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धन्यवाद कमलनाथ जी

यह बात पूरी तरह सही थी कि विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए चुनाव वाली स्थिति कांग्रेस के असंतुष्ट तबके को तोड़ने की कोशिश के तहत ही की गयी थी। फिर संदेह नूरा कुश्ती के भी नजर आए। हालांकि इससे कमलनाथ या कांग्रेस की साख पर तो बट्टा नहीं लगा लेकिन पन्द्रह साल सत्ता में रहने का रिकार्ड दर्ज करने वाली भाजपा का नौसीखिया पन जाहिर हुआ। यह साफ है कि कमलनाथ सरकार के कार्यकाल तक प्रदेश में सत्ता तथा विपक्ष के बीच राजनीतिक शुचिता से सर्वथा परे कई प्रसंग देखने मिलेंगे। फिर भी संतोष इस बात का है कि कमलनाथ ने काजल की कोठरी में रहते हुए भी कलंक की इस कालिख से खुद को दूर रखने की एक छोटी सी कोशिश तो की ही है। भला क्या हैसियत हो सकती है मुकेश तिवारी या फिर उस जैसे किसी अन्य हेडमास्टर की? read more  आगे पढ़ें

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सियासी बवासीर की ऐसी तकलीफ

मध्यप्रदेश की सरजमीं पर इस समय भाजपा के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ही दिखते हैं। खुद उन्हें पहला तमाचा तब पड़ा, जब अपेक्षाकृत मजबूत हुई कांग्रेस ने उनकी सरकार को पटखनी दे दी। दूसरा तमाचा विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में विजय शाह की पराजय के रूप में भाजपा के गाल पर पड़ा। पार्टी को तीसरा और सर्वाधिक ताजातरीन पड़ा झापड़ उपाध्यक्ष के तौर पर हिना कांवरे की जीत तथा भाजपाई जगदीश देवड़ा की हार के तौर पर अभी तक फिजा में गूंज रहा है। बिना किसी तफ्तीश के कहा जा सकता है कि शेष दो झापड़ का इंतजाम मुखिया यानी शिवराज ने ही किया था। अध्यक्ष पद के मतदान के समय उन्होंने ही विधानसभा से भाजपा के बहिष्कार की घोषणा की थी। इस पद पर हार के बावजूद उपाध्यक्ष का चुनाव कराने की सोच भी उनके दिमाग की ही उपज थी। तो क्या यह भी अकेले पिटता तो... वाली दलील से जुड़ा मामला ही है? read more  आगे पढ़ें

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मप्र: विस उपाध्यक्ष के लिए राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी, कांग्रेस यह पद अपने पास रखने कर रही मंथन

विधानसभा उपाध्यक्ष के लिए बुधवार को दोपहर 12 बजे तक नामांकन दाखिल किए जा सकते हैं। चुनाव गुरुवार को होगा। सूत्रों के मुताबिक विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव की तरह उपाध्यक्ष पद को लेकर भी सदन में गुरुवार की कार्रवाई हंगामेदार होने के आसार हैं।  आगे पढ़ें

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कालीराम का फट गया ढोल

अब जब लड़ने का फैसला कर ही लिया था तो हारने से क्या डरना था। कांग्रेस ने शुरूआत बेईमानी से की लेकिन लगता है जैसे कुश्ती नूरा थी। क्योंकि कांग्रेस बाद में पांचवा प्रस्ताव भी मानने को तैयार थी, लेकिन भाजपा ने सदन से बाहर जाने का फैसला शायद पहले ही कर लिया था। यह तो परसों रात ही तय हो गया था कि कांग्रेस के पास 121 सदस्यों के समर्थन की पुख्ता व्यवस्था है। ऐसे में भाजपा को जगहंसाई कराने से बचना चाहिए था। उसने कल निर्णय लिया कि इस पद के लिए चुनाव कराएगी। फिर ऐनवक्त पर पार्टी ने बहिर्गमन किया तो क्या उसका भी डर नहीं था कि वोटिंग होने की सूरत में उसके ही कुछ सदस्य कांग्रेस के प्रत्याशी का समर्थन कर सकते हैं? इसलिए अपनी जांघ उघाड़कर दिखने की प्रक्रिया से बचने के लिए उसके सदस्यों को सदन से बाहर का रुख करना पड़ा? इससे बेहतर तो यही होता कि राज्य की परम्परा के अनुरूप अध्यक्ष पद पर सत्तारूढ़ दल का विधायक चुनने दिया जाता और उपाध्यक्ष पद सम्माजनक तरीके से भाजपा के खाते में आ जाता। पर डरी हुई कांग्रेस ने पहले से ही उपाध्यक्ष का पद खुद के पास रखने का फैसला किया हुआ था। उपाध्यक्ष कोई बहुत निर्णायक भूमिका में नहीं रहता है लेकिन जब रोज के ही टकराव सामने दिख रहे हैं तो सत्तापक्ष के पास इसके अलावा रास्ता भी बाकी नहीं था। इसलिए मध्यप्रदेश में सत्तापक्ष और विपक्ष फिलहाल दोनों एक दूसरे से डरे हुए नजर आ रहे हैं।read more  आगे पढ़ें

