। बसपा सुप्रीमो मायावती के इस कथन पर भी वह सकारात्मक रुख दिखा चुके हैं कि सूदखोरों से लिया गया कर्ज भी माफ किया जाए। read more  आगे पढ़ें

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राज शिवराज के भविष्य का

विपक्षी महागठबंधन का दांव सही पड़ा तो छप्पन इंच का सीना महज पांच साल में अतीत की बात हो जाएगा। ऐसा हुआ तो शिवराज को ताकत मिलेगी। किंतु ऐसा नहीं हुआ तो जाग के फिर सो जाता हूं, वाली पंक्ति तो जाफरी लिख ही गये हैं। हां, एक बात और बता दें। जाफरी ने इसी नज्म में एक जगह लिखा है, हर चीज भुला दी जाएगी, यादों के हसीं बुतखाने (मंदिर) से, हर चीज उठा दी जाएगी। फिर कोई नहीं ये पूछेगा, सरदार कहां है महफिल में ? यह शिवराज के लिए हमारी अपेक्षा नहीं है, लेकिन सियासत में विपरीत समय किसी भी दशा से साक्षात्कार करवा सकता है। फिर शिवराज को तो भाजपा में वीरेंद्र कुमार सखलेचा, उमा भारती सहित लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी तथा जसवंत सिंह आदि-आदि का उदाहरण याद होगा ही। नहीं? read more  आगे पढ़ें

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मामला प्रदेशाध्यक्ष पद का

एक सवाल उठता है। नाथ ने जब जरूरत नहीं कहा तो उनका आशय नये प्रदेशाध्यक्ष से था या केवल अजय सिंह से? क्योंकि क्षमताओं से लबरेज होने के बावजूद सिंह बीते कई घटनाक्रमों में कमतर साबित हो चुके हैं। चौधरी राकेश सिंह प्रकरण से लेकर चुरहट सहित विंध्य में कांग्रेस की चुनावी पराजय ने उनकी क्षमताओं पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यह सही है कि कई समर्थकों ने सिंह के लिए सीट खाली करने की बात कहकर उनके प्रति यकीन जताया है, लेकिन यह भी तो सही है कि जो शख्स अपने परम्परागत गढ़ चुरहट की जनता का ही विश्वास कायम नहीं रख पाया, उसे किस वजह से चुनावी साल में प्रदेशाध्यक्ष पद जैसी अहम जिम्मेदारी दे दी जाए? दोनो बार नेता प्रतिपक्ष रहते हुए सिंह ने तत्कालीन शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ दमदार तेवर दिखाए। वे अपनी हार के कारण तो जानते हैं लेकिन विंध्य में इस हार के पीछे की साजिश समझने का आग्रह वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से जरूर कर रहे हैं। लेकिन अब सरकार बन गई है तो कोई उनकी बात को शायद गंभीरता से नहीं ले रहा है। नेता प्रतिपक्ष रहते हुए भी वे पार्टी में अपनी लकीर लंबी नहीं कर पाएं, ऐसे में कांग्रेस उनकी दम पर संगठन को आगे बढ़ाने का जोखिम शायद ही लेना चाहेगी।read more  आगे पढ़ें

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आलाकमान को प्यारे हुए नेताजी

सीधी-सी बात है कि शिवराज सिंह चौहान को सियासी डेप्यूटेशन पर भेज दिया गया है। मध्यप्रदेश से दूर। अमित शाह ने यह निर्णय ठीक उस दिन लिया, जिस दिन शिवराज के नेतृत्व में 11 दिसंबर, 2018 से लेकर कल के बीच भाजपा ने राज्य में कांग्रेस के हाथों पराजय की शर्मनाक हेट्रिक बना ली थी। पूर्व मुख्यमंत्री तो एक विज्ञापन की पंक्ति की तरह पकड़े रहना, छोड़ना नहीं की शैली में प्रदेश भाजपा पर पकड़ बनाए रखने की जुगत में लगे रहे, उधर दिल्ली ने बे-दिल होते हुए उनके सारे अरमान और किये-कराये पर पानी फेर दिया।  आगे पढ़ें

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कैग की रिपोर्ट के बाद बोले कमलनाथ, कहा- अनियमितताओं की होगी जांच, दोषियों को नहीं बख्शेंगे

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बयान जारी करते हुए कहा है कि विधानसभा के पटल पर रखी गयी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में जिस तरह से पिछली सरकार के कार्यकाल करोड़ों रुपये के नुकसान की बात सामने आयी है। उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि किस तरह का एक गठजोड़ पिछली सरकार में कार्य कर रहा था और भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहा था। सरकार इस पूरे मामले की विस्तृत जांच कराएगी और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।  आगे पढ़ें

