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कालीराम का फट गया ढोल

अब जब लड़ने का फैसला कर ही लिया था तो हारने से क्या डरना था। कांग्रेस ने शुरूआत बेईमानी से की लेकिन लगता है जैसे कुश्ती नूरा थी। क्योंकि कांग्रेस बाद में पांचवा प्रस्ताव भी मानने को तैयार थी, लेकिन भाजपा ने सदन से बाहर जाने का फैसला शायद पहले ही कर लिया था। यह तो परसों रात ही तय हो गया था कि कांग्रेस के पास 121 सदस्यों के समर्थन की पुख्ता व्यवस्था है। ऐसे में भाजपा को जगहंसाई कराने से बचना चाहिए था। उसने कल निर्णय लिया कि इस पद के लिए चुनाव कराएगी। फिर ऐनवक्त पर पार्टी ने बहिर्गमन किया तो क्या उसका भी डर नहीं था कि वोटिंग होने की सूरत में उसके ही कुछ सदस्य कांग्रेस के प्रत्याशी का समर्थन कर सकते हैं? इसलिए अपनी जांघ उघाड़कर दिखने की प्रक्रिया से बचने के लिए उसके सदस्यों को सदन से बाहर का रुख करना पड़ा? इससे बेहतर तो यही होता कि राज्य की परम्परा के अनुरूप अध्यक्ष पद पर सत्तारूढ़ दल का विधायक चुनने दिया जाता और उपाध्यक्ष पद सम्माजनक तरीके से भाजपा के खाते में आ जाता। पर डरी हुई कांग्रेस ने पहले से ही उपाध्यक्ष का पद खुद के पास रखने का फैसला किया हुआ था। उपाध्यक्ष कोई बहुत निर्णायक भूमिका में नहीं रहता है लेकिन जब रोज के ही टकराव सामने दिख रहे हैं तो सत्तापक्ष के पास इसके अलावा रास्ता भी बाकी नहीं था। इसलिए मध्यप्रदेश में सत्तापक्ष और विपक्ष फिलहाल दोनों एक दूसरे से डरे हुए नजर आ रहे हैं।read more  आगे पढ़ें

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