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राहुल गांधी के फैसले पर अब भी संदेह, कांग्रेस के सीनियर नेताओं की अहम बैठक आज

कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर राहुल गांधी आगे भी बने रहेंगे या फिर नहीं, इस पर अब भी संदेह है। इस बीच बुधवार को कांग्रेस के सीनियर लीडर मौजूदा राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा के लिए मीटिंग करेंगे। इस मीटिंग को राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष के भविष्य के तौर पर अहम माना जा रहा है। यह मीटिंग दोपहर 12 बजे शुरू होगी। कहा जा रहा है कि राहुल गांधी अब भी अध्यक्ष पद से इस्तीफे के अपने फैसले पर अड़े हुए हैं।  आगे पढ़ें

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पीसीसी चीफ पद के लिए लामबंद हुए नेता, सिंधिया समर्थक भी हुए सक्रिय

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के बाद देशभर में कांग्रेस संगठन में फेरबदल के लिए इस्तीफों का दौर चल रहा है। वहीं, विधानसभा चुनाव के बाद मप्र कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने पर अध्यक्ष पद छोड़ने की पेशकश की थी, लेकिन लोकसभा चुनाव तक उन्हें हाईकमान ने जिम्मेदारी संभालने को कहा था। मगर लोकसभा चुनाव में पांसा पलट गया और अब नए चेहरे को पीसीसी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दिए जाने की मांग उठने लगी है। प्रदेश में कांग्रेस के विभिन्न् गुटों के नेताओं के नाम चर्चा में आ गए हैं। यही नहीं, मंत्रालय में मंगलवार को मुख्यमंत्री नाथ और दिग्विजय सिंह के बीच बंद कमरे में चर्चा भी हुई।  आगे पढ़ें

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राहुल के खिलाफ मीनाक्षी की याचिका दायर करने वाली वकील को गहलोत ने हटाया

सुप्रीम कोर्ट में कुछ वकीलों को ही ऐडवोकेट-आॅन-रिकॉर्ड का दर्जा प्राप्त है। इसके लिए उन्हें कठिन परीक्षा से गुजरना होता है। वे वादी की तरफ से याचिका दायर कर सकते हैं। जब मामले में सुनवाई होती है तो उन्हें कोर्ट में दलील दे रहे वकील के साथ मौजूद होना होता है। वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने 12 अप्रैल को सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने लेखी की याचिका का जिक्र करते हुए इस पर तत्काल सुनवाई की मांग की थी। देरी से अपलोड किए गए कोर्ट के आदेश से पता चला कि रुचि कोहली ऐडवोकेट-आन-रिकॉर्ड थीं।  आगे पढ़ें

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गठबंधन की अंधी गली में उपेक्षित कांग्रेस

यूं तो कांग्रेस की कभी कोई खास विचारधारा रही नहीं है। इसे एक मध्यमार्गीय राजनीतिक दल के तौर पर ही जाना जाता है। लेकिन वहां से भी उसकी पटरी कभी की उतर चुकी है। रही बात वामपंथियों की तो वे कभी कांग्र्रेस के विरोधी तो कभी दोस्त भी रहे हैं। वैसे वे कांग्रेस के आलोचक हैं लेकिन जहां तक भाजपा विरोध की बात है तो वे कांग्रेस के साथ खड़े दिखते हैं। तिस पर यह तथ्य भी कि कांग्रेस की अपनी कोई विचारधारा कभी रही ही नहीं है। वहां परिवारधारा का बोलबाला था है और शायद रहेगा भी। वामपंथ ने इस दल को हमेशा त्याज्य ही समझा है। दक्षिण पंथ से लड़ने की उसकी मजबूरी ही उन्हें कांग्रेस की तरफ हाथ बढ़ाने के विवश करती है। आज की तारीख में भी सीताराम येचुरी इस दल के इकलौते ऐसे नेता हैं, जो नरेंद्र मोदी को हराने के लिए कांग्रेस के साथ जाने को तैयार हैं, लेकिन प्रकाश करात के समर्थक इसका पूरी ताकत से विरोध कर रहे हैं। read more  आगे पढ़ें

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ये किस्मत के धनी कांग्रेसी...

एक हास्य प्रधान फिल्म है, चुपके-चुपके। खुद को बेहद चालाक समझने वाला पात्र अंतत: बेवकूफ साबित हो जाता है। इसकी वजह पूछने पर वह कहता है, जुकाम में लोगों की नाक बंद हो जाती है, लेकिन मेरा दिमाग बंद हो गया था। हालांकि फिलहाल मौसम भीषण गरमी का है। फिर भी कांग्रेस से जुडेÞ ऐसे निर्णय यही यकीन दिला रहे हैं कि पार्टी में शीर्ष स्तर पर किसी न किसी को ऐसा जुकाम हुआ है कि उसका दिमाग बंद हो गया है। वरना कोई वजह नहीं थी कि घोरतम असफल प्रदेश अध्यक्ष रहे अरुण यादव को कांग्रेस खंडवा सीट से लोकसभा चुनाव का टिकट दे देती। पचौरी की तरह ही यादव का मामला किस्मत की खाने वाला है। पचौरी बगैर चुनाव जीते केंद्र में मंत्री बन गये। बिना जमीनी आधार के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिये गये। यादव अपने दिवंगत पिता सुभाष यादव के जीवित रहते उनके असर की बदौलत एक बार खरगौन और एक बार खंडवा से सांसद बनकर केंद्रीय मंत्री हो गये। बाद में संगठन के शून्य अनुभव के बावजूद प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष पद उन्हें दे दिया गया। विधानसभा चुनाव में बेचारे बलि का बकरा बनकर खेत रहे। शिवराज सिंह चौहान के सामने न उन्हें जीत पाना था और न ही जीत सके। फिर भी पार्टी ने उन पर फिर से यकीन जता दिया है। वाह! किस्मत हो तो ऐसी, वरना तो फिर बदकिस्मती ही अच्छी है। यादव जीत गये तो ठीक, वरना हारने की आदत को उन्हें हो ही गयी है। फिर चाहे वह बुधनी हो या हो खरगौन।  आगे पढ़ें

