फर्स्ट कॉलम (प्रकाश भटनागर)और भी

राज्य और भी

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किसान कर्जमाफी की प्रक्रिया शुरू होते ही खुलने लगी घोटालों की पोल, भूतों के नाम पर भी जारी हुए हैं लोन

ऊर्वा सोसायटी की लिस्ट में ऐसे 500 किसान हैं। जिन किसानों का कर्ज माफ किया जा रहा है उनकी लिस्ट सोसायटी और बैंकों के हर चस्पा की जा रही है। अकेले ऊर्वा सोसायटी में 1200 किसानों की लिस्ट लगी, जिसमें करीब दो सौ लोगों के नाम पर दो-बार का कर्ज चढ़ा है। करीब 300 किसान ऐसे हैं जिनके नाम पर फर्जी तरीके से कर्ज़ा लिया गया है। वहीं करीब 500 ऐसे किसानों का कर्जमाफी में नाम है जिस नाम का कोई है ही नहीं। जब बैंक में दिए गए पते पर जाकर तलाश की गयी तो पता चला कि इन नामों के किसान हैं ही नहीं।   आगे पढ़ें

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तिरंगे के अपमान मामले में केजरीवाल के खिलाफ अदालत ने एफआईआर दर्ज करने दी अनुमति

कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के खिलाफ एफआईआर की अनुमति 5 साल पुराने मामले में दी है। राजेंद्र मिश्र नामक एक व्यक्ति ने कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा था कि 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान केजरीवाल सहित आप के कार्यकर्ताओं ने चुनाव चिह्न झाड़ू को तिरंगे के साथ साथ में लहराया था।   आगे पढ़ें

राजनीतिऔर भी

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फिर दिखी भाई और ताई के बीच खींचतान, रेलवे के कार्यक्रम में पहुंची सुमित्रा महाजन, पर नहीं आए विजयवर्गीय

लोकसभा चुनाव करीब है ऐसे में अब इंदौर में ताई फिर सक्रिय हो गई हैं। वहीं कैलाश विजयवर्गीय भी पार्टी पदाधिकारियों की बैठकें ले रहे हैं। माना जा रहा है कि उनकी भी मंशा इंदौर से चुनाव लड़ने की है। ऐसे में एक बार बीजेपी में अंदरुनी खींचतान चल रही है।   आगे पढ़ें

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ममता की एंटी भाजपा रैली के लोगों को भीड़ जुटना शुरू, पहुंचे अलग-अगल दल के सियासी नेता

तृणमूल कांग्रेस की संयुक्त विपक्षी रैली ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड मैदान में होगी। इस रैली में शामिल होने के लिए अखिलेश यादव (एसपी), सतीश मिश्रा (बीएसपी), शरद पवार (एनसीपी), चंद्रबाबू नायडू (टीडीपी), एम.के. स्टालिन (डीएमके), एच.डी. देवेगौड़ा और उनके बेटे कुमारस्वामी (जेडीएस), मल्लिकार्जुन खड़गे और अभिषेक मनु सिंघवी (कांग्रेस), अरविंद केजरीवाल (आप), फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला (नैशनल कॉन्फ्रेंस), तेजस्वी यादव (आरजेडी), अजीत सिंह और जयंत चौधरी (आरएलडी) हेमंत सोरेन (जेएमएम), शरद यादव (लोकतांत्रिक जनता दल) ने सहमति जताई है और अधिकतर नेता पहुंच भी गए हैं।   आगे पढ़ें

