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छेद से खेद तक वाले राहुल गांधी

राहुल ने राफेल मामले की निपट सिरफिरी व्याख्या में उलझने के बाद इस घटनाक्रम पर खेद जता दिया है। हमारी न्याय प्रणाली में कई ऐसे छेद मौजूद हैं, जिनके जरिए अनेक संगीन मामले भी खेद के जरिये निपटाये जा सकते हैं। यह मामला छेद से खेद तक का है। राहुल की सोच सुराखदार है। कई बार लगता है कि उनके दिमाग और हृदय के बीच में वह बारीक छन्नी नहीं है, जो तोल-मोल कर बोलने की सीख देती है। बल्कि उनके शरीर के इन दो महत्वपूर्ण हिस्सों के बीच कोई बड़ा छेद मौजूद है। दिमाग से निकली बात गाय के मलद्वार से निकले गोबर की तरह धप से उनके दिल में आकर छितर जाती है और फिर जुबां से बाहर निकल आती है। वरना किसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का सदर ऐसी बेवकूफी का परिचय नहीं देता, जैसा राहुल के इस हालिया मामले में एक बार फिर सामने आया है।   आगे पढ़ें

फर्स्ट कॉलम (प्रकाश भटनागर)और भी

राज्य और भी

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दिग्गी को मिला करारा जवाब, लड़के ने भरी सभा में कहा सर्जिकल स्ट्राइक करने से उसके खाते में आए 15 लाख

एक चुनावी रैली के दौरान भोपाल कांग्रेस के प्रत्याशी दिग्विजय सिंह को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। दिग्विजय सिंह ने मंच से जब यह पूछा कि पीएम मोदी ने चुनाव से पहले यह वादा किया था कि हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए जमा करवाएंगे। क्या किसी के खाते में 15 लाख आए? उन्होंने फिर कहा कि यदि किसी के खाते में आए हो तो हाथ उठाकर बताए।   आगे पढ़ें

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ई-टेंडर घोटाले में आईएएस मनीष रस्तोगी सहित छह अधिकारियों के आज होंगे बयान

मप्र इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम के तत्कालीन प्रबंध निदेशक मनीष रस्तोगी को मंगलवार को बयान देने के लिए ईओडब्ल्यू में बुलाया गया है। रस्तोगी ने इस मामले का खुलासा किया था और उन्होंने शासन को रिपोर्ट भेजी थी। इसके आधार पर ईओडब्ल्यू को मामला सौंपा गया था। रस्तोगी अभी प्रमुख सचिव राजस्व हैं। सूत्रों के मुताबिक ईओडब्ल्यू ने ई-टेंडर घोटाले की आरोपी एंट्रस सिस्टम्स लिमिटेड कंपनी के छह अधिकारियों को सोमवार को बुलाया था जिनके बयान लिए जाएंगे। इनके बयान मंगलवार को लिए जाएंगे। सूत्र बताते हैं कि घोटाले की जांच में अब तक कई लोगों को नोटिस भेजे जा चुके हैं जिनके बयान लिए जाएंगे।   आगे पढ़ें

राजनीतिऔर भी

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रायबरेली दौरे पर गईं प्रियंका ने स्मृति पर बोला हमला, कहा- जूते बांटकर अमेठी की जनता का अपमान किया

प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा, 'ये स्मृति ईरानी जी यहां आई और उन्होंने जूते बांटे, ये कहने के लिए कि इनके पास जूते भी नहीं है पहनने के लिए। ये सोच रहे हैं कि राहुल जी का अपमान कर रही है, ये अमेठी की जनता का अपमान कर रही हैं।' उन्होंने यह भी कहा, 'अमेठी और रायबरेली के लोग अपना सम्मान करते हैं, वे किसी के सामने भीख नहीं मांगेगे। भीख मांगेंगे तो वो आए आपके सामने वो मांगे भीख वोटों की। तो आप समझ लीजिए कि इसे चुनाव में क्या हो रहा है। चाहे अमेठी में, चाहे पूरे देश में। झूठ, जनता को गुमराह करने के तरीके, ऐसा प्रचार जो असलियत से दूर है।   आगे पढ़ें

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अब आजम के बेटे ने की अभद्र टिप्पणी, जयप्रदा को कहा अनारकली

रामपुर की रैली में अपने बेटे के साथ आजम खान ने कहा, 'इस वक्त जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की छवि खतरे में है तो मैं तो कहीं भी नहीं ठहरता और हमारा क्या होगा। मैं लोगों से लोकतंत्र और हमारे देश के संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करने की अपील करता हूं।' विवादित समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने आरोप लगाया, 'रामपुर का स्थानीय प्रशासन बीजेपी उम्मीदवार की मदद करने की पूरी कोशिश कर रहा है। वे लोग एसपी कार्यकतार्ओं के खिलाफ झूठे केस दर्ज कर रहे हैं। जो लोग मेरे समर्थन में हैं, उनके घरों में छापे मारे जा रहे हैं।   आगे पढ़ें

वीडियो गैलरीऔर भी

सियासी तर्जुमा

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तेरा निजाम है, सिल दे जुबाने-कायर को....

