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पश्चिम बंगाल में चरम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, भगवानों के भी बदल रहे नाम

चुनावों के दौरान कई जगहों पर बीजेपी नेताओं ने कुछ स्थानीय पुजारियों की मदद से बोनबीबी की बोनदेबी के नाम से पूजा की और उनके बारे में बयान दिए। जंगल की देवी कही जाने वाली बोनबीबी को बोनदेबी बताना पूरी तरह से उनकी अंतसार्मुदायिक छवि के विपरीत है। हिंदू ही नहीं बल्कि मुसलमानों की भी समान रूप से बोनबीबी में आस्था मानी जाती रही है।  आगे पढ़ें

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गोडसे पर दिए बयान पर बवाल मचने के बाद साध्वी ने मांगी माफी, भाजपा ने मांगा स्पष्टीकरण

अपने बयान पर सफाई देते हुए साध्वी प्रज्ञा ने कहा, 'मैं रोडशो में थी, भगवा आतंक को जोड़कर मुझसे प्रश्न किया गया, मैंने तत्काल चलते-चलते उत्तर दिया। मेरी भावना किसी को कष्ट पहुंचाने की नहीं थी। किसी भावनाओं को कष्ट पहुंचा है तो मैं माफी मांगती हूं। गांधी जी ने देश के लिए जो भी किया है उसे भुलाया नहीं जा सकता है। मैं उनका बहुत सम्मान करती हूं। इस बयान को मीडिया ने तोड़-मरोड़कर पेश किया है। मैं पार्टी का अनुशासन मानने वाली कार्यकर्ता हूं। जो पार्टी की लाइन है वही मेरी लाइन है।'  आगे पढ़ें

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भाजपा और कांग्रेस के लिए वर्चस्व की लड़ाई का नया गढ़ बना रायबरेली

दरअसल, इस घटना के पीछे जाएं तो यह वहां से शुरू होती है, जबसे कांग्रेस एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह ने बीजेपी का दामन थामा था। यह दिनेश प्रताप सिंह वही हैं, जिन्हें एक समय कांग्रेस ने बहुत ताकत दी। जिस समय अखिलेश सिंह (कांग्रेस विधायक अदिति सिंह के पिता) कांग्रेस से अलग होकर अलग सियासी राह पर चल रहे थे तो कांग्रेस ने दिनेश प्रताप सिंह को ताकत दी। उन्हें एमएलसी बनाया। दिनेश के भाई को हरचंदपुर सीट से टिकट दिया। वह मौजूदा विधायक हैं।  आगे पढ़ें

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धार लोकसभा सीट पर नहीं रहा एक दल का कब्जा, कभी भाजपा को कभी जीती कांग्रेस

धार लोकसभा सीट पर कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी का कब्जा होता रहा है। पिछले तीन चुनाव के नतीजों को देखें तो यहां की जनता ने किसी एक पार्टी को लगातार दूसरी बार नहीं चुना है। कभी ये कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी लेकिन बीजेपी ने धीरे-धीरे धार में अपनी धार को पैना किया। इस वक्त धार पर बीजेपी का कब्जा है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सावित्री ठाकुर ने कांग्रेस के उमंग सिंघर को हराया था। 40 साल की सावित्री ठाकुर 2004 से 2009 के बीच जिला पंचायत की अध्यक्ष रह चुकी हैं।  आगे पढ़ें

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यूपी में आखिरी चरण की वोटिंग से पहले सपा-बसपा के लिए चुनौती बने बागी

मोदी लहर में हुए पिछले लोकसभा चुनाव को छोड़ दिया जाए तो इस चरण का अधिकतर सीटों पर एसपी-बीएसपी अलग-अलग अपना झंडा गाड़ती रही हैं। धुर जातीय गणित पर लड़ी जाने वाली इन सीटों पर दोनों ही पार्टियों के साथ आने से उनके रणनीतिकारों की जीत की उम्मीद और बढ़ गई है। लेकिन, समस्या अपने ही है। नजीर के तौर पर देवरिया सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार नियाज अहमद ही गठबंधन के लिए चुनौती बने हुए हैं। नियाज पिछली बार यहां बीएसपी से उम्मीदवार थे। घोसी सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार बालकृष्ण चौहान भी बीएसपी से गए हैं। चंदौली में गठबंधन का खेल बिगाड़ रहीं कांग्रेस उम्मीदवार शिवकन्या कुशवाहा मायावती के खास रहे बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी हैं। पिछली बार वह गाजीपुर से एसपी की उम्मीदवार थीं। रार्बट्सगंज से बीजेपी उम्मीदवार पकौड़ी लाल पिछली बार एसपी के उम्मीदवार थे।  आगे पढ़ें

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उज्जैन लोकसभा सीट: कांग्रेस में गुटबाजी हावी तो भाजपा को सता रहा भितरघात का डर