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प्रोटेम स्पीकर के चयन में वरिष्ठता को लेकर शिवराज ने उठाया एतराज

सदन में सुबह जैसे ही वंदेमातरम् का गायन समाप्त हुआ, कार्यवाही शुरू होने के पहले ही पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खड़े होकर प्रोटेम स्पीकर चयन के मुद्दे पर अपनी आपत्ति दर्ज करा दी।  आगे पढ़ें

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भाजपा विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए खड़ा कर सकती है उम्मीदवार, कांग्रेस को नहीं देगी वाक ओवर

भाजपा कांग्रेस से नाराज बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और निर्दलीय विधायकों का लाभ लेना चाहती है। हालांकि अभी भाजपा के नेतृत्व ने इसे लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी चाहता है कि भाजपा अध्यक्ष पद के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा करे, क्योंकि विधायकों की संख्या में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। भाजपा के कई वरिष्ठ विधायकों ने भी संघ को यह सुझाव दिया है।  आगे पढ़ें

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विस अध्यक्ष के कयासों पर लगा विराम, एनपी प्रजापति होंगे कांग्रेस उम्मीदवार

कमलनाथ मंत्रिमंडल के शपथ लेने के साथ ही विधानसभा अध्यक्ष को लेकर लगाए जा रहे कयासों को विराम लग गया है। इस पद के लिए महेश्वर विधानसभा सीट से चुनकर आईं डॉ. विजय लक्ष्मी साधौ, लहार से जीतकर आए डॉ. गोविंद सिंह, पृथ्वीपुर विधानसभा सीट से चुनकर आए बृजेंद्र सिंह राठौर और एनपी प्रजापति के नाम चर्चा में थे। इनमें से तीन कमलनाथ मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। उल्लेखनीय है कि चुनाव परिणाम आने के बाद से ही विधानसभा अध्यक्ष को लेकर कयास लगाए जा रहे थे।  आगे पढ़ें

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राजस्थान: आवास आंवटन मामले में बोले मेघवाल, कहा- यह मेरा अधिकार है, हमें कोई नहीं रोक सकता

दलों का कहना है कि मेघवाल तो 14वीं विधानसभा के अध्यक्ष थे,जो अब भंग हो चुकी है। अब 15वीं विधानसभा के चुनाव हो चुके है। वहीं मेघवाल का कहना है कि यह मेरा अधिकार है,इसे ना तो राज्यपाल रोक सकते है और ना ही मुख्यमंत्री एवं कोर्ट रोक सकता है। मेघवाल ने तर्क दिया कि जब तक नया अध्यक्ष नहीं बन जाता तब तक मै ही अध्यक्ष हूं। हालांकि पुराने विधायक एवं विधिवेत्ता मेघवाल की बात से इत्तेफाक नहीं रखते है ।  आगे पढ़ें

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मुख्यमंत्री का नाम तय होने से पहले ही भावी मंत्रिमंडल को लेकर सियासी सरगर्मी तेज, दिग्गजों के नामों पर मंथन शुरू

चुनावी नतीजे इतने चौंकाने वाले रहे कि नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह सहित कई दिग्गज नेता पहले ही दौड़ से बाहर हो गए। विधानसभा अध्यक्ष के लिए डॉ. गोविंद सिंह, लक्ष्मण सिंह, डॉ. विजय लक्ष्मी साधौ और एनपी प्रजापति के नामों की चर्चा चल पड़ी है। प्रदेश में डेढ़ दशक बाद सत्ता में लौट रही कांग्रेस सरकार में कुछ पुराने मंत्रियों को भी रखा जा रहा है।  आगे पढ़ें

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