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पराजित तिकड़ी का सियासी तबादला: शाह ने शिवराज, रमन और राजे को बनाया राष्ट्रीय उपाध्यक्ष

दरअसल, ये तीनों अपने अपने राज्य में सबसे बड़े चेहरे हैं। गौरतलब है कि राज्यसभा में इनकी जगह दूसरे चेहरे को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था। खासतौर से वसुंधरा की इच्छा रही होगी कि उन्हें प्रदेश संगठन की कमान दी जाए। लेकिन उन्हें भी केंद्र में लाया गया है।  आगे पढ़ें

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सियासी बवासीर की ऐसी तकलीफ

मध्यप्रदेश की सरजमीं पर इस समय भाजपा के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ही दिखते हैं। खुद उन्हें पहला तमाचा तब पड़ा, जब अपेक्षाकृत मजबूत हुई कांग्रेस ने उनकी सरकार को पटखनी दे दी। दूसरा तमाचा विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में विजय शाह की पराजय के रूप में भाजपा के गाल पर पड़ा। पार्टी को तीसरा और सर्वाधिक ताजातरीन पड़ा झापड़ उपाध्यक्ष के तौर पर हिना कांवरे की जीत तथा भाजपाई जगदीश देवड़ा की हार के तौर पर अभी तक फिजा में गूंज रहा है। बिना किसी तफ्तीश के कहा जा सकता है कि शेष दो झापड़ का इंतजाम मुखिया यानी शिवराज ने ही किया था। अध्यक्ष पद के मतदान के समय उन्होंने ही विधानसभा से भाजपा के बहिष्कार की घोषणा की थी। इस पद पर हार के बावजूद उपाध्यक्ष का चुनाव कराने की सोच भी उनके दिमाग की ही उपज थी। तो क्या यह भी अकेले पिटता तो... वाली दलील से जुड़ा मामला ही है? read more  आगे पढ़ें

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कालीराम का फट गया ढोल

अब जब लड़ने का फैसला कर ही लिया था तो हारने से क्या डरना था। कांग्रेस ने शुरूआत बेईमानी से की लेकिन लगता है जैसे कुश्ती नूरा थी। क्योंकि कांग्रेस बाद में पांचवा प्रस्ताव भी मानने को तैयार थी, लेकिन भाजपा ने सदन से बाहर जाने का फैसला शायद पहले ही कर लिया था। यह तो परसों रात ही तय हो गया था कि कांग्रेस के पास 121 सदस्यों के समर्थन की पुख्ता व्यवस्था है। ऐसे में भाजपा को जगहंसाई कराने से बचना चाहिए था। उसने कल निर्णय लिया कि इस पद के लिए चुनाव कराएगी। फिर ऐनवक्त पर पार्टी ने बहिर्गमन किया तो क्या उसका भी डर नहीं था कि वोटिंग होने की सूरत में उसके ही कुछ सदस्य कांग्रेस के प्रत्याशी का समर्थन कर सकते हैं? इसलिए अपनी जांघ उघाड़कर दिखने की प्रक्रिया से बचने के लिए उसके सदस्यों को सदन से बाहर का रुख करना पड़ा? इससे बेहतर तो यही होता कि राज्य की परम्परा के अनुरूप अध्यक्ष पद पर सत्तारूढ़ दल का विधायक चुनने दिया जाता और उपाध्यक्ष पद सम्माजनक तरीके से भाजपा के खाते में आ जाता। पर डरी हुई कांग्रेस ने पहले से ही उपाध्यक्ष का पद खुद के पास रखने का फैसला किया हुआ था। उपाध्यक्ष कोई बहुत निर्णायक भूमिका में नहीं रहता है लेकिन जब रोज के ही टकराव सामने दिख रहे हैं तो सत्तापक्ष के पास इसके अलावा रास्ता भी बाकी नहीं था। इसलिए मध्यप्रदेश में सत्तापक्ष और विपक्ष फिलहाल दोनों एक दूसरे से डरे हुए नजर आ रहे हैं।read more  आगे पढ़ें

प्रोटेम-स्पीकर-के-चयन-में-वरिष्ठता-को-लेकर-शिवराज-

प्रोटेम स्पीकर के चयन में वरिष्ठता को लेकर शिवराज ने उठाया एतराज

सदन में सुबह जैसे ही वंदेमातरम् का गायन समाप्त हुआ, कार्यवाही शुरू होने के पहले ही पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खड़े होकर प्रोटेम स्पीकर चयन के मुद्दे पर अपनी आपत्ति दर्ज करा दी।  आगे पढ़ें

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