इस बार विधानसभा चुनाव में आठ में से पांच विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को फतह मिली है। इसके साथ ही कांग्रेस में गुट भी बढ़ गए हैं और ये गुटबाजी अब लोकसभा चुनाव में खुलकर सामने आ रही है। कांग्रेस को जिन सीटों पर हार मिली थी उनपर अपने ही हार की वजह बने थे। कांग्रेस से बागी हो कर चुनाव लड़े और नतीजों पर इसका सीधा असर पड़ा। विधानसभा चुनाव से सीख लेते हुए कांग्रेस ने बागी नेताओं को मनाने की कोशिश की है। खुद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने नाराज नेताओं से बात कर उन्हें पार्टी के लिए काम करने को कहा है। हालांकि इन नेताओं की अभी अधिकृत वापसी नहीं हुई है।  आगे पढ़ें

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पीएम मोदी की तारीफ करने पर पीलीभीत में शहर काजी को मिली जान से मारने की धमकी

कोतवाली पुलिस ने चार नामजद और पांच अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके जांच प्रारम्भ कर दी है, मामला सदर कोतवाली क्षेत्र का है। पुलिस के अनुसार शहर के काजी मौलाना जरताब रजा खां और मस्जिद के इमाम हाफिज इसरार को पहले किसी अज्ञात व्यक्ति ने फोन पर जान से मारने की धमकी दी। फिर उनके समर्थक तबरेज को रोककर शहर के कुछ लोगों ने गाली-गलौच की।  आगे पढ़ें

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5 महीने में ही बदली तीन राज्यों की स्थितियां, लोकसभा चुनाव में लग सकता है कांग्रेस को झटका

इसके कई कारण माने जा रहे हैं। एक वजह विधानसभा और लोकसभा चुनावों का अलग-अलग मुद्दों और आधार पर लड़ा जाना है। दूसरी दलील यह भी दी जा रही है कि छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए तो बाकी दोनों जगह कांग्रेस और बीजेपी में कांटे की टक्कर रही थी। ऐसे में इतनी जल्दी बीजेपी के खारिज होने का सवाल ही नहीं उठता। राजनीतिक पंडित यह भी मान रहे हैं कि कांग्रेस को राज्यों में आए हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है। ऐसे में राज्य वाले प्रदर्शन की उम्मीद रखना कुछ ज्यादती होगी।  आगे पढ़ें

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चौथे चरण के मतदान के बाद 70% सीटों पर हुआ पूरा, भाजपा के लिए बचे तीन चरण होंगे अहम

चौथे चरण के मतदान के साथ 543 लोकसभा सीटों में से 373 सीटों के लिए वोटिंग पूरी हो गई। सोमवार को जिन 72 सीटों के लिए वोटिंग हुई, उसमें 45 सीटों पर बीजेपी, 9 पर उसकी सहयोगी शिवसेना और 2 पर एलजेपी का कब्जा है। चुनाव आयोग की तरफ से शाम पांच बजे तक के मतदान के आंकड़े बताते हैं कि नौ राज्यों में मतदान प्रतिशत 50.6% रहा है। संभावना जताई जा रही थी कि चौथे फेज के ट्रेंड पहले जैसे रह सकते हैं। हालांकि मतदान प्रतिशत कम होने बीजेपी की फिक्र बढ़ गई है क्योंकि पार्टी को डर है कि यह सोचकर उसके वोटर सुस्ती दिखा सकते हैं कि प्राइम मिनिस्टर नरेंद्र मोदी फिर से पीएम पक्का बनेंगे। मोदी ने वाराणसी में पार्टी सपोर्टर्स से कहा था कि वे इस मोर्चे पर आश्वस्त होकर बैठ न जाएं। बीजेपी की कड़ी चुनावी परीक्षा तो मध्य प्रदेश और राजस्थान में होने वाली है, जहां हाल में हुए विधानसभा चुनाव में उसे कांग्रेस से मात खानी पड़ी थी। सोमवार को दोनों राज्यों की जिन 19 सीटों पर वोटिंग हुई, उसमें से 6 सीटें मध्य प्रदेश और 13 राजस्थान की थीं।  आगे पढ़ें

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राजस्थान: भाजपा के लिए चुनौती किला बचाने की, कांग्रेस के पास गंवाने को कुछ नहीं

विधानसभा चुनाव के मौके पर बीजेपी को लेकर यहां खुलकर नाराजगी दिखी थी। विधानसभा चुनाव के वक्त एक नारा बहुत लोकप्रिय हुआ था- रानी तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं। इन सबके बीच बीजेपी के लिए 2014 का इतिहास दोहरा पाना संभव नहीं दिख रहा है। राज्य में वह भारी तो है लेकिन उसका नुकसान होना तय है। स्थानीय मीडिया में बीजेपी को राज्य में आठ से नौ सीट का नुकसान होने का अनुमान लगाया जा रहा है। वहीं कांग्रेस की उम्मीद इसलिए बढ़ी हुई हैं क्योंकि हाल ही में उसने राज्य में बीजेपी को हराते हुए सत्ता में वापसी की है। राजस्थान का यह इतिहास भी रहा है कि राज्य में जिस दल की सरकार होती है, लोकसभा चुनाव में वोटर्स उसी दल को जिताते हैं।  आगे पढ़ें

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