सियासी तर्जुमा

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कमलनाथ और शिवराज का अंतर

मैं यह कह सकता हूं कि शिवराज सिंह चौहान से मेरी अच्छी पहचान और दोस्ती रही है। उन्हीं के कहे के मुताबिक मैं उन लोगों में से एक हूं जो शिवराज के दिल में रहता हैं। पर पिछले तेरह साल में मैं उनसे तेरह बार भी शायद ही मिला हूं। और जब मिला भी तो उन्हें चंद मिनटों बाद घड़ी की तरफ देखते पाया। मुख्यमंत्री के साथ ऐसा हो सकता है। यारी दोस्ती क्या करें, आखिर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी का मामला जो ठहरा। पर अब तक मैं कमलनाथ से जब भी मिला हूं, वे पर्याप्त बतियाएं, खुल कर बोले और घड़ी उन्हें देखनी नहीं पड़ी, क्योंकि मैं जब भी मिला वे व्यस्त होने के बावजूद फुर्सत में थे। पता नहीं कैसे राजनीतिज्ञ है कमलनाथ, बहुत बेलाग बोलते हैँ और खुल कर सामने आते हैं। बोल दिया आफ दि रिकार्ड तो मान लेते हैं कि ऐसा ही होगा। शिवराज के पास आफ दि रिकार्ड और आन दि रिकार्ड कुछ है ही नहीं। मीडिया के अपने मित्रों में शिवराज अकेले में बहुत असहज दिखते हैं। सार्वजनिक तौर पर वे सहज हैं।   आगे पढ़ें

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नाथ को बधाई और सिंधिया को साधुवाद

ज्योतिरादित्य ने इस चुनाव में शिवराज से अपने साथ-साथ अपने पूर्वजों के अपमान का भी बदला ले लिया। सिंधिया राजघराने को लेकर शिवराज ने बीते कम से कम दो साल में जमकर आग उगली थी। जाहिर है कि वह जूनियर सिंधिया की प्रदेश में पहले बढ़ी सक्रियता और फिर पांव पसारती ताकत से डरे हुए थे। इसलिए यह चुनाव भाजपा ने ‘शिवराज बनाम महाराज’ कर दिया था। ग्वालियर-चंबल सहित अपने प्रभाव वाले अन्य क्षेत्रों में सिंधिया ने भाजपा को जमकर नुकसान पहुंचाया। बदला पूरा हुआ तो मुख्यमंत्री पद के लिए बलिदान भी दे दिया। सिंधिया के समर्थक भले ही उनके मुख्यमंत्री न बन पाने का मलाल पाले बैठे होंगे, किंतु जयविलास पैलेस की दीवारों का स्पर्श कर सिंधिया अवश्य ही इस बात की खुशी मनाएंगे कि राजघराने के खिलाफ उठी आवाज को कम से कम पांच साल के लिए खामोश कर दिया गया है। read more   आगे पढ़ें

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नज़रिया और भी

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कटाक्ष: हाथ जोड़ फिर तोड़—फोड़

चुनावी मौसम आ गया है और एक बार फिर नेताओं को जनता की याद आने लगी है। लोकसभा चुनाव से पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं, सो नेताओं की सिरदर्दी शुरू हो गई है। विधानसभा चुनाव में जीत ही दिल्ली का रास्ता दिखाएगी। यह सोच सब नेता अपनी खोल से निकल गए हैं।   आगे पढ़ें

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वन नेशन वन इलेक्शन की कल्पना को मूर्त रूप दिला पायेगी विधि आयोग की बैठक?

यह भी आश्चर्य का विषय है कि इस अवधारणा का विरोध करने वाली कांग्रेस और अन्य विरोधी दल इस सत्य को कैसे विस्मृत कर गए कि देश मे 1952 से लेकर 1967 तक लोकसभा एवं सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही कराए जाते थे। हालांकि तब औऱ अब की परिस्थितियों में बड़ा अंतर आया है। अब यदि पुरानी परंपरा को फिर शुरू करना है तो मामूली संवैधानिक संसोधन से संभव नही है। तब देश मे इतने क्षेत्रीय दल नही थे।गठबंधन की सरकारें अस्तित्व में नही थी।1967 के बाद गैर कांग्रेसवाद की शुरुआत हुई है।   आगे पढ़ें

विश्लेषणऔर भी

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अच्छा होगा पहले राहुल कांग्रेस को बदल लें....

शायद कांग्रेस को एक बात समझ में आ रही है कि जहां उसकी भाजपा से सीधी लड़ाई है, वहां के मुस्लिम मतदाताओं के पास उसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है, लिहाजा मुस्लिमों की उपेक्षा करके भी यदि कांग्र्रेस अध्यक्ष मंदिरों की खाक छानते रहेंगे तो भी मुस्लिमों को जाना कहां है? इसमें हकीकत हो सकती है। लेकिन इसमें खतरा एक यह भी है कि किस्सा, न खुदा ही मिला न बिसाले सनम-न इधर के रहे, न उधर के रहे, जैसा हो सकता है। आखिर अब हिन्दू भला कांग्रेस पर क्यों भरोसा करने लगेगा। किसी मंदिर में मत्था टेकने से, किसी मठ के स्वामी के दर्शन करने से क्या हिन्दू उन तथ्यों की अनदेखी कर सकता है, जब कांग्रेस ने प्रो मुस्लिम राजनीति को चुन लिया था।read more   आगे पढ़ें

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FIFA WORLD CUP: जब पिछली बार मिस्र की टीम यहां थी तब सालाह पैदा भी नहीं हुए थे

फीफा विश्‍वकप 2018: आज फुटबॉलर मोहम्‍मद सालाह का 26वां जन्मदिन है. जब उसके देश की टीम पिछली बार वर्ल्डकप में खेली थी, तब वह पैदा भी नहीं हुए थे. मिस्र, यानी इजिप्ट 28 साल बाद वर्ल्डकप में खेल रहा है. रात साढ़े आठ बजे (भारतीय समयानुसार) जब मोहम्‍मद सालाह मैदान में उतरेंगे, तो एकाटेरिनबर्ग एरीना में मौजूद 45,000 दर्शकों के अलावा, दुनिया की आधी आबादी की निगाहें उसी पर टिकी होंगी.जब बॉल उसके बूट से टकराकर गोलपोस्ट के भीतर जाती है, तो लिवरपूल फुटबॉल क्लब स्टेडियम का नज़ारा कुछ ऐसा हो उठता है - पहले जश्न और शोर, फिर कुछ क्षण की खामोशी, फिर हाथ आसमान की तरफ उठता है खुदा को शुक्रिया कहने के लिए, और फिर जब वह धरती को चूमता है, तो उन लम्हों की पवित्रता के लिए ज़रूरी शांति का उसके प्रशंसक सम्मान करते हैं. यह फुटबॉल के नए सुपरस्टार मोहम्मद सालाह हैं, और वह अपने कारनामों से लिवरपूल क्लब के ही नहीं, दुनियाभर के लाड़ले बन गए. यह इस बात की तसदीक भी है कि आस्था आज भी पहचान और शोहरत के रास्ते में नहीं आती. आज के हालात में सालाह उस विश्वास, समाज और संस्कृति की नई पहचान बन रहे हैं, जिसे दुनिया संदेह और सवालों की नज़र से देख रही है. पश्चिमी समाज पर मंडरा रहे इस्लामोफोबिया के मिथक को किक मारते सालाह उस लीग में शामिल हो गए हैं, जहां मिस्र के इस खिलाड़ी की तुलना लियोनेल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो से की जा रही है. सालाह लिवरपूल के लिए 43 मैचों में 49 गोल कर चुके हैं और साथी खिलाड़ियों और फुटबॉल लेखक संघ ने उन्हें अप्रैल में साल का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी चुना है. मोहम्मद सालाह इंग्लैंड में भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने मिस्र में. सालाह पिछले अक्टूबर में मिस्र के नायक बने थे, जब आखिरी क्षणों में उनके पेनल्टी किक से मिस्र की टीम 1990 के बाद पहली बार वर्ल्डकप में जगह बनाने में कामयाब रही थी. राजधानी काहिरा की दीवारें उनके पोस्टरों से रंग गईं, और समूचे बाज़ार पर उनकी तस्वीर छा गई. चादर से लालटेन तक सालाह ही सालाह. समूचा मिस्र आज लिवरपूल का फैन बन गया है. मोहम्मद सालाह की लोकप्रियता की बड़ी वजह है उनका अपनी पहचान पर फख्र होना.मोहम्मद सालाह पिछले महीने यूएफा चैम्पियन्स लीग के फाइनल में लिवरपूल की ओर से खेलते हुए कंधे में चोट खा बैठे थे, लेकिन मिस्र के कोच हेक्टर कूपर ने साफ कर दिया है कि सालाह चोट से उबर गए हैं, और उरुग्वे के खिलाफ खेलने को तैयार हैं. सो, अब देखना यह है कि क्या मिस्र दो बार के चैम्पियन उरुग्वे को मात दे पाएगा...?   आगे पढ़ें