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मामला प्रदेशाध्यक्ष पद का

एक सवाल उठता है। नाथ ने जब जरूरत नहीं कहा तो उनका आशय नये प्रदेशाध्यक्ष से था या केवल अजय सिंह से? क्योंकि क्षमताओं से लबरेज होने के बावजूद सिंह बीते कई घटनाक्रमों में कमतर साबित हो चुके हैं। चौधरी राकेश सिंह प्रकरण से लेकर चुरहट सहित विंध्य में कांग्रेस की चुनावी पराजय ने उनकी क्षमताओं पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यह सही है कि कई समर्थकों ने सिंह के लिए सीट खाली करने की बात कहकर उनके प्रति यकीन जताया है, लेकिन यह भी तो सही है कि जो शख्स अपने परम्परागत गढ़ चुरहट की जनता का ही विश्वास कायम नहीं रख पाया, उसे किस वजह से चुनावी साल में प्रदेशाध्यक्ष पद जैसी अहम जिम्मेदारी दे दी जाए? दोनो बार नेता प्रतिपक्ष रहते हुए सिंह ने तत्कालीन शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ दमदार तेवर दिखाए। वे अपनी हार के कारण तो जानते हैं लेकिन विंध्य में इस हार के पीछे की साजिश समझने का आग्रह वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से जरूर कर रहे हैं। लेकिन अब सरकार बन गई है तो कोई उनकी बात को शायद गंभीरता से नहीं ले रहा है। नेता प्रतिपक्ष रहते हुए भी वे पार्टी में अपनी लकीर लंबी नहीं कर पाएं, ऐसे में कांग्रेस उनकी दम पर संगठन को आगे बढ़ाने का जोखिम शायद ही लेना चाहेगी।read more  आगे पढ़ें

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भाजपा फार्मूले पर चलेगी कांग्रेस, इंदौर में बनाएगी खुद का अपना दफ्तर, लीज पर मांगेगी जमीन

शहर कांग्रेस अध्यक्ष विनय बाकलीवाल के मुताबिक नजूल या आईडीए दोनों में से कोई भी एजेंसी उपलब्धता के आधार पर नियमानुसार हमें जमीन उपलब्ध करवा दे। हमने कुछ जगहों का जायजा भी लिया है। शासन ने हमें नियमानुसार जगह उपलब्ध करवाई तो कांग्रेस अपने संसाधनों और जनसहयोग से भवन तैयार करेगी। कांग्रेस ने पूरा आॅफिस कॉम्प्लेक्स तैयार करने का मन बनाया है, जहां वह कुछ जगह दुकानें किराए पर देकर दफ्तर के रखरखाव का खर्च भी निकाल सके।  आगे पढ़ें

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प्रदेश अध्यक्ष के लिए कांग्रेस नेताओं में जोड़तोड़ शुरू, सिंधिया और अजय सिंह का नाम सबसे आगे

अध्यक्ष पद के दावेदारों के नाम में एक नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया का है, तो दूसरा नाम अजय सिंह का है। इसके अलावा जीतू पटवारी का नाम भी सामने आ रहा है। लेकिन दूसरी बार विधायक बने जीतू पटवारी की संभावना मंत्री पद की ज्यादा नजर आ रही है। कुल मिलाकर मप्र कांग्रेस की कमान कौन संभाले ये राहुल गांधी की मंशा पर निर्भर करेगा। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखें तो कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी कर रहे हैं। कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद सिंधिया के 11 विधायकों का दिल्ली ज्योतिरादित्य सिंधिया के बंगले पर पहुंचकर शक्ति प्रदर्शन करना और उपमुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की मांग करना, अध्यक्ष पद की दावेदारी का हिस्सा माना जा रहा है।  आगे पढ़ें

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छत्तीसगढ़ के रण में आज मोदी और राहुल होंगे आमने-सामने, मोदी आज बस्तर में करेंगे रैली

कांग्रेस भ्रष्टाचार को लेकर रमन सिंह सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। उधर, राहुल गांधी अपनी रैलियों में राफेल, सीबीआई संकट, पेट्रोल, जीएसटी, नोटबंदी जैसे मसलों पर बीजेपी सरकार को घेरते आ रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि आज छत्तीसगढ़ में पीएम मोदी उनके आरोपों का जवाब दे सकते हैं। बीजेपी 15 साल के विकास कार्यों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रख सकती है।  आगे पढ़ें

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यह खानदानी खामख्याली है....

दरअसल, किसानों के मामले में कमाबेश सभी राजनीतिक दल गुड़ मत खिलाओ, लेकिन गुड़ जैसी बात करो की नीति को सफलतापूर्वक आजमाते हुए चले आ रहे हैं। शायद किसानों के लिए राहुल भी यही कोशिश कर रहे हैं। किंतु दस दिन और मुख्यमंत्री बदल देने जैसे वादे उनके इस कथन के प्रति जो विश्वास पैदा कर रहे हैं, उसके खंडित होने का कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए यह भूल जाइए कि दस दिन में कर्ज पूरी तरह माफ होगा। यह तो बिल्कुल ही बिसरा दीजिए कि ऐसा न करने पर मुख्यमंत्री बदल दिया जाएगा। read more  आगे पढ़ें

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