इस माहौल में नैतिकता का तत्व तलाशना चील के घोंसले में मांस की खोज जैसा निरर्थक प्रयत्न बन चुका है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में मोहम्मद आजम खान जैसी घोर अनैतिकता तो भोजन करते समय किसी का मल दिख जाने जैसी असहनीय है।   आगे पढ़ें

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तेरा निजाम है, सिल दे जुबाने-कायर को....

देश की राजनीति यूं भी अधोपतन के चरम तक पहुंच चुकी है। इस माहौल में नैतिकता का तत्व तलाशना चील के घोंसले में मांस की खोज जैसा निरर्थक प्रयत्न बन चुका है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में मोहम्मद आजम खान जैसी घोर अनैतिकता तो भोजन करते समय किसी का मल दिख जाने जैसी असहनीय है।   आगे पढ़ें

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शख्सियतऔर भी

नज़रिया और भी

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तो सवाल यह है कि सवालों से डरता कौन है?

मनन कीजिए कि दुनिया में यदि कुछ भयंकर है तो वो सवाल है और कुछ मुश्किल है वह है जवाब देना । कयामत के दिन ईश्वर को जवाब देना है,घर जाकर पिताजी को या पत्नी को। बॉस या मालिक नामक प्राणी का तो अस्तित्व ही जवाब मांगने पर टिका हुआ है । read more   आगे पढ़ें

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ग्वालियर का एयरबेस, खमरिया के बम और हमारी अवनि चतुर्वेदी

मैं उन बौद्धिकों की बात नहीं करता जो हमारे जवानों पर थूकने, पत्थर बरसाने वालों के भी मानवाधिकार का परचम थामें इंडिया इंटरनेशनल में प्रेसकांफ्रेंस संबोधित करते हैं और सुप्रीमकोर्ट में याचिकाओं का बोझ बढ़ाते हैं। बहरहाल ग्वालियर और जबलपुर के लिए गौरव का ये क्षण तो है ही अपने विंध्यवासियों के लिए भी कम नहीं। सोशलमीडिया पर रीवा की बेटी अवनि चतुर्वेदी की फोटो तैर रही है- कि आतंकियों का काम तमाम करने वाली टुकड़ी की कमान उसके हाथों में थी। इसे आप भावनाओं का महज प्रकटीकरण भी कह सकते हैं। बालाटोक स्ट्राइक में कौन थे..कौन नहीं यह तो उस आपरेशन के सुप्रीम कमांडर ही जानते हैं..। कभी उचित समय पर हो सकता है कि इन वीर जाँबाजों के परिचय को देश के साथ साझा करें। लेकिन अवनि जैसी बेटियों के पराक्रमी क्षमता के स्मरण का अवसर तो बनता ही है। read more   आगे पढ़ें

विश्लेषणऔर भी

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‘श’ और ‘स‘ के फर्क में पिसता मुल्क

वैसे देखा जाए तो राजनीतिक दलों के अधिकांश गठबंधन शराब भी होते हैं और उनमें सराब वाली फितरत भी होती है। जनता पार्टी से शुरू कीजिए। मोरारजी भाई की सरकार लोकतंत्र की सेहत के लिए किसी शराब की तरह घातक साबित हुई और देश की जनता के लिए कांग्रेस के विकल्प के नाम पर सराब की तरह छलावा मात्र बन गयी। कांशीराम और मुलायम सिंह यादव के वर्चस्व वाले दौर में उत्तरप्रदेश में हाथी तथा सायकिल का साथ शराब के हैंगओवर की तरह वहां की जनता का सिर दर्द बन गया और आज एक बार फिर सराब की भांति मायावती और अखिलेश यादव की जुगलबंदी मतदाता को फिर भरमाने का जतन शुरू कर चुकी है। बिहार में नीतिश कुमार ने लालू प्रसाद यादव से गठबंधन तोड़कर इस शराब से पिंड छुड़ाया और फिर सारे दिखावों को दरकिनार कर एक बार पुन: एनडीए की गोद में जा बैठे।   आगे पढ़ें

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क्या ये तर्क कयासों से परे नहीं हैं.....

रही बात असिहष्णुता और साम्प्रदायिकता की खाई की, जो एज़ पर विपक्षी दल, बढ़ी है, तो उनके लिए बस यह कहना है कि इन पांच सालों और उससे पहले के पांच सालों के आंकड़े उठा कर देख लें कि किस वक्फे में दंगे ज़्यादा हुए हैं। हां यह ज़रूर है कि बीते पांच सालों में हमने बायस्ड पत्रकारिता की नई मिसालें कायम होती देखी हैं। नेता, अभिनेता, पत्रकार, आम लोग, सबके चेहरों से नकाब उतर गए हैं। पहले हम जिन पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते थे उनसे अब सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे सवाल कर रहे हैं तो हाल यह है कि अब तक जो शान्त और बौद्धिक नज़र आते थे, वो अब बदले बदले से सरकार नज़र आने लगे हैं। बाकी, अन्तिम फैसला तो हम पर ही हैं कि हम किसे अपनाएंगे और किसे ठुकरा देंगे। मई की गर्मी में सब क्लीयर हो जाएगा...पर मेरी दुआएं उनके साथ हैं, जिन्होंने इस देश में जबरदस्त बदलाव की नींव रखी है और नामुमकिन को मुमकिन करने का भरोसा दिया है.. read more   आगे पढ़ें

फोटो गैलरीऔर भी