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जबलपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बुजुर्ग दंपत्ति के घर से बेटे और बहू को करो बाहर

बुजुर्ग दंपती की ओर अधिवक्ता शिव कुमार कश्यप ने पक्ष रखा। उन्होंने अवगत कराया कि इंदिरा नगर सुहागी निवासी 80 वर्षीय ओमकार प्रसाद रैकवार और 75 वर्षीय रमा बाई को 25 मई 2014 को उनके बेटे संतोष रैकवार और बहू रजनी रैकवार ने घर से निकाल दिया। इसके बाद उनके मकान पर कब्जा कर लिया।  आगे पढ़ें

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कमलनाथ सरकार ने की पुलिस विभाग की बड़ी सर्जरी, 49 आईपीएस अधिकारियों का किया तबादला

11 एसपी लूप लाइन में भेज दिए गए हैं और लूप लाइन में पड़े 13 पुलिस अफसरों को एसपी बना दिया गया है। कालापीपल मंडी से कांग्रेस विधायक चुने गए कुणाल चौधरी के भाई हितैश चौधरी को सिंगरौली का एसपी बनाकर भेजा गया है। भोपाल साउथ के एसपी राहुल लोढ़ा को गुना भेज दिया गया है उनकी जगह संपत उपाध्याय लाए गए हैं। विनीत कपूर विदिशा एसपी पद से हटाकर पुलिस अकादमी भोपाल भेजे गए।  आगे पढ़ें

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मध्यप्रदेश: विधानसभा में नहीं हुई चर्चा और पारित हो गया 22 हजार करोड़ का अनुपूरक बजट

विधानसभा ने द्वितीय अनुपूरक बजट पर चर्चा के लिए दो घंटे समय तय किया था। उपाध्यक्ष के निर्वाचन को लेकर सदन में चले हंगामे के कारण इस पर चर्चा ही नहीं हो सकी। वित्तमंत्री तरुण भनोत ने द्वितीय अनुपूरक को लेकर प्रस्ताव रखा। जब इस पर बोलने के लिए कोई आगे ही नहीं आया तो द्वितीय अनुपूरक बजट को मंजूरी देते हुए विनियोग विधेयक पारित कर दिया गया।  आगे पढ़ें

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सियासी बवासीर की ऐसी तकलीफ

मध्यप्रदेश की सरजमीं पर इस समय भाजपा के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ही दिखते हैं। खुद उन्हें पहला तमाचा तब पड़ा, जब अपेक्षाकृत मजबूत हुई कांग्रेस ने उनकी सरकार को पटखनी दे दी। दूसरा तमाचा विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में विजय शाह की पराजय के रूप में भाजपा के गाल पर पड़ा। पार्टी को तीसरा और सर्वाधिक ताजातरीन पड़ा झापड़ उपाध्यक्ष के तौर पर हिना कांवरे की जीत तथा भाजपाई जगदीश देवड़ा की हार के तौर पर अभी तक फिजा में गूंज रहा है। बिना किसी तफ्तीश के कहा जा सकता है कि शेष दो झापड़ का इंतजाम मुखिया यानी शिवराज ने ही किया था। अध्यक्ष पद के मतदान के समय उन्होंने ही विधानसभा से भाजपा के बहिष्कार की घोषणा की थी। इस पद पर हार के बावजूद उपाध्यक्ष का चुनाव कराने की सोच भी उनके दिमाग की ही उपज थी। तो क्या यह भी अकेले पिटता तो... वाली दलील से जुड़ा मामला ही है? read more  आगे पढ़ें

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अब तुनकमिजाजी से परहेज करें भार्गव

पूरी तरह अतीत के कब्रिस्तान में दफन इस मामले का जिक्र यकीनन सोद्देश्य किया गया है। इसमें बुराई भी नहीं है। सबको याद आना चाहिए कि भार्गव वाकचातुर्य के फेर में ऐसा कुछ कह गए थे कि तत्कालीन सुंदरलाल पटवा सरकार की खाट खड़ी हो गयी थी। इस लिहाज से यह भी याद किया जा सकता है कि इस कांड के कई साल बाद भार्गव ने एक महिला विधायक के लिए ‘मियां-बीवी राजी...’ जैसी बात कहकर एक और हंगामे का सूत्रपात कर दिया था।  आगे पढ़ें

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कालीराम का फट गया ढोल

अब जब लड़ने का फैसला कर ही लिया था तो हारने से क्या डरना था। कांग्रेस ने शुरूआत बेईमानी से की लेकिन लगता है जैसे कुश्ती नूरा थी। क्योंकि कांग्रेस बाद में पांचवा प्रस्ताव भी मानने को तैयार थी, लेकिन भाजपा ने सदन से बाहर जाने का फैसला शायद पहले ही कर लिया था। यह तो परसों रात ही तय हो गया था कि कांग्रेस के पास 121 सदस्यों के समर्थन की पुख्ता व्यवस्था है। ऐसे में भाजपा को जगहंसाई कराने से बचना चाहिए था। उसने कल निर्णय लिया कि इस पद के लिए चुनाव कराएगी। फिर ऐनवक्त पर पार्टी ने बहिर्गमन किया तो क्या उसका भी डर नहीं था कि वोटिंग होने की सूरत में उसके ही कुछ सदस्य कांग्रेस के प्रत्याशी का समर्थन कर सकते हैं? इसलिए अपनी जांघ उघाड़कर दिखने की प्रक्रिया से बचने के लिए उसके सदस्यों को सदन से बाहर का रुख करना पड़ा? इससे बेहतर तो यही होता कि राज्य की परम्परा के अनुरूप अध्यक्ष पद पर सत्तारूढ़ दल का विधायक चुनने दिया जाता और उपाध्यक्ष पद सम्माजनक तरीके से भाजपा के खाते में आ जाता। पर डरी हुई कांग्रेस ने पहले से ही उपाध्यक्ष का पद खुद के पास रखने का फैसला किया हुआ था। उपाध्यक्ष कोई बहुत निर्णायक भूमिका में नहीं रहता है लेकिन जब रोज के ही टकराव सामने दिख रहे हैं तो सत्तापक्ष के पास इसके अलावा रास्ता भी बाकी नहीं था। इसलिए मध्यप्रदेश में सत्तापक्ष और विपक्ष फिलहाल दोनों एक दूसरे से डरे हुए नजर आ रहे हैं।read more  आगे पढ़ें

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यह बीमार का इलाज है, बीमारी का नहीं

ऐसा हर उस मामले में होता है, जहां केवल बीमार का उपचार किया जाता है, बीमारी का नहीं। बात का ताजातरीन संदर्भ मध्यप्रदेश है। लेकिन ऐसे सियासी डॉक्टर सारे देश में हैं, जो बीमारी की बजाय केवल बीमार का उपचार कर रहे हैं। जानबूझकर। किसी षड़यंत्र के तहत। अपना उल्लू सीधा करने के लिए। आप बेशक कमलनाथ की तारीफ कर सकते हैं कि उन्होंने किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा कुछ हद तक पूरी की है। लेकिन इसे किसी उल्लेखनीय काम की संज्ञा नहीं दी जा सकती। क्योंकि इससे कर्ज का मर्ज तो कायम ही रहेगा। उलटे यह मर्ज और बढ़ जाएगा।  आगे पढ़ें

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प्रदेशभक्ति को पैदा कर देते शिवराज

नाथ ने राष्ट्रगीत को लेकर फिलहाल शिवराज सिंह चौहान के प्रयासों की हवा निकाल दी है। भाजपा के हाथ से एक ताजा-तरीन मुद्दा छीन लिया है। लिहाजा शिवराज सहित समूची भाजपा के लिए यह चिंतन का समय है। उन्हें सोचना होगा कि आखिर क्यों कर यह आयोजन महज खानापूर्ति बनकर रह गया था। पत्रकार मनोज जोशी फेसबुक पर मायनाखेज पोस्ट डाल चुके हैं। वह लिखते हैं, लोग तो भूल ही गए थे। बंद करने पर याद आया #वंदेमातरम। यह पूरी तरह सच है। यदि भूलने वाली स्थिति नहीं होती तो क्या यह संभव था कि विगत वर्षों में इस आयोजन में शामिल होने वाले अफसर और कर्मचारियों की संख्या महज दस प्रतिशत या उससे भी कम रह गयी थी। read more  आगे पढ़ें

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प्रदेश सरकार ने पुलिस कर्मियों को दिया तोहफा, आज 450 जवान रहेंगे साप्ताहिक अवकाश पर

दो दिन पहले ही गृह विभाग ने साप्ताहिक अवकाश की रूपरेखा तैयार कर प्रशासन के पास भेजी थी और कल से सभी पुलिसकर्मियों को यह तोहफा मिलने जा रहा है। राजधानी में ही 450 पुलिसकर्मियों को अवकाश देने के लिए चिन्हित कर लिया गया है। वे सभी गुरुवार से अवकाश पर रहेंगे। इसके तहत आज राजधानी के विभिन्न थानों में कुल 450 पुलिसकर्मी अपने परिवार के साथ समय बिताएंगे। कांग्रेस ने अपने वचन पत्र में इसका वादा किया था जिसे कमलनाथ ने सरकार बनते ही पूरा कर दिया है।  आगे पढ़ें

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क्या यह "वन डे मात्र रोम" का वक्त है?

इसलिए यदि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ कहते हैं कि वंदे मातरम का परिवर्तित स्वरूप लागू किया जाएगा, तो यह बात गले के नीचे नहीं उतर पाती है। वंदे मातरम का क्या कोई विकल्प है? यह हमारा राष्ट्रगीत है। फिर भला इसे गाये जाने की परंपरा को बंद करने और उसके बाद बचकाना तर्क देने का क्या अभिप्राय हो सकता है। नाथ अब पलटवार कर रहे हैं। भाजपा के हमलों पर उनका सवाल है कि क्या यह गीत न गाने वाला देशभक्त नहीं कहा जाएगा? ऐसा नहीं है। कोई वंदेमातरम गाये बगैर भी देशभक्त हो सकता है। लेकिन इस गीत का परोक्ष या अपरोक्ष रूप से विरोध तो राज्य की नयी सरकार ने कर ही दिया है। मुमकिन है कि शिवराज सरकार के फैसलों को पलटने के उतावलेपन में ऐसा हो गया हो, लेकिन राष्ट्र के सम्मान से जुड़े मामले में इतना अहं नहीं अपनाया जाना चाहिए। बेहतर होता कि मुख्यमंत्री इस घटनाक्रम को गलती के रूप में स्वीकारते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।read more  आगे पढ